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परमानेंट टैटू

परमानेंट टैटू

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"भैया ये टैटू हटाना है.... आप कैसे भी करके इसे पूरा हटा दें।"

"मैडम ये परमानेंट टैटू है। इसे हटाने में आपको उतनी ही तकलीफ होगी जितनी इसे बनवाते समय हुई होगी। हो सकता है थोड़ा अधिक दर्द सहन करना पड़े। अच्छा बना हुआ है, आप इसे रहने दें तो ही अच्छा है।"

"नहीं अब मुझे ये नहीं चाहिए"

"कुर्सी पर बैठिए, देखता हूँ...."

प्रियंका टैटू देखते हुए याद कर रही थी, किस तरह संजय के साथ पढ़ते हुए उससे अथाह प्यार हो गया था और एक रोज उसने परमानेंट टैटू के रूप में उसका नाम अपने हाथ पर गुदवा लिया था।

इसी प्यार के रहते उसने माता-पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर संजय से प्रेम विवाह भी कर लिया था। पर ये प्रेम का बुखार कुछ ही दिन बाद धीरे- धीरे उतरने लगा था। संजय एक छोटे से गांव के एक गरीब किसान का बेटा था। अपने एक मित्र के साथ दो कमरों के घर में रहता था। उसके माता- पिता बमुश्किल उसकी फीस के पैसे देते थे। जिससे वह शहर में एय्याशी करता था।

विवाहोपरांत प्रियंका को संजय के दूसरे रूप, शराबी, झगड़ालू और अन्य लड़कियों से संबंध होने की जानकारी मिली। अभी तो नवजीवन की शुरुआत हुए दस- पंद्रह दिन ही हुए थे। उसके सामने पूरा जीवन पड़ा था उसे वापिस लौट जाने में ही अपनी भलाई लगी। माता- पिता के घर लौटकर उसने तलाक की अर्जी लगा दी। क्या सोचकर बनवाया था ये परमानेंट टैटू..... जब जीवन में संजय नहीं तो इस टैटू का क्या काम....!


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