सब बस एक पैसे के लिए
सब बस एक पैसे के लिए
पैसा…
एक ऐसा काग़ज़, जिस पर गांधी की तस्वीर और कुछ अंक छपे होते हैं।
लेकिन इंसान ने इसे सिर्फ़ काग़ज़ नहीं रहने दिया।
हमने इसे इतना महत्व दे दिया कि यह इंसानों से भी बड़ा बन बैठा।
आज ऐसा समय आ गया है जब पैसे को सब कुछ समझ लिया गया है।
हम मान बैठे हैं कि पैसे से हर चीज़ खरीदी जा सकती है—
चाहे वह कोई कीमती वस्तु हो,
या फिर किसी की इज़्ज़त।
हमने पैसे को इतना ऊँचा दर्जा दे दिया है
कि अब यह रिश्तों से ऊपर खड़ा दिखाई देता है।
यहाँ तक कि हम यह भी मानने लगे हैं
कि पैसे से किसी की ख़ुशी भी खरीदी जा सकती है।
लेकिन क्या सच में ऐसा है?
जिस ख़ुशी को हम पैसों से खरीदते हैं,
वह कुछ पल की होती है—
एक दिखावा,
एक छलावा।
क्योंकि सच्ची ख़ुशी
ना तो किसी दुकान में मिलती है,
ना ही किसी सौदे का हिस्सा होती है।
सच्ची ख़ुशी
सम्मान में होती है,
अपनों के साथ में होती है,
और इंसान बने रहने में होती है।
काश,
हम यह समझ पाते
कि पैसा ज़रूरी है,
लेकिन सब कुछ नहीं।
वरना एक दिन ऐसा आएगा
जब हमारे पास पैसा तो बहुत होगा,
पर इंसानियत
कहीं खो चुकी होगी।
और तब…
सब कुछ सच में
एक पैसे के लिए ही रह जाएगा।
Writer Ayush Raj
