Vinod Kumar Mishra

Drama


5.0  

Vinod Kumar Mishra

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परदेशी की प्रीति (भाग-1)

परदेशी की प्रीति (भाग-1)

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तकरीबन बीस वर्ष की दुबली-पतली व लम्बे कदकाठी की छरहरे बदन वाली खूबसूरत प्रीति स्नातक द्वितीय वर्ष की अंत:मुखी छात्रा थी। अपने शिक्षार्जनकाल में घर गृहस्थी व पापा के साथ दुकान के कार्यों में भी सहयोग प्रदान करती थी। स्वभाव से संकोची और दुकानदारी से अनभिज्ञ प्रीति मानवीय मूल्यों के संवर्द्धन हेतु सतत प्रयत्नशील थी।

अचानक एक दिन दुकान पर उसकी मुलाकात एक पच्चीस वर्षीय आकर्षक कदकाठी के परदेशी से हुई। जिनके मध्य सामान के प्रिंट मूल्य से अधिक पैसे लिए जाने के कारण तीखी नोकझोंक हुई और परदेशी ने अगले दिन से उसकी दुकान से सामान लेना बंद कर दिया। इस बीच प्रीति ने उस सामान का वास्तविक मूल्य अपने पापा से जान लिया था। जिससे उसे अपनी गलती का एहसास हो चुका था। वह परदेशी से क्षमा याचना हेतु मिलने के लिए परेशान हो गई किंतु परदेशी अपने वसूल का पक्का था। अपनी पत्नी, बच्चों व परिवार से अगाध प्रेम करने वाला परदेशी परदेश जाने से पहले ही यह संकल्प कर लिया था कि अपने कुल की मर्यादा के विपरीत कोई आचरण नहीं करेगा। जिसकी समझ में यह बात आ गई थी कि कुछ दुकानदार अधिक लाभ के चक्कर में अक्सर अपने दुकान पर युवा और खूबसूरत लड़कियों को काउंटर पर तैनात करते हैं। जिससे वह उस दुकान की तरफ जाना ही बंद कर दिया था। पश्चाताप की अग्नि में जलती हुई प्रीति की मुलाकात एक दिन पुनः सब्जी मंडी में परदेशी से हो गई। तब प्रीति ने विनम्रतापूर्वक क्षमा याचना करते हुए परदेशी से कहा कि पापा आपको बुलाए हैं। उनसे मिल लीजिएगा। जिसके आग्रह को स्वीकार करते हुए परदेशी उसके पापा से मिलने गया। औपचारिक शिष्टाचार के बाद प्रीति के पापा ने बताया कि उस दिन मूल्य को लेकर जो नोकझोंक हुई थी।उसके लिए प्रीति दोषी तो है लेकिन यह गलती उसने जानबूझकर नहीं किया था।क्योंकि वह दिनभर अपने कालेज रहती है और यदाकदा सायंकाल में दुकान पर सहयोग करती है।

परदेशी वास्तविकता से वाकिफ होकर पुनः आवश्यक वस्तुओं के क्रय हेतु उसकी दुकान पर जाने लगा। जहाँ उसे उचित मूल्य पर सामान के साथ सम्मान भी मिलने लगा। धीरेधीरे छ: माह का समय बीत गया और परदेशी अपनी आफिसियल ड्यूटी के पश्चात नियमित रूप से उस दुकान पर लगभग आधे घंटे का समय व्यतीत करने लगा। जहाँ प्रीति के पूरे परिवार से अपनापन मिलता था। वह अपने को सौभाग्यशाली समझने लगा कि परदेश में उसे किसी संभ्रांत परिवार का संरक्षण मिल रहा है।

एक दिन जब सायंकाल वह दुकान पर पहुंचा तो प्रीति के पापा वहाँ नहीं थे। प्रीति के साथ उसकी मम्मी, चाची और पड़ोस की दो अन्य किशोरियां मौजूद थीं। परदेशी कुछ समझ पाता कि इससे पहले ही प्रीति के अलावा अन्य सभी महिलाएं कुछ इशारों के साथ वहाँ से खिसक गईं। परदेशी को उनके इशारों का मतलब समझ में आ गया था कि वह सब परदेशी और प्रीति को दिल की बातें करने हेतु एकांत वातावरण देना चाहती थीं। जबकि परदेशी इन सबसे परे अपने आदर्श वसूलों पर कायम था। उसने प्रीति से पूछा कि आखिर उसके आने के बाद एकाएक सभी लोग क्यों चले गये ? तब प्रीति ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह तो मैं भी नहीं समझ पाई। फिलहाल परदेशी ने अपनी दूरदृष्टि से अनुमान को पक्का समझते हुए अगले दिन से उस दुकान पर प्रतिदिन बैठने का सिलसिला पुनः बंद करने का निर्णय ले लिया।

तीसरे दिन प्रीति ने उसके आफिस का टेलीफोन नम्बर किसी से पता करके फोन लगाया। घंटी बजी तो परदेशी ने फोन रिसीव करते ही... हैलो...गुड मार्निंग, आप कौन ? की आवाज लगाई।उधर से कोई आवाज न आई। यह क्रम तीन बार चला। चौथी बार उधर से बहुत ही धीमी और मधुर आवाज आई कि... हैलो सर मैं प्रीति बोल रही हूँ, आप कैसे हैं? पापा आपके न आने के कारण बहुत ही परेशान रहते हैं। आपको आज सायंकाल बुलाए हैं। आप आयेंगे न .... वादा करिए...। परदेशी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए झूठा वादा कर लिया किंतु वहाँ गया नहीं। अगले दिन फिर से उसी समय टेलीफोन की घंटी बजी। इस बार फोन रिसीव करते ही उधर से आवाज आई कि... हैलो सर, गुड मार्निंग, आप कैसे हैं ? खाना खाया कि नहीं और अंत में शिकायत करते हुए कहा कि कल आप आये नहीं,आज आयेंगे न ...।

परदेशी ने पुनः हाँ कर दिया किंतु उस शाम को भी नहीं गया। अगले दिन परदेशी सब्जी मंडी पहुंचा तो प्रीति के पापा एक चाय की दुकान पर बैठे थे। वह उन्हें देखकर भी अनदेखा करते हुए सब्जी लेकर वापस अपने रूम की तरफ लौट पड़ा। तभी पीछे से आवाज आई... वो परदेशी बाबू, आइए चाय तो पी लीजिए। दोनों चाय पीने के पश्चात उस दुकान से बाहर निकलने लगे। तभी प्रीति के पापा ने कहा कि आजकल आप हमारी दुकान पर आना बंद क्यों कर दिये हैंं? परदेशी ने बहाना बनाते हुए कहा कि अंकल आजकल आफिसियल कार्य का दबाव बढ़ जाने के कारण देर रात तक ओवरटाइम करना पड़ रहा है। तब उन्होंने कहा कि आपके न आने से प्रीति बहुत परेशान रहती है। ऐसा कहते हुए उन्होंने परदेशी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि आपके व्यक्तित्व से हमारा पूरा परिवार बहुत ही प्रभावित है और यह भी सच है कि उम्र के पड़ाव पर प्रीति सर्वाधिक प्रभावित है। जब से आपने दुकान पर आना बंद कर दिया है तबसे वह खाना नहीं खा रही है और दिनभर उदास रहती है। चलिए परदेशी बाबू एक बार उससे मिल लीजिए, वह आपको देखकर खुश हो जाएगी और खाना भी खा लेगी। दोनों एक साथ दुकान पर पहुंचे। जहाँ हर वक्त गुलाबी चेहरे पर मुस्कान की छटा बिखेरने वाली प्रीति स्याह-उदास बैठी थी। परदेशी को सामने देखकर वह हड़बड़ाई किंतु अब भी उसके चेहरे पर चमक नहीं लौट पाई थी। कुछ देर के बाद उसके पापा किसी बहाने से बाहर चले गए। तब प्रीति ने परदेशी से एक ही साँस में कई प्रश्न कर डाले। क्यों चले आये ? इतने दिन कहाँ थे ? न आने का कारण क्या था ? मेरी मौत से पहले क्यों आ गए ? परदेशी निरुत्तर सा उसके चेहरे पर अपनेपन की भाव भंगिमा को एकटक पढ़ने का प्रयास करता रहा...।

( शेष अगले भाग में )



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