Mahak Garg

Inspirational


4.3  

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पृथ्वी की रक्षा

पृथ्वी की रक्षा

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"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"


अर्थात् जन्म देने वाली माता और जन्मभूमि दोनो का स्थान स्वर्ग से भी ऊँचा हैं। जिस प्रकार हमारी माँ हमें सब दुखों से वंचित रखती हैं व हमारी हर खुशी का ध्यान रखती हैं, उसी प्रकार हमारी यह मातृभूमि हमें पेट भरने के लिए अन्न, पीने के लिए शुद्ध जल, पहनने के लिए वस्त्र, रहने के लिए स्थान, स्वच्छ हवा व जीवन जीने हेतु सभी आवश्यक चीज़े प्रदान करती हैं। यह कभी अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटती। जीव-जंतु, पशु-पक्षी, बच्चे-बूढे यह सबका परस्पर ध्यान रखती हैं। जन्म से लेकर मरण तक हम इसी की गोद में खेलते हैं। स्वर्गलोक वाक़ई में हैं भी या नहीं, हम नहीं जानते परंतु यह मातृभूमि हमें धरती पर ही स्वर्ग का एहसास कराती है।


" जहाँ तू छोटे से बड़ा हुआ

जहाँ जिंदगी का हर सुख पाया

आज उसी मातृभूमि को तूने चोट पहुंचाई

ऐ इंसान! तुझे दया भी न आई।। "


आज हम अपनी मातृभूमि के प्रति अपना कर्तव्य भूल चुके हैं। हमने इस धरती को न जाने कितनी चोटें पहुँचाई है, कितनी पीड़ा दी हैं। हमने इसके साधनो का दुरुपयोग किया। पेड़ काट, हरियाली को नष्ट कर दिया। न जाने कितने जीवों का सदैव के लिए अंत कर दिया। जंगलों को नष्ट कर, कितने पशु-पक्षियों को उन्हें उनके घर से अलग कर दिया। अपने स्वार्थ के लिये प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, बढती जनसंख्या, ओजोन परत उत्थान, जलवायु परिवर्तन आदि भयानक बिमारियों से इसे ग्रस्त कर दिया। औद्योगिकरण की होड़ में हमने अपनी जन्मभूमि को ही खतरे में डाल दिया है। बिना परिणाम सोचे, स्वयं के फायदे और दिखावे के लिए हमने अपनी पृथ्वी पर कितना अत्याचार किया है।


अब यह इसी का नतीजा है कि हम कोरोना वायरस जैसी महामारी से जूझ रहे हैं। विकसित देशों ने भी आज इसके सामने घुटने टेक दिए हैं। सब आधुनिक तकनीक इसके सामने धरी की धरी रह गई। अब तक न जाने कितने लोग इस संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं और कितने लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। दिन-प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या में बढोतरी हो रही हैं। अमीर हो या ग़रीब सब लोग एक ही नाँव पर सवार है। न ही अमीरों की तिजोरी, न ही ग़रीबो के आँसू आज काम आ रहे हैं। अब तो आलम यह हैं कि जो मनुष्य कल तक दूसरों को कैद करने की कोशिश करता था आज वह खुद अपने ही घर में कैद है। न वह किसी से मिल सकता है, न ही खुली हवा में सांस ले सकता है।


" सीधी उंगली से घी न निकले तो उंगली को टेढ़ा करना पड़ता हैं। " किसी ने बिल्कुल सही कहा हैं। पृथ्वी ने न जाने कितनी बार हमें अपने इस दुःख का एहसास कराने की कोशिश की। भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकंप, बाड़, बेमौसम बरसात का होना, तापमान का बढ़ना-घटना, आदि न जाने कितने तरीकों से अपने बीमार होने का प्रमाण दिया। परंतु हमने अपनी आँखों पर सुख-सुविधाओं की पट्टी कुछ इस क़दर बांधी हुई है कि हमने यह सब देखा ही नहीं। अंततः पृथ्वी ने स्वयं ही खुद को ठीक करने का बीड़ा उठाया और दिखा दिया कि " जैसी करनी वैसी भरनी। "


