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Dinesh Dubey

Classics

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Dinesh Dubey

Classics

सीता मां की दृष्टि

सीता मां की दृष्टि

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लंकापति रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके उनको अपनी लंका ले गया, और अशोक वाटिका में रखा , तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी, रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था।


लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी, यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को भी भ्रमित करने का प्रयास कीया, लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ, ।

रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी बोली *" नाथ आप तो राम का वेश धर कर गए थे फिर क्या हुआ?


रावण बोला *" जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे दिखाई ही नहीं पड़ रही थी।


रावण अपनी समस्त शक्ति लगा चुका था लेकिन जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका फिर रावण भी कैसे समझ पाता !


रावण एक बार फिर आया और बोला*" सीता , मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो की मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर घूर कर देखने लगती हो, क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है?


तो जगजननी माँ सीता जी का जवाब कुछ ऐसा था ..


सुन दशमुख खद्योत प्रकासा


कबहु की नलनी करही विकासा


अब इस प्रश्न का उत्तर समझो*"


जब श्री राम जी का विवाह माँ सीता जी के साथ हुआ, तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ बहुत उत्सव मनाया गया,जैसे की एक प्रथा है की नव वधू जब ससुराल आती है तो उस नववधू के हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है, ताकि जीवन भर घर पर मिठास बनी रहे !


इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथो से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार राजा दशरथ सहित चारो भ्राता और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे।


माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया सभी ने अपनी अपनी थाली सम्हाली, सीता जी देख रही थी,


ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया था ,।

माँ सीता जी ने उस तिनके को देख लिया, लेकिन अब खीर मे हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया,।


माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर जो देखा, तो वो तिनका जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया।


सीता जी ने सोचा *"अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा,!


लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी का यह चमत्कार को देख रहे थे,फिर भी इस दृश्य को देख दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष मे चले गए और माँ सीता जी को बुलवाया !


फिर राजा दशरथ बोले*" बहु मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था, आप साक्षात जगत जननी का दूसरा रूप हैं, लेकिन बहु , एक बात आप मेरी जरूर स्मरण रखना आपने जिस दृष्टि से आज उस तिनके को देखा था उस दृष्टि से आप अपने शत्रु को भी मत देखना।


इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी, यही है उस तिनके का रहस्य !


माता सीता जी चाहती तो रावण को जगह पर ही राख़ कर सकती थी लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन की वजह से वो शांत रही !



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