सपना
सपना
पहली तनख्वाह मिलते ही रमेश सीधा जा पहुँचा स्टेशन रोड पर स्थित अपने पिताजी की छोटी-सी चाय-नास्ते की दुकान पर। रुपयों से भरा लिफाफा अपने पिताजी को थमाकर उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा, "बापू, ये रही मेरी पहली सेलरी के पैसे। इस लिफाफे में पैंतालीस हजार पांच सौ सत्तर रुपए हैं। लगभग छह-सात हजार रुपए जी.पी.एफ., ग्रूप इंस्योरेंस और वेलफेयर फंड के नाम से सरकार काट लेती है, जो कि वह कर्मचारियों को उनके रिटायरमेंट के समय लौटाती है।"
"पर बेटा ? सेलरी के पैसे तो एकाउंट में जमा हुए होंगे ना, फिर ये कैश ?" पिताजी ने पूछा।
"हां बापू, सेलरी के पैसे एकाउंट में ही जमा हुए थे, पर मैंने बैंक से नगद निकाल लिए।" रमेश ने बताया।
"पर क्यों बेटा ? क्या अपना सपना भूल गए कि अपनी पहली सेलरी से तुम मेरे लिए नये जूते, अपनी मम्मी के लिए बनारसी साड़ी और गुड़िया के लिए नई साइकिल लाने वाले थे ?" पिताजी ने याद दिलाई।
"नहीं बापू, मैं कुछ भी नहीं भूला हूं। मुझे सब याद है, पर मेरे सपने से ज्यादा महत्वपूर्ण और पुराना सपना आपका था, मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने का। इसके लिए आप लोगों ने क्या कुछ नहीं किया। कितने समझौते किए। मुझे वो सब याद है, जो कि बचपन से ही देखता आ रहा हूं था। कड़ाके की ठंड हो या भारी बरसात या फिर प्रचंड गर्मी, रोज सुबह पाँच बजे से ही आप अपनी दुकान खोलते और देर रात तक इसलिए बैठते हैं कि कुछ ज्यादा पैसे मिले, जिससे कि मुझे और गुड़िया को अच्छी शिक्षा दिला सकें। कई बार तो हमारी स्कूल फीस पटाने के लिए आपने लोगों से ब्याज पर उधार भी लिए। सो, मेरी सेलरी पर पहला अधिकार आपका और मम्मी का है बापू। अब हम सबसे पहले अपने सभी उधार चुकाएंगे और गुड़िया को मुझसे भी बड़ा अफसर बनाएंगे। मेरे सपने पूरे करने के लिए तो पूरी उमर पड़ी है।"
आँखें भर आईं श्यामलाल की। इसी दिन के लिए उसने पिछले पच्चीस साल से क्या कुछ नहीं किए थे। छलकने को आतुर आँसुओं को रोकते हुए बोला, "बेटा, अधिकार की कोई बात नहीं है। तुम्हें इसे अपने पास ही रखने चाहिए। तुम्हारी मम्मी के लिए बनारसी साड़ी और गुड़िया के लिए नई साइकिल...।"
"बापू, पैसे तो आपको ही रखने होंगे। मैंने आपका सपना पूरा कर दिया है। अब मेरा सपना पूरा करने की जिम्मेदारी आपकी है।" पिताजी की बात काटते हुए रमेश ने कहा।
गले से लगा लिया श्यामलाल ने अपने बेटे रमेश को। आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी थीं। दुकान पर बैठे ग्राहक भी पिता-पुत्र की बातें सुनकर भावुक हो उठे थे।