आज भले हम सब अपने ही घर में रहने के बावजूद छटपटा रहे हैं परंतु हमारी पृथ्वी आज साफ आसमां, स्वच्छ हवा में अपनी आज़ादी मना रही हैं। आज भले हम कोरोना से बचने के उपाय खोज रहे हैं परंतु हमारी पृथ्वी ने अपने घावों पर मरहम लगा लिया है और बहुत तीव्र गति से अपनी बिमारियों से निजात पाने की ओर कदम भी बढा लिए हैं। पृथ्वी ने प्रमाणित कर दिया कि यदि हम उसे परेशान करेंगे तो उसका अंजाम हमें ही भोगना पड़ेगा। पृथ्वी ने हमारे घमंड को चकनाचूर कर दिया और यह बता दिया कि हम इस पृथ्वी के मालिक नहीं है।


" परिंदे सोच में हैं

ज़माने क्या से क्या हो गये

दुनिया के ये लोग

आज बेबस और लाचार हो गये

नियति सबको परखती हैं यारों

देखो न! हमारे मालिक

आज खुद ही खुद के गुलाम हो गये।। "


आज एक ओर जहां हम अपने घरों में कैद है वहीं पंछी खुले आसमान में झूम रहे हैं। इंसान के पैरों में बेडियाँ है और बाहर जानवर सैर-सपाटे पर निकल चुके हैं। चंडीगढ़ में तेंदुए, कोझीकोड में मालाबार सिवीट नामक बिग कैट, मध्य प्रदेश में हिरण, मुंबई में डॉल्फिन, ओडिशा में ओलिव रिडले नामक कछुए दिखाई दिए। आसमान का असल रंग लौट आया। हवा में नई ताज़गी व उमंग हैं। अब दूर-दूर से पहाड़ों की चोटी दिखाई देती है। नदियों का जल शुद्ध हो गया है। प्रदूषण का स्तर घट रहा है। वातावरण में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा घटी हैं। प्रकृति की सुन्दरता मे चार चाँद लग गये हैं।


लोग कहते है कि दुनिया कई वर्ष पीछे चली गई है, बिलकुल सत्य कहा है। अब पृथ्वी फ़िर से पहले जैसी बनने के पथ पर अग्रसर हो गई है। जब मनुष्य ने पृथ्वी की परवाह नहीं की तो अब पृथ्वी ने भी मनुष्य की परवाह किए बिना अपनी धरोहर को ठीक करने की ठानी। पर आखिरकार हमारी मातृभूमि, हमारी जन्मभूमि है तो हमारी माता ही।यदि वह स्वयं को ठीक कर रही है तो वह भी हमारे ही हित में हैं।जब हवा साफ़ होगी तभी तो हम शुद्ध हवा में सांस ले पाएंगे। जब पानी साफ होगा तभी तो हमें शुद्ध जल पीने को मिलेगा। जब चारों ओर हरियाली होगी तो बाड़, अकाल, भूकंप जैसी समस्याएं उत्पन्न ही न होंगी।


" पृथ्वी हमारा घर हैं,

घर को नष्ट नहीं करते। "


बिलकुल सच बात है। जब हम सदैव अपने घर को साफ रखना चाहते हैं तो पृथ्वी को क्यों नहीं। यह भी तो हमारा घर ही है। हमारी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ईश्वर ने पृथ्वी को सब प्रकार के संसाधनों से परिपूर्ण किया तो अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसकी रक्षा करें। हमें ईश्वर ने सोचने के लिए दिमाग दिया है, देखने के लिए आँखें, बोलने के लिए मुंह, कर्म करने के लिए हाथ दिए हैं। हमें उनका सही तरह से उपयोग करना चाहिए।


हमें ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिये। पानी को दूषित न करें। जल का अपव्यय न करें। संसाधनो का ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें। कूड़ा-कचरा न फैलाए। आधुनिकरण और औद्योगिकरण की होड़ में वातावरण दूषित न करें। विषैले पदार्थों का उपयोग कम से कम करें।अपने स्वार्थ के लिए जानवरों की हत्या न करें। कभी किसी का दिल न दुखाए। पृथ्वी का जो मनुष्यों पर ऋण हैं, हम उसे उतार तो नहीं सकते परंतु अपने अच्छे कर्मो द्वारा उसे कम ज़रूर कर सकते हैं। इसकी धरोहर को सहेज कर इसका धन्यवाद अवश्य कर सकते हैं। हम अपनी पृथ्वी को बीमार न होने दें, इसका ध्यान रखें ताकि भविष्य में हमें कभी भी कोरोना जैसी महामारी का सामना न करना पड़े और हम सुख एवं शांति से अपना जीवन व्यतीत कर सके।



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