पहला प्यार ,आखरी मौका
पहला प्यार ,आखरी मौका
सायंकाल का समय था, शर्मा जी का घर रौशनी से सराबोर पूर्णीमा के चाँद सा जगमगा रहा था, महमानों का जमघट लगा हुआ था। बच्चों की नजरे मिठाईयों और आईसक्रीम के स्टाल पर टिकी हुयी थी, नौजवान यूवक-युवतिया भी आड़ी-टेड़ी निगाहों से एक दुसरे को निहार रहे थे, अधेड़ वर्ग के पुरूषो की नजरे दुसरे की बीवियों पर जमी हुयी थी, ओर उनकी बीवियों की नजरे दूसरी औरतो के गहनो और उनके पहनावे पर।
कोई फिल्मी गानो की धुन पर नाच रहा था तो किसी को शराब नचा रही थी।
आखिर क्यों ना नाचे भई ? आज शर्मा जी की इकलौती बेटी नेहा की मेहदीं जो है।
सब लोग खुश नजर आ रहे हैं लेकिन नेहा का चेहरा कुछ लटका हुआ सा उदास नजर आ रहा है, उसकी नजरे उसके फोन पर टिकी हुयी है, हर दो मिनट बाद वो किसी को फोन मिला रही थी लेकिन उसके चेहरे पर पड़े शिकन के निशान बयां कर रहे थे कि कोई उसका काॅल रिसीव नही कर रहा है।
राकेश काॅलेज के जमाने से ही उसका बाॅयफ्रेंड ,उसका पहला प्यार था, वो उसे बहुत चाहती थी।
उसने बहुत बार घर वालो से कहा भी था कि वो सिर्फ राकेश से प्यार करती है और उसी से शादी भी करना चाहती है ,लेकिन शर्मा जी ने उसकी एक ना सुनी। हर बार उनका यही जवाब होता कि राकेश का चरित्र कुछ ठीक नहीं और ना ही उसका कोई भविष्य है।
नेहा पुरानी यादों में पूरी तरह से खोयी हुयी थी कि तभी उसका फोन बजना शुरू हुआ , हाॅ ये वही नम्बर था ,जो वो न जाने कितने समय से मिलाये जा रही थी।
‘‘हैल्लो राकेश‘‘ वो बोली।
‘‘ अब तुम्हे क्या चाहिये? क्यों फोन कर रही हो?‘‘ दूसरी ओर से आवाज आयी।
‘‘ कल मेरी शादी होने वाली है, बस आखरी बार बात करना चाहती हूं।‘‘
‘‘ मुझे कोई बात-वात नही करनी, उसी अमरीका वाले डाॅक्टर से कर लो बात जिस्से शादी करने जा रही होे कल‘‘।
‘‘ यार मेरी मजबूरी भी तो समझने की कोशिश करो कभी! ये शादी क्या मैं अपनी खुद की मर्जी से कर रही हुं? अपनी पूरी जिदंगी मैं मैने सिर्फ तुम से प्यार किया है यार,लेकिन मैं घरवालों के खिलाफ भी तो नही जा सकती ना!‘‘
‘‘एक बार फिर सोच लो नेहा! ये तुम्हारी जिन्दगी है, फैसला भी तुम्हारा खुद का होना चाहिये, तुम अभी भी चाहो तो मै वहां आकर ये शादी रोक सकता हुं, तुम बस हाॅ बोल दो, किर कोई भी हमे एक होने से नही रोक पायेगा, कानून भी नही‘‘।
‘‘ प्लीज राकेश! समझने की कोशिश तो करो, ये जिन्दगी मेरी जरूर है, लेकिन जिन लोगों ने ये जिदंगी दी है, मै उनके खिलाफ कोई ऐसा कदम नही उठा सकती जिसकी वजह से वो लोग जिंदगी भर पछताते रहें। मैं तो बस आखरी बार तुमारी आवाज सुनना चाहती थी, बस इसी लिये तुम्हे काॅल की थी। साॅरी मै जिदंगी भर साथ निभाने का वादा पूरा न कर सकी, हो सके तो मुझे माफ कर देना‘‘।
‘‘ जब तुम्हे सारे फैसले घरवालों की ही मर्जी से ही करने थे तो ऐसे वादे क्यों किये थे जिनको पूरा करना तुम्हारे लिये मुमकिन नही?।
तुम धोखेबाज हो नेहा! धोखेबाज! खैर धोखा भी वही देता है जिस पर सबसे ज्यादा यकीन हो। सारी गलती मेरी ही है।‘‘
