Moorti Mishra

Abstract


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पर्दे की बूबू

पर्दे की बूबू

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बू शब्द का प्रयोग बुरी गंध के लिऐ किया जाता है। पर सामान्यतः बोलचाल की भाषा में बूबू का प्रयोग उस नाजुक इंसान के लिये किया जाता है ,जो नाजुक न होते हुऐ नाजुक होने का अभिनय करता है। और इस नाजुक होने के अभिनय के पीछे वह कामचोरी करता हैं। उसे लगता है कि वह अपने अभिनय से इुहै। पर जब वह अन्य व्यक्ति उसके इस अभिनय के पीछे की असलियत को समझ जाते है तो उसे संज्ञा दे दी जाती हे पर्दे की बूबू । फिर वह चाहे नर हो या नारी । श्रीमती मिनाक्षी देवी वाजपेयी शहर के व्यस्तम इलाके में रहती है। बीच बाजार मे रहने वाले क्या पर्दे में रह सकते है, कहने का अर्थ है यह है कि बाजार की व्यस्तता चहल पहल शोर शराबा और आवागमन हर समय इतना ज्यादा होता है कि हर रहवासी बाहर निकले बिना रह ही नही सकता वह आदतन ही बाहर का एक चक्कर अवश्य काट ही लेता है। श्रीमती मिनाक्षी देवी करीब पंद्रह सालो से छोटी बाजार मे रह रही है वे इतनी पर्दानशीन औरत है कि अगर उनके घर पर किसी भी वक्त पहुॅचा जाए तो बाहर का कमरा जो बैठक के लिऐ इस्तेमाल होता है उससे लगा दूसरा कमरा दोनो के बीच बडा सा पर्दा लगा है जो दानो कमरो को दो अलग भाग मे बांटता है । पानी या आवभगत के लिऐ परोसी जाने वाली वस्तुऐं केवल उस पर्दे से एक हाथ निकलकर बाहर आता है जिसने एक ट्रे पकडी होती है उस ट्रे को मेहमान स्वयं हाथ में लेकर अपनी इच्छानुसार स्वयं ही अपनी आवश्यकता नुसार अपनी आवभगत कर लेता है।

छोटे शहरो मे सुबह का एक बहुत ही सामान्य व्यवहार होता है या नजारा होता हे कि घर की औरते या आदमी एक छोटी सी बुहारी लेकर घर के बाहर सडक तक बुहारी कर देती है। कमान की तरह झुकी हुई बुहारते बुहारते सडक के उस ओर तक भी बुहार लगाती हुई गजगामिनी और विजेता की तरह लौट आती हैं। श्रीमती मीनाक्षी देवी भी इसी तरह झाडू बुहारी के लिये निकलती है पर सिर पर एक हाथ लंबे घूंघट में छुपा होता है। भले ही कमर का हिस्सा खुला रहे पर सिर पर लंबा घूंघट अवश्य रहता है। अक्सर उनके गिर जाने का भय बना ही रहता है कमान की तरह झुका शरीर और लंबा घूंघट कहीं पैर न फिसल जाये यह ख्याल जो भी देखता उसके मन में बना ही रहता। वे बुहारते बुहारते सडक के उस पार पहॅंुच जाती है फिर सीधे खडी होती लज्जा और शरम से सराबोर झाडू को अपने पल्लू में छुपाती है और घूंघट को और लंबा कर वापस घर की ओर उन्मुख होती है । दिन के 24 घंटो में केवल इन पंद्रह मिनट में उन्हें देखा जा सकता है। बाकि वक्त में यदि उनके घर पर जाये तो वो केवल उनके पर्देे में से निकलते हाथ को देख सकता है। यहाॅ प्रश्न यह है कि वो इन मिनटो में भी बाहर क्यों निकले यह काम तो नौकरो से भी कराया जा सकता है । उनके पति का घर से घर भोजन देने और घर पर खाने खिलाने का व्यवसाय है। जिसमे श्रीमती मीनाक्षी देवी की हिस्सेदारी बराबरी की है। यानि खाना वे ही बनाती है। लगातार आने वाले और खाने वाले ग्राहकों ने भी उन्हे नहीं दंेखा है। बस खाने के स्वाद से बता सकते है कि वे अति सामान्य महिला है।कभी ऐसे वक्त मे जब श्रीमान वाजपेयी नही होते है तो खाने के बाद जो पैसा चुकाया जाता है उसमें केवल श्रीमती मीनाक्षी की आवाज सुनाई देती है जी 120 रू वहीे पर रख दे। ग्राहक पैसा रखकर चला जाता हैं। जब कभी कोई ग्राहक बिना मूल्य चुकाये जाने का प्रयास करता तो उनके दोनो हाथ तलवार की भांति लहराते हुएं आते और कालर पकड कर जेब से पैसा निकाल कर वापस चले जाते तब भी वे बाहर नहीे आती वे ऐसे ही पर्देकी बूबुू नहीं कहलाती है।आम धारणा थी कि वे बहुत उचें खानदान से थी इसलिये शरमो हया का पर्दा ओढे रखती थी पर सच तो यह था कि वे अपने से ऊॅंचे खानदान मे आ गई थी बिना शादी के रह रही थी इसलिये पर्दा करती थी।






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