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फरमाइशें

फरमाइशें

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अपने पिता से नई बाइक के लिए झगडकर,मुदित बाहर आ गया|चलने में दिक्कत हुई,तो उसकी नज़र उसके जूतों पर गई|

”ये क्या,फटे जूते|ये जूते तो मेरे नहीं हैं|ये तो पापाऽऽ के जूते हैं”|पापा फटे जूते पहन रहे हैं, और मैं ब्रांडेड शूज|कितनी बार कहा है अपने लिए नए जूते ले लो,फिर भी नहीं लेते|न जाने क्या रखा है इन फटे जूतों में|

अपने पॉकेट से जब मुदित ने पर्स निकाला,तो वह भी उसका नहीं था|हड़बड़ी में वह अपने पिता के जूते और पर्स लेकर आ गया था|पर्स खोलने के बाद उसकी आँखें भर आई|उसमे मुदित के बचपन की तस्वीर थी|उसमें कागज भी था,जिसमे मुदित की सारी फरमाईशें लिखी थी|लैपटॉप और नए कैनवास शूज-जुलाई में,नई बाइक-सितम्बर में,नया फ़ोन-जनवरी में....|आगे पढ़ने की हिम्मत अब मुदित में नहीं थी|उसका कलेजा धक् रह गया और आँखों से आंसुओं की धारा बहने लगी|उसने कितनी बड़ी गलती की थी|पापा खुद अपने लिए कुछ नहीं लेते|फटे जूते पहनते हैं ताकि मुझे अच्छे जूते मिल सके|अपनी जरूरतों से पहले मेरी बेकार की फरमाईशें पूरी करते हैं|

मुदित को अपनी गलती का एहसास हो गया था|


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