‘‘ राकेश, तुम्हे पता है यार मैने पापा को मनाने की कितनी कोशिश् की थी, लेकिन वो फिर भी ना माने क्योकि उनको तुम्हारा ये बेफिकरों वाला लाईफ स्टाईल पसंद नही था, मैने भी ना जाने तुमसे कितनी बार कहा था कि कोई ढंग की नौकरी ढूंढ लो, लेकिन तुमने मेरी एक ना सुनी। कोई जाॅब वगैरा कर लेते तो शायद पापा मान भी जाते, लेकिन, तुम्हे दिन भर दोस्तो केे साथ इधर-उधर भटकने से फुर्सत मिलती तब ना। प्यार का मतलब सिर्फ घरवालों से बगावत करना ही नही होता, इसके साथ बहुत सी जिम्मेदारियां भी आती है। सिर्फ खुद के बारे मे सोचना ही प्यार नही।‘‘
‘‘ तो तुमने आज आखरी बार काॅल किया, यही सब उपदेश देने केे लिये? अपनी फिलाॅस्पी अपने पास रखो, मुझे कुछ नही सुनना अब। मैं बस इतना जानता हूं कि मै तेरे बिना जी नही सकता, मर जाउंगा मैं! और तुम जानती हो इसका जिम्मेदार कोन होगा।‘‘ इतना कहकर राकेश ने फॅौन डिस्कनैक्ट कर दिया।
नेहा अब गहरी सोच मेे डूब गयी, राकेश की चिंता उसे अब खाये जा रही थी।
पुरानी यादों का सफर शुरू हुआ, वो पल याद आने लगे जब वो कॉलेज में पढ़ रही थी और राकेश उसके पीछे पड़ा हुआ था। उसने उसे कई प्रेमपत्र दिए लेकिन नेहा का जवाब हर बार 'ना' होता। अंत में एक दिन उसने मर जाने की धमकी दी ,नेहा ने कोई प्रतिक्रिया न दी तो उसने ब्लेड से अपने हाथ की नस काट दी, फिर जाकर नेहा को उसके प्यार का एहसास हुआ, और धीर -धीरे वक्त के साथ साथ उनका प्यार परवान चढ़ने लगा।
नेहा बीते वक्त की दुनिया में इस कदर खोयी हुई थी की उसे पता ही नही चला की कब उसकी हथेलियों पर मेहदी लगा दी गयी। उसमे उस मेहँदी को देखा और वास्तविकता से परिचित हुयी। अब वो उन दो दुनिया के बीच में आ खड़ी थी जहां एक और उसका पहला प्यार उसके अतीत की धुंदली परछाईयाँ थी और दूसरी तरफ उसका आने वाला कल ।
किंकर्तव्यविमूढ़ , भावविहीन नेहा को समझ नही आ रहा था कि अब क्या करूँ, वो तबियत खराब होने का बहाना बनाकर सहेलियों से अलग हुयी और अपने कमरे की तरफ चल दी। अपने हाथ में लगी मेहंदी के डिज़ाइन को वो देखने लगी और आने वाले कल के बारे में सोचने लगी, लेकिन बीच-बीच में बेचारे राकेश का ख्याल भी उसे परेशान करने लगा।ख्यालों में खोई नेहा की कब आँख लग गयी उसे बिलकुल पता न चला।
अगले दिन सुबह के 6 बजे वो बिस्तर से उठी, उसने हाथो में लगी मेहँदी को निहारा, मेहंदी का वो गाढ़ा लाल रंग जो उसकी नयी जिंदगी की शुरुवात का सबूत था जो उसकी आँखों में छाने लगा लेकिन तभी अगले ही पल अचानक राकेश की तस्वीर उभर कर उसके जहन में आयी। देखते ही देखते दोनों तस्वीरें एक दूसरे में समा गयी और राकेश का वो मुस्कुराता चेहरा गहरे लाल रंग में डूब गया उसके हँसते मुस्कुराते चेहरे से अगले ही पल खून टपकने लगा।
"Oh my god" वो चिल्लायी।
उसका भ्रम टूटा और वो वास्तविक दुनिया में आयी, अब सिर्फ मेहंदी ही नजर आ रही थी लेकिन राकेश का ख्याल अभी भी उसके दिल में उथल पुथल मचा कर उसकी बेