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Madhu Vashishta

Inspirational

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Madhu Vashishta

Inspirational

संस्कारी बहू।

संस्कारी बहू।

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"अगर मां होती तो कुछ संस्कार भी सिखाती, मैंने तो नीता से बात करने के लिए भी अपनी बेटी को मना कर रखा है। मुझे तो कभी भी इसके लक्षण अच्छे नहीं लगे। मालूम नहीं कहां-कहां नौकरी के बहाने घूमती रहती है। हम तो खुद हैरान रह गए जब इसकी मांग में सिंदूर भरा हुआ देखा। नीता के भाग कर शादी करने की वजह से हमारी लड़कियां भी बिगड़ जाएंगी।"

नीता के फ्लैट के थोड़ी ही दूर पर बहुत सी औरतें इकट्ठा होकर नीता के विषय में बातें कर रही थीं कि तभी भावना जी भी बाहर निकलकर उन खड़ी हुई औरतों पर बरस पड़ी| "खबरदार जो मेरी बहु के बारे में कुछ भी कहा तो। अपने बच्चों पर विश्वास नहीं है तो मेरी नीता पर क्यों लांछन लगाते हो? तुम उसके संस्कार के बारे में क्या जानो? देवी है मेरी बहू तो!"


    अपनी सासू मां को बहुत जोर से उन खड़ी हुई औरतों पर चिल्लाते हुए सुना तो दुकान पर जाते हुए दूर निकलने के बावजूद भी नीता पीछे की ओर देखती हुई वही ठिठक गई। सासू मां के इस तरह से प्यार, अपनत्व और विश्वास से भरे शब्द सुनकर नीता को अपनी सासूमां पर बहुत प्यार आया। वह खड़ी खड़ी मुस्कुरा उठी और फिर अपने गंतव्य स्थान की ओर चल दी।

  बस स्टैंड से बस में बैठ कर दुकान पर जाते हुए पुरानी बातें उसकी आंखों के सामने नाच रही थीं। मां की मृत्यु के समय नीता केवल 11 बरस की ही थी और भाई 5 बरस का। पापा खाना बनाकर देते थे, लेकिन क्योंकि वह एक कंपनी की गाड़ी चलाते थे तो कई बार उन्हें अपने साहब के साथ कुछ दिनों के लिए भी बाहर जाना पड़ता था। उस समय घर में केवल नीता और उसका भाई ही रहते थे। जाते हुए वह अक्सर पड़ोस वाली आंटी को बच्चों का ख्याल रखने के लिए कह जाते थे लेकिन क्योंकि यह उनका बाहर जाने का अधिकतर नियम हो ही गया था तो वह पड़ोसी भी कब तक ख्याल रखते?


    धीरे धीरे छोटी उम्र में ही नीता घर का काम करना और भाई का भी ख्याल करना सीख गई थी। पापा जब भी बाहर जाते तो उनका ख्याल था फ्लैट में रहने वाले सोसायटी के लोग उनके बच्चों का ख्याल रख लेंगे लेकिन ---------!!!!!   11 वर्ष की उम्र में नीता बहुत सुघड़ गृहिणी बन चुकी थी।


    दोनों भाई बहन घर के बाहर ही सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। कुछ साल पहले कंपनी बंद होने के कारण पापा की भी नौकरी छूट गई थी। निराशा और आर्थिक तंगी के समय नीता बहुत हिम्मत से उठी और घर से थोड़ी दूर मार्केट के साड़ियों के बड़े से शोरूम में उसने नौकरी करनी शुरू कर दी थी। 

      पांचवी के बाद भाई को भी प्राइवेट स्कूल में डलवा दिया गया। धीरे-धीरे पापा भी घर घर जाकर सेल्समैन का काम कर लेते थे। इस तरह से किसी तरह घर का खर्च तो चल जाता था लेकिन नीता की शादी के लिए कुछ भी नहीं जुड़ पा रहा था इस कारण पापा   कई बाहर बहुत चिंतित हो जाते थे।

      अवसाद और चिंता के कारण जब कभी पापा का ब्लड प्रेशर बहुत बड़ जाता था तो नीता पापा को सांत्वना ही देती थी। वह उन्हें विश्वास दिलाती थी कि बिट्टू के बड़ा होने के बाद सब ठीक हो जाएगा। वह लोग अभी सारे खर्च तो उठा पा रहे हैं।

