STORYMIRROR

Vandna Thakur

Romance

4  

Vandna Thakur

Romance

प्यार की कसक (अप्रकाशित कहानी — भाग

प्यार की कसक (अप्रकाशित कहानी — भाग

8 mins
2

सुबह की धूप खिड़की पर उतर रही थी,

पर अनाया की आँखों में रात अब भी रुकी हुई थी।
नील नाश्ते की मेज़ पर अख़बार पलट रहा था—
जैसे दुनिया बिल्कुल सामान्य हो।
और अनाया…
जैसे अपने ही भीतर एक युद्ध लड़ रही हो।

मोबाइल की स्क्रीन पर आरव का नाम
कई बार उभरकर मिट चुका था।
उसने कॉल नहीं किया था,
पर उसकी खामोशी अब अनाया को
और ज़्यादा डराने लगी थी।

नील ने धीरे से पूछा—
“सब ठीक है, अनाया?”

अनाया ने होंठ भींच लिए।
“हाँ… बस थोड़ा सिर दर्द है।”
झूठ बोलना उसे आता था—
पर आज झूठ भी काँप रहा था।

उधर, आरव ट्रेन से उतरते ही
सीधे अस्पताल नहीं गया,
सीधे किसी मंदिर भी नहीं गया।
वह बस सड़क किनारे एक बेंच पर बैठ गया,
और हाथों में वही नीला लिफ़ाफ़ा
बार-बार पलटता रहा।
जैसे उसमें सिर्फ़ एक रिपोर्ट नहीं…
उसकी पूरी ज़िंदगी बंद थी।

उसके कानों में वही पंक्ति गूंज रही थी—
“अगर उस दिन तुम रुके होते…”

वह अचानक उठा।
और पहली बार
उसने अपने भीतर के डर से कहा—
“अब भागूंगा नहीं।”

आरव ने अनाया को संदेश भेजा—
“मुझे तुमसे मिलना है। आज। बहुत ज़रूरी।”

अनाया ने पढ़ा।
उसकी उंगलियाँ काँप गईं।
उसने संदेश का जवाब नहीं दिया।
बस फोन सीने से लगाकर
आँखें बंद कर लीं।

सच यही था—
वह मिलना चाहती थी,
लेकिन डरती भी थी।
आरव से नहीं…
अपने अंदर टूटने वाली उस पुरानी अनाया से।

दोपहर तक अनाया
किचन में खड़ी रही,
पर हाथ कुछ कर नहीं रहे थे।
चूल्हे पर रखी दाल
उबलकर गिरने लगी थी,
जैसे उसका धैर्य भी उफन पड़ा हो।

नील ने गैस बंद की।
और पहली बार उसकी आवाज़ में
सख़्ती नहीं… चिंता थी।
“अनाया, मुझे सच बताओ…”
“तुम्हारे अंदर कुछ टूट रहा है।”

अनाया ने पलटकर देखा।
नील की आँखों में
शक नहीं था,
सिर्फ़ एक पति का विश्वास था—
जो बिना सवाल किए भी
सब महसूस कर लेता है।

उस विश्वास ने अनाया को
और दोषी बना दिया।

उसकी पलकों से आँसू गिरा।
“नील…”
“मैंने तुमसे एक बात छुपाई है…”

नील चुप रहा।
उसने बस कुर्सी खींचकर कहा—
“बैठो। और बोलो…”

अनाया बैठ गई।
जैसे कोई अपराधी
अपने ही सच की अदालत में खड़ी हो।

“आरव…”
उसका नाम निकलते ही
कमरा भारी हो गया।

नील की भौंहें हिली,
पर चेहरा शांत रहा।

“वो मेरे कॉलेज का…”
अनाया का गला भर आया।
“मैंने उसे बहुत चाहा था।”

नील ने धीमे से कहा—
“मैं जानता हूँ… कि तुम खुश नहीं थीं।”
“लेकिन मैंने कभी दबाव नहीं डाला…
क्योंकि मैं तुम्हारी खुशी के लिए
तुम्हारा इंतज़ार करना चाहता था।”

अनाया की साँस रुक गई।
इतना बड़ा सच
नील ने बिना सुने भी पढ़ लिया था।

वह रो पड़ी।
“नील… मैं माँ बनने वाली थी…”
“और… मैंने किसी को नहीं बताया…”
“मैं अकेली रही…”
“क्योंकि आरव चला गया…”
“और मैं… मैं डर गई थी…”

नील के हाथ से
पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।
उसने गहरी साँस ली।
काफी देर तक कुछ नहीं बोला।

और फिर धीमे स्वर में कहा—
“तुमने ये सब अकेले कैसे सहा, अनाया?”

उस एक सवाल में
गुस्सा नहीं था।
उसमें सिर्फ़ दर्द था—
कि उसकी पत्नी ने
इतना बड़ा पहाड़
अकेले ढोया।

अनाया ने सिर झुका लिया।
“मैंने सोचा…
तुमसे कहूंगी तो तुम्हें चोट लगेगी…”
“और मैं… किसी को चोट नहीं देना चाहती थी…”

नील की आँखों में पहली बार
एक टूटन दिखी।
“और तुम्हें चोट लगी…
तो क्या वो कम था?”

