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Vandna Thakur

Romance Tragedy Inspirational

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Vandna Thakur

Romance Tragedy Inspirational

**प्यार की कसक** *(अप्रकाशित कहानी — भाग 2)* **लेख

**प्यार की कसक** *(अप्रकाशित कहानी — भाग 2)* **लेख

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**प्यार की कसक** *(अप्रकाशित कहानी — भाग 2)* **लेखिका: डॉ. वंदना ठाकुर**

 ट्रेन की आवाज़ दूर होती गई, लेकिन अनाया के भीतर कुछ था जो और तेज़ हो गया था—एक हूक, एक अधूरापन, एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर उसने खुद से भी छुपा रखा था। प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे खाली होने लगा, बारिश अब भी थमी नहीं थी। नीली बत्तियाँ बुझ रही थीं, जैसे शाम भी अब इस कहानी का बोझ नहीं उठाना चाहती हो। अनाया वहीं बेंच पर बैठ गई। हाथ खाली थे, पर मन असहनीय रूप से भरा हुआ। दस साल… पूरे दस साल उसने जिस सच को सीने से लगाए रखा था, आज वह सच फिर से उसके भीतर करवटें लेने लगा। आरव की वह आख़िरी नज़र—न शिकायत पूरी, न माफ़ी पूरी—बार-बार उसकी आँखों के सामने उभर रही थी। उसे याद आया—वह दिन, जब सब कुछ अचानक बदल गया था। कॉलेज का आख़िरी साल, सपनों से भरी उम्र और आरव का वह फ़ैसला—"मुझे बाहर जाना है, अनाया। करियर पहले… प्यार बाद में।" अनाया ने तब भी कुछ नहीं कहा था। उसने हमेशा की तरह चुप्पी ओढ़ ली थी। शायद तभी यह कसक जन्मी थी। आरव चला गया। वादे पत्रों में सिमट गए और फिर धीरे-धीरे ख़ामोश हो गए। घरवालों के दबाव में अनाया की शादी तय हुई। एक पढ़ा-लिखा, सुलझा हुआ इंसान—नील। समाज की नज़र में एक परफेक्ट रिश्ता। अनाया ने समझौता कर लिया, क्योंकि उसे सिखाया गया था कि औरत का प्रेम भी परिस्थितियों से बंधा होता है। पर नील के साथ रहते हुए भी अनाया का मन कहीं और अटका रहा। नील ने कभी उस पर शक नहीं किया, न ही सवाल। शायद यही उसकी सबसे बड़ी अच्छाई थी… और यही उसकी सबसे बड़ी भूल भी। शादी के तीसरे साल, जब अनाया ने पहली बार नीला लिफ़ाफ़ा खरीदा था, तब वह सिर्फ़ एक ख़त लिखना चाहती थी—आरव को नहीं, खुद को। उस ख़त में उसने अपना सच लिखा था। वह सच जो समाज के किसी खाने में फिट नहीं बैठता था। लिफ़ाफ़े में सिर्फ़ शब्द नहीं थे… उसमें एक रिपोर्ट भी थी। एक मेडिकल रिपोर्ट। वह सच, जिसे अनाया ने आरव से कभी नहीं कहा था—कि कॉलेज के आख़िरी साल में, आरव के जाने से ठीक पहले, वह माँ बनने वाली थी। और यह सच उसने अकेले सहा था। नील भी नहीं जानता था। बारिश में भीगते हुए अनाया स्टेशन से बाहर निकली। ऑटो में बैठी, तो लगा जैसे पूरी दुनिया उससे सवाल कर रही हो। क्या सही था? क्या ग़लत? क्या अब भी सच बताने का कोई मतलब था? उधर ट्रेन में बैठे आरव का मन भी शांत नहीं था। नीला लिफ़ाफ़ा उसकी जेब में था—अनखुला, भारी। अनाया का काँपता स्वर, उसकी आँखों की नमी—कुछ तो था, जो उसे चैन नहीं लेने दे रहा था। उसने लिफ़ाफ़ा निकालकर देखा। वही पुराना नीला रंग… जो कॉलेज के दिनों में अनाया की पसंद हुआ करता था। रात गहराने लगी। ट्रेन की खिड़की से बाहर अँधेरा दौड़ रहा था। आरव ने आख़िरकार लिफ़ाफ़ा खोल लिया। पहले ख़त निकला। हर शब्द जैसे उसकी साँसें रोक रहा था। अनाया की चुप्पी, उसका इंतज़ार, उसका अधूरा प्रेम—सब कुछ स्याही बनकर उसके हाथों में था। फिर रिपोर्ट। आरव की उँगलियाँ काँपने लगीं। आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वह वहीं सीट पर बैठा रह गया—स्तब्ध। "अगर उस दिन तुम रुके होते, आरव… तो शायद आज यह कहानी कुछ और होती," ख़त की आख़िरी पंक्ति उसके भीतर उतर गई। ट्रेन अपनी रफ़्तार से भाग रही थी, पर आरव का मन वर्षों पीछे लौट चुका था। उसे समझ आ गया था—यह कसक सिर्फ़ देर से कहे गए प्यार की नहीं थी… यह उस ज़िम्मेदारी की भी थी, जिससे वह भाग गया था। सुबह होते-होते उसने एक फ़ैसला कर लिया। कुछ सच ऐसे होते हैं, जिन्हें देर से ही सही, स्वीकार करना ज़रूरी होता है। और अनाया? वह खिड़की के पास खड़ी थी। सूरज उग रहा था, लेकिन भीतर का अँधेरा अभी बाकी था। उसने पहली बार सोचा—शायद चुप्पी हमेशा ताक़त नहीं होती। कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी। क्योंकि जब सच सामने आता है, तो प्रेम की कसक रास्ता बदल लेती है—या तो मुक्ति की ओर… या विनाश की ओर।

क्रमश:


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