Hafsah Faquih

Abstract


4.1  

Hafsah Faquih

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शोरिश

शोरिश

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 अल्ताफ़ दवाखाने से घर की ओर लौट रहा था। बचते बचाते बस किसी तरह जल्द से जल्द घर पहुँच कर ख़ुद को बंद कमरे की रूसवाईयों में क़ैद कर के डाईरी के सफ़ेद पन्नो को एक दर्दनाक, घिनौने, काले अफ़साने से सजाना चाहता था। वो दौड़ा- दौड़ा घर पहुँचा, किसी के सवालों के जवाब दिए बग़ैर खाँसते- खाँसते अंधेरे कमरे में घुसा और कुंडी लगा दी। रात की उलटी के लाल निशान अब भी दीवार पर चमक रहे थे। अल्ताफ़ लड़खड़ाता हुआ अपनी मेज़ की ओर चला, और तूत की कुर्सी पर किसी ख़ौफ़ज़दा कबूतर की मनिंद बैठ गया। कांपते हाथो से सिगरेट जलायी, और खाँसी की आवाज़ में पेंसिल उठा कर डाईरी में वो हादसा दर्ज करने लगा जिसने उसके अंदर के मरते हुए इंसान को झँझोड़ कर रख दिया था। .


“दवाखाने से लौट रहा था। रास्ते सुनसान थे, परिंदो की चीख़ और आवारा कुत्तों के सन्नाटे के बीच, मेरे दिल में एक ख़ौफ़ घर कर रहा था। मस्जिदें बंद थी; अकबर चाचा की पान की दुकान, पड़ोस का शराब का ठेका, दूध वगैरा की दुकानें, सब के शटर गिरे हुए थे। महामारी का डर ख़ाली रास्तों पर बेख़ौफ़ नाच रहा था। मैं अपने ग़मों को गले लगाए, ज़हन के शोर में गुम, क़दमों को तेज़ी के साथ आगे बढ़ा रहा था; इतने में एक चीख़ सुनइ दी, बग़ल वाली खंडहर इमारत से। पर वहाँ अब कोई नहीं रहता यह सोच कर मैं अपनी दवा-खुराक समेटें फिर चलने लगा। एक और चीख़; इस बार पहले से ज़्यादा तेज़, पहले से ज़्यादा ख़ौफ़नाक। मैं बिल्डिंग की तरफ़ चला, वहाँ कोई नहीं था। एक और चीख़ सुनने पर अगली बिल्डिंग के पीछे गया। दोपहर की धूप में रास्ते पर पड़ा ख़ून मोतियों सा नज़र आ रहा था। चीख़ें धीर-धीरे कम होने लगी, देखा तो रास्ते पर एक पैंट पड़ी थी, दो क़दम दूर एक बेल्ट, एक फटी हुई शर्ट; और ज़रा और दूर एक नौजवान जिस्म का बढ़ता हुआ हिस्सा। वो लड़का वहाँ तड़प रहा था। लोखंड के पोल से बंधे उसके जवान जिस्म के दरमियान से ख़ून की नदी बहती देख मैं काँपने लगा। वहाँ से दूसरा लड़का चिल्लाया ‘आज की खुराक का क्या करें अब हम? तूने वादा किया था... पैसे भी लिए थे पूरे ३० ग्राम चरस के।’ इतने में दूसरे ने रॉड उठाइ और ज़ख़्मी लड़के की नंगी पीठ पर मारता हुआ बोला ‘हरामखोर! अगर हम बिना दवा के मर गए, तो साले तू भी साथ मरेगा।’ यह बोल कर दोनो ने एक दूसरे को देखा, ज़ोरदार ठहाका लगाया, अपनी पैंट की चैन खोली, और ज़ख़्मी लड़के को पोल से उतार गिराया। आज दोपहर जो मैंने देखा,...” .


ज़ोर की खाँसी आयी, डायरी पर ख़ून के धब्बे उड़े, सिगरेट मेज़ पर गिरी, तेज़ हवा चली, और पेंसिल ने ज़मीन पे गिर के दम तोड़ दिया। .


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