अनाया सिसक पड़ी।
कमरे में कुछ देर
सिर्फ़ उसकी रोने की आवाज़ थी।
फिर नील उठा,
और बिना कुछ कहे
अनाया के पास आकर बैठ गया।

उसने उसके सिर पर हाथ रखा।
“तुम्हें आरव से मिलना है?”

अनाया चौंक गई।
“क्या…?”

नील ने उसकी आँखों में देखा।
“मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं…”
“लेकिन मैं चाहता हूँ…
कि ये मुलाक़ात
तुम्हारी मुक्ति बने,
तुम्हारा ज़हर नहीं।”

अनाया की आवाज़ फूट पड़ी—
“मैं नहीं जानती, नील…”
“मैं बस इतना जानती हूँ कि
मेरे अंदर बहुत कसक है…”
“और आज वो कसक
मुझे तोड़ रही है…”

नील ने धीरे से कहा—
“तो मिल लो।”
“और जो सच है… उसे कह दो।”
“क्योंकि अनकहे सच
रिश्तों को चुपचाप मार देते हैं।”

शाम ढलने लगी।
अनाया तय जगह पर पहुँची—
वही पुराना स्टेशन का बाहर वाला चाय-स्टॉल,
जहाँ भीड़ होती है
और फिर भी कोई अकेला रह सकता है।

वह काँप रही थी।
हाथों में एक छोटा पर्स
और दिल में
पूरे दस साल का बोझ।

कुछ देर बाद
आरव सामने आया।
चेहरा पहले जैसा नहीं था।
आँखों के नीचे थकान थी,
और माथे पर पछतावे की लकीरें।

दोनों कुछ पल
बस देखते रहे।
जैसे समय भी रुक गया हो।

आरव ने बहुत धीमे कहा—
“अनाया…”
“तुमने ये सच
मुझसे छुपाया क्यों…?”

अनाया की आँखों से आँसू बह निकले।
“क्योंकि तुम चले गए थे, आरव…”
“और मैं उस दिन
अपनी ही ज़िंदगी से डर गई थी।”

आरव की आवाज़ टूट गई।
“मैंने भागकर गलती की…”
“बहुत बड़ी गलती…”

वह आगे बढ़ा
जैसे कुछ कहना चाहता हो,
पर शब्द नहीं मिले।

अनाया ने अपने आँसू पोंछे।
“आरव…”
“मैं तुम्हें ये सुनाने नहीं आई…”
“मैं बस… अपने अंदर की उस लड़की को
आज आज़ाद करने आई हूँ…”
“जिसने हर रात
तुम्हारे लौटने का इंतज़ार किया।”

आरव की आँखें भर आईं।
“और मैं?” उसने पूछा।
“मैं क्या करूँ, अनाया?”

अनाया ने एक लंबी साँस ली।
“अब तुम वो करो
जो तुमने तब नहीं किया…”
“सच स्वीकारो।”
“अपने हिस्से का अपराध स्वीकारो।”
“और ये मानो कि
हर देर से आया पछतावा
किसी की ज़िंदगी वापस नहीं देता…”

आरव ने सिर झुका लिया।
उसने पहली बार कहा—
“माफ़ कर दो…”

अनाया के होंठ काँपे।
माफ़ी आसान नहीं थी।
लेकिन कसक से बाहर निकलना
ज़रूरी था।

उसने धीमे कहा—
“मैं माफ़ करती हूँ…”
“पर लौटती नहीं।”

आरव ने चौंककर देखा।
“क्यों?”

अनाया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“क्योंकि मैं अब
अपनी शादी में
सिर्फ़ समझौता नहीं…”
“सम्मान भी ढूँढ रही हूँ।”
“और नील ने मुझे
कभी छोटा नहीं किया…”

आरव की आँखों में
आँसुओं के साथ
हार उतर आई।

“तुम खुश हो?” उसने पूछा।

अनाया ने सच कहा—
“मैं खुश होने की कोशिश कर रही हूँ…”
“और आज…
पहली बार मुझे लग रहा है
कि मैं साँस ले पा रही हूँ।”

आरव ने सिर हिलाया।
“तुम सही हो…”
“मैंने तुमसे प्यार किया था…”
“पर निभाया नहीं।”

अनाया उठ खड़ी हुई।
जाते-जाते उसने कहा—
“कुछ प्रेम…
अधूरे रहकर भी
जिंदगी भर पूरा रहते हैं।”
“और कुछ सच…
देर से कहे जाएँ
तो केवल दर्द बनते हैं।”

वह वापस मुड़ी।
भीड़ में खो गई।
पर इस बार
उसकी चाल में
कमज़ोरी नहीं थी।

घर लौटते समय
उसने नील को कॉल किया।
पहली बार
उसकी आवाज़ साफ़ थी।

“नील…”
“मैं घर आ रही हूँ।”

नील ने बस इतना कहा—
“मैं इंतज़ार कर रहा हूँ, अनाया।”

और उस एक वाक्य में
अनाया ने महसूस किया—
कि कसक का अंत
कभी-कभी प्रेम से नहीं…
सम्मान से होता है।

पर कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि जब सच बाहर आता है,
तो हर रिश्ता
एक नई परीक्षा में जाता है।

और अगले मोड़ पर
एक और तूफ़ान इंतज़ार कर रहा था…

(भाग 4 में: नील का टूटना, समाज की बातों का ज़हर, और अनाया का अंतिम निर्णय…)

क्रमशः…


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Romance