      राजू भी उसी साड़ी की दुकान में काम करता था जहां कि नीता काम करती थी। जैसे-जैसे काम का बढ़ता गया वैसे ही मालिक ने एक बड़ी दुकान खरीद ली थी जो कि थोड़ी दूरी पर थी और इसके लिए नीता को बस से जाना पड़ता था। वह हमेशा समय से दुकान पहुंचती थी और दुकान का सारा काम बहुत सलीके से करती थी इसलिए मालिक की उस पर पूर्णतया निर्भरता थी। ऐसे ही राजू भी दुकान का बहुत पुराना कर्मचारी था। मालिक अक्सर उसे सूरत ,भागलपुर, बनारस साड़ियों के सिलसिले में भेजते ही रहते थे। उस दिन जब मालिक ने राजू को 3 दिन की छुट्टी देने को मना करा तो राजू बेहद परेशान था। मालिक उसे बनारस भेजना चाहता था और राजू छुट्टी चाहता था। राजू को उदास देखकर जब नीता ने कारण पूछा तो राजू ने बताया कि उसकी मां की तबीयत बहुत खराब है। राजू ने यह भी बताया कि उसकी सारी कमाई मां की दवाइयों में ही खर्च हो जाती हैं। कुछ समय पहले माता जी को अस्थमा और आर्थराइटिस का अटैक पड़ा तो उनकी लगभग सारी जमा पूंजी अस्पताल में ही खर्च हो गई थी। पापा के मृत्यु के कारण राजू भी दसवीं से आगे नहीं पढ़ सका। मालिक ने ही उसको अपने घर में सोने की जगह दे रखी है, इसलिए वह मालिक को जाने के लिए मना करके नाराज नहीं कर सकता। 

     बेहद दुखी मन से वह बोला ना मैं मां का ख्याल रख सकता हूं और ना ही मालिक को खुश रख सकता हूं, मेरी भी क्या जिंदगी है?

     तुम्हारी मम्मी अभी कहां है? नीता के पूछने पर राजू ने बताया कि वह उन्हें अकेले नहीं छोड़ सकता इसलिए वह वृद्धाश्रम में रहती है।

     नीता ने राजू को सुझाव दिया कि यदि वह चाहे तो वह दोनों विवाह कर सकते हैं और नीता के घर में ही माता जी को भी वह लोग साथ में रख सकते हैं। कुछ समय बाद जब उसका छोटा भाई भी पढ़ लिख कर कमाने लायक हो जाएगा। वह दोनों मिल कर अपना काम अलग भी शुरू कर सकते हैं। बाद में यदि जरूरत लगी तो वह अलग फ्लैट में भी किराए पर रह सकते हैं।

    राजू को कोई एतराज नहीं था लेकिन शादी करने के लिए खर्च एक बहुत बड़ी समस्या थी। बस तभी दोनों ने कुछ फैसला किया और जब नीता ने अपने पापा को राजू के बारे में बताया तो पापा को भी बहुत खुशी और निश्चिंतता हुई । उन्होंने भी नीता के इस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि घर में अगर राजू की माताजी रहेंगी तो यह घर भी बस ही जाएगा। बिट्टू की पढ़ाई भी उनके रहने के कारण अच्छे से हो सकेगी। यूं भी उनके फ्लैट में तीन कमरे थे। पूरे परिवार के लिए इतनी जगह बहुत थी।

 दूसरे दिन मंदिर जाकर राजू और नीता ने विवाह कर लिया। पापा ने उन्हें वही आशीर्वाद दिया । उसके बाद दूसरे दिन जब नीता सिंदूर लगाकर घर से बाहर निकली तो आसपास की औरतों को करने के लिए एक बात मिल गई थी। लेकिन नीता किसी बात की कोई परवाह नहीं करती थी।

     कुछ दिन बाद नीता सासू मां को भी घर ले आई थी। पापा भी खुश थे क्योंकि उनकी चिंता बिल्कुल खत्म हो चुकी थी। राजू भी अब कहीं से भी साड़ियां लेने जाता तो कुछ साड़ियां फालतू ले आता था जो कि पापा सेल्समैन के जैसे कम मार्जिन पर बेचने लगे थे। इस तरह से घर की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी होती जा रही थी। राजू की माता जी के घर का ख्याल करने की वजह से बिट्टू भी पढ़ाई में अच्छा ही निकल रहा था और एक दिन बिट्टू का भी इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन हो गया था। घर में खुशियां और धन दिन दोगुना बढ़ रहा था। सासू मां भी नीता को बहुत प्यार करती थी।

       यह सच है कि लोग अपने दुख से दुखी नहीं होते बल्कि दूसरे के सुख से ज्यादा दुखी होते हैं। नीता को संस्कार-विहीन बोलते हुए शायद सबको आत्मसंतुष्टि मिलती थी। लेकिन जब नीता की सासु मां ने उन सबको यह कहते हुए झिड़का कि अपनी बच्चियों पर विश्वास करो। बच्चे अच्छे संस्कार देखकर सीखते हैं ना कि तुम्हारी बुराइयां सुनकर। मेरी बहू से ज्यादा संस्कारी और समझदार कोई हो ही नहीं सकता। इतना सुनकर चुगली करने वाली औरतों की भीड़ अपने आप तितर-बितर हो गई।

  सफल होने के लिए यही पहला नियम है जो कि नीता ने अपनाया लगन से निरंतर अपने कार्य को करते रहना और किसी के लिए भी बुरा नहीं करना बस जो राह सही लगे उस पर ही चलना। आप सब से यही विनती है कि किसी के विषय में बिना सोचे समझे बिना जाने कुछ भी कुछ भी ना तो बोलें और ना ही सुने। सच्चाई हमेशा वह नहीं होती जो कि दिख रही होती है सच्चाई कई बार कुछ अलग भी होती है।


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