सुबह की पहली धूप अनाया के चेहरे पर पड़ी,
पर उसकी आँखों में अब भी रात का अँधेरा ठहरा था।
आज पहली बार उसने आईने में खुद को देखा—
वह औरत नहीं, जो समझौते की आदत में जी रही थी,
बल्कि वह स्त्री, जिसके भीतर वर्षों से सच धड़क रहा था।
मोबाइल की स्क्रीन जली।
एक अनजान नंबर से संदेश था—
“अनाया, मैं आरव बोल रहा हूँ… हमें मिलना होगा।”
उसके हाथ काँप गए।
दिल ने एक पल को चीख मारी,
पर दिमाग़ ने फुसफुसाकर कहा—
अब भागने का वक्त नहीं है।
शाम को वही पुराना कैफ़े।
वही खिड़की के पास वाली मेज़।
सिर्फ़ लोग बदल गए थे—
और उम्र के साथ जमी ख़ामोशियाँ भी।
आरव सामने बैठा था।
आँखों में पछतावे की थकान,
और होंठों पर हज़ार अधूरे वाक्य।
“मुझे नहीं पता था, अनाया…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“अगर मुझे ज़रा-सा भी अंदाज़ा होता—”
अनाया ने पहली बार
उसे बीच में रोक दिया।
“तुम्हें अंदाज़ा नहीं था,
क्योंकि तुमने जानना ही नहीं चाहा, आरव।
मैं चुप थी…
और तुमने मेरी चुप्पी को सहमति समझ लिया।”
आरव की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैं डर गया था,”
उसने सच कहा,
“ज़िम्मेदारी से… भविष्य से…
और शायद अपने ही प्यार से।”
अनाया ने गहरी साँस ली।
“और मैंने डर को ओढ़कर
सब कुछ अकेले सह लिया।
पर आज मैं यहाँ
तुमसे कुछ माँगने नहीं आई हूँ।”
“तो फिर?” आरव ने टूटते स्वर में पूछा।
“सिर्फ़ सच रखने आई हूँ,”
अनाया बोली,
“ताकि यह कसक
मेरी साँसों का बोझ न बने।”
कुछ पल दोनों खामोश रहे।
फिर आरव ने धीरे से कहा—
“मैं अब भी तुम्हें चाहता हूँ…”
अनाया की आँखें नम हो गईं,
पर आवाज़ स्थिर थी।
“शायद मैं भी,”
वह बोली,
“पर अब प्यार काफी नहीं है, आरव।
अब ज़िम्मेदारी, समय और सच—
तीनों चाहिए।”
वह उठ खड़ी हुई।
“कुछ रिश्ते
देर से नहीं…
गलत समय पर समझ आते हैं।”
कैफ़े के दरवाज़े से बाहर निकलते हुए
अनाया को पहली बार
अपने भीतर हल्कापन महसूस हुआ।
घर लौटकर उसने नील को देखा—
उसकी शांत मौजूदगी,
उसका भरोसा,
उसकी अनकही वफादारी।
आज अनाया को तय करना था—
प्यार की कसक को
इल्ज़ाम बनाए रखे
या सच की रोशनी में
अपने भविष्य का चुनाव करे।
क्योंकि यह कहानी
अब सिर्फ़ प्रेम की नहीं थी—
यह चयन की कहानी बन चुकी थी।
और चयन…
अक्सर सबसे कठिन होता है।
कम्रश:.....
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