Mahavir Uttranchali

Abstract


5.0  

Mahavir Uttranchali

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शक्ति दा

शक्ति दा

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सड़कों पर वाहनों की आवा-जाही आज अपेक्षाकृत कुछ ज़ियादा ही थी। सुबह के वक़्त हरकिसी अपने काम पर पहुँचने की जल्दी। ऐसा लग रहा है कि मानव भी कोई रोबोट है जो दिमाग़ के दिशा-निर्देश अनुसार यंत्रवत भागम-भाग में लगा है। मैं भी दफ़्तर जाने की उहापोह में अपनी धुन में मगन था। बस स्टैंड पर कई लोग पहले से ही बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। अचानक उन्हीं लोगों के बीच शक्ति दा दिख गए। चेहरे से वे कुछ गुमसुम दिखाई दिए।

“प्रणाम शक्ति दा, और कैसे है ?”

“एक बेरोज़गार आदमी जैसा हो सकता है, वैसे हैं।”

“हाँ दादा मुझे दुःख है कि इस आर्थिक मंदी के दौर में आपकी भी नौकरी चली गई।” मैंने दुःख व्यक्त करते हुए कहा, “मैं उस रोज़ छुट्टी पे था, मुझे अगले दिन पता चला उस लिस्ट में आप का नाम भी आ गया। जबकि मुझे आपके निकलने की कोई उम्मीद, ठोस वजह नज़र नहीं आती।”

“अब तक जितनी कम्पनी में हमने काम किया। खुद ही वहां से नौकरी छोड़ा। ये पहली दफ़ा है जब कम्पनी ने मुझे निकाल बाहर किया। मैं एच.आर. वाली मैडम से भी खूब लड़ा था उस रोज़। जबकि मुझसे कम काम करने वाली दो-तीन लड़कियाँ और भी थी ग्रुप में उन्हें पुराना इम्प्लाई होने के कारण नहीं निकला। मैं उनसे दो साल बाद आया था, इसलिए मुझे निकल दिया।”

“कहीं और इंटरव्यू दिया ?”

“दो-तीन कम्पनी में दिया है, मगर हर जगह सबको पहले ही पता चल गया है कि शक्ति दा को कम्पनी ने निकाल दिया है। इसलिए कोई भी नौकरी में रखने को तैयार नहीं है।” शक्ति दा ने अपनी व्यथा व्यक्त की, “और तुम कैसे हो ?”

“दादा, कम्पनी में हालात ठीक नहीं हैं। कौन कब, कहाँ, कैसे कम्पनी से निकाल दिया जायेगा कोई नहीं जानता ?” मैंने भी अपनी हृदयगत आशंका ज़ाहिर की, “एक-दो महीने में काम नहीं आया तो हमारा जाना भी तय है।”

“अधेड़ उम्र में ज़िम्मेदारियाँ ही बढ़ रही हैं और रोज़गार के अवसर ख़त्म होते जा रहे हैं।” शक्ति दा ने बेहद मायूसी से कहा।ठीक इसी वक़्त एक बच्चा भीख मांगते हुए शक्ति दा के सामने आ गया, “साहब, कुछ दे दो।”

“स्साले, एक तो मेरी नौकरी नहीं है। ऊपर से पैसे मांग रहे हो। दफ़ा हो जाओ मेरे सामने से।” शक्ति दा उसे पीटने लगे थे। इस बीच मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। बच्चा डर के मारे आगे बढ़ गया।

“रिलैक्स दादा, क्यों बेवजह ग़रीब पे भड़क रहे हो ?” मैंने शक्ति दा को हमेशा शान्त और शिष्ट रूप में देखा था।

“पता नहीं मुझे आजकल क्या होता जा रहा है। किसी भी बात पर झुंझला उठता हूँ। किसी का गुस्सा किसी और पर निकाल देता हूँ।” शक्ति दा ने जिस तरीक़े से कहा, मैंने हृदय में महसूस किया कि नौकरी छूट जाने के बाद अवसाद की किस भयावह परिस्तिथि से वह गुज़र रहे हैं।

“मुझे लगता है कि कल को मेरे बच्चे भी ऐसे ही भीख मांगेगे। उनकी स्कूल फ़ीस भरने तक के पैसे नहीं बचे मेरे पास।” इससे पहले मैं कुछ कहता, शक्ति दा लगभग रोते हुए बोल पड़े। मुझे अपने भविष्य की चिन्ता हो आई। यदि कल को मेरी नौकरी भी चली गई तो क्या मैं भी ऐसा ही हो जाऊंगा। मैं पशोपेश में था कि इस वक़्त शक्ति दा को कैसे सांत्वना दूँ ?

“लो मेरी बस आ गई है।” मैंने स्टैण्ड की तरफ़ आती बस को देखकर कहा, “अच्छा दादा फिर मिलेंगे।”


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