Vinod Kumar Mishra

Inspirational


5.0  

Vinod Kumar Mishra

Inspirational


सहनशक्ति

सहनशक्ति

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साधारण परिवार में जन्म लेने वाले गप्पू के सिर पर मानो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा हो। जब वह तकरीबन सोलह वर्ष का था तभी उसके पिताजी की असामयिक मृत्यु हो गई थी। गप्पू अभी तक इस दुनिया को ठीक से समझने का प्रयास भी नहीं किया था कि पिता रूपी आकाश की छत्रछाया हटते ही धरती के इस शहंशाह को पग-पग पर ठोकरें मिलने लगीं। अब उसे अहसास होने लगा कि पिताजी की छांव में वह कितना सुरक्षित था। पिताजी की श्रेष्ठ संतान होने के कारण परिवार में माँ, भाई व बहनों के पालन-पोषण का दायित्व वह अपने कमजोर कंधों पर लेकर आगे बढ़ने का दृढ़ संकल्प किया और येनकेन प्रकारेण पिता के दायित्वों को सँभालते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर होने लगा किन्तु उसकी प्रगति पड़ोसियों को रास न आई। पिताजी के देहावसान के समय जिन पड़ोसियों की सहानुभूति मिल रही थी वही पड़ोसी अब गप्पू की राहों में काँटे बोने लगे। इन सबसे परे गप्पू अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहकर पारिवारिक दायित्वों यथा पालन-पोषण, शिक्षा व शादी व्याह का निर्वहन कर भाई को नौकरी दिलाने में सफल हुआ। इस बीच गप्पू अपनी नौकरी व गृहस्थी में सामंजस्य बैठाकर अपनी अर्जित आय को पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन में शत् प्रतिशत व्यय करता रहा।


जिम्मेदारियों ने गप्पू को धीरे-धीरे सहनशील बना दिया था किन्तु उसकी सहनशीलता का इम्तिहान आज उसके सामने था जब जर्जर भवन में जीवन यापन करने वाले गप्पू ने भाई के साथ एक नये मकान का निर्माण कराया और गृह प्रवेश की तैयारी करने लगा। तभी एक दिन उसके छोटे भाई ने स्वामित्व भाव से कहा कि भैया फलां तारीख को गृह प्रवेश है और आज के बाद मेरे पास आने की कोशिश मत करना। जिस भाई को गप्पू ने पुत्रवत स्नेह से सींचकर परिवार को आदर्श रूप में लाने के लिए दुनिया के तमाम थपेड़ों को सहन करते हुए अपनी सहनशीलता से परिवार को तराशा आज उसी भाई के चंद शब्दों ने उसे इतना आहत किया कि वह अपने दायित्व बोध पर पहली बार खुद को छला हुआ और शर्मिंदा महसूस कर रहा था। शेष कसर उसकी माँ, बहन और रिश्तेदारों ने पूरी कर दी। फिलहाल गप्पू अब भी अपने दायित्वों के निर्वहन हेतु गृह प्रवेश तक अपने आपको परिवार की खुशहाली के प्रति समर्पित कर गृह प्रवेश के बाद रिश्तेदारों को विदा कर इस दृढ़ निश्चय के साथ अपने पुराने मकान मे लौट आया कि भविष्य में कभी भी उस नये मकान पर अपना हक नहीं जतायेगा।

तीन दिनों तक उसके बीबी-बच्चे नये मकान से पुराने मकान पर आकर भोजन इत्यादि हेतु गप्पू से आग्रह करते किन्तु उन्हें क्या पता कि गप्पू ने त्याग रूपी तपस्या का व्रत धारण कर लिया है। आखिरकार पत्नी की जिद पर गप्पू ने पन्द्रह दिन पूर्व से अपने पर बीत रही कहानी को पत्नी से साझा किया और अपने अबोध बच्चों के भविष्य के प्रति चिन्तित होकर दो दिन तक बेसुध रहा। अचेतावस्था में गप्पू को किसी दिव्य शक्ति ने आकर समझाया कि परिवार के प्रति त्यागकर अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन करना सराहनीय है किन्तु अपनी संतानों के प्रति दायित्वों से मुंह मोड़ना कायरता है। जब उसे होश आया तो सहनशक्ति के रूप में पत्नी उसके सामने बैठी थी। जिद करके गप्पू को सूक्ष्म जलपान कराया और कहा कि अभी तो आपका कुछ भी नहीं बिगड़ा है। जरा सोचिए, यदि आप अपने को नहीं सँभालेंगे तो इन बच्चों का क्या होगा ? जो भाई और परिवार आपके त्याग को नहीं समझ सके, क्या वह आपके बीवी-बच्चों का सहारा बन सकेंगे ?


गप्पू ने पहली बार बीबी की बात पर गौर किया था और दुगुनी शक्ति के साथ गृहस्थी के अति आवश्यक सामानों की सूची बनाने हेतु कहकर फटाफट बाजार जाने के लिए तैयार हो गया था। तब तक सामानों की सूची पकड़ाते हुए पत्नी ने अपने पास कुल जमापूँजी तीन सौ रुपये गप्पू को दिया। हताश गप्पू के लिए तीन सौ रुपये मानों तीन हजार थे। वह साइकिल से बाजार पहुंचा और संकोच बस पत्नी ने जो आवश्यक सामान नहीं भी लिखा था उसको भी लेकर वापस घर आया। घर आकर उसने पत्नी को सारे सामानों के साथ दो सौ रुपये भी लौटा दिए। पत्नी अचंभित थी कि इतने कम पैसों में इतना सारा सामान कैसे मिल गया। तब गप्पू ने बताया कि सारे सामान उधार लिये हैं। जिसे पगार मिलने पर अदा कर दूँगा। जेब खर्च के लिए आपके द्वारा दिये गये तीन सौ रुपये में से एक सौ मैं अपने पास रख लिया हूँ। दोनों के चेहरे पर मुस्कान और अपनेपन का भाव अनायास ही छलक आया था।


शाम का भोजन तैयारकर पत्नी ने पति के लिए भोजन की थाली सजाते हुए भोजन करने हेतु आग्रह किया तब गप्पू ने अपने सभी बच्चों को नये मकान से बुलवाया और सबको एक साथ भोजन करने हेतु कहा। तब तक उसका बड़ा बेटा बोल पड़ा कि पापा भोजन नये मकान में बन रहा है। हम सब वहीं खा लेंगे। गप्पू इस दुनियां के शतरंज से अंजान अपने पाँच वर्षीय अबोध बच्चे को अपलक निहारते हुए मन ही मन समझाने का प्रयास करते हुए उसे दुलारा फिर सभी ने भोजन किया।


समय बीतते देर न लगी और कुछ वर्षों के बाद गप्पू के सभी बच्चे उच्च शिक्षित होकर अच्छे विभाग और पद पर नियुक्ति पाकर सहनशीलता और सहनशक्ति को परिभाषित कर रहे हैं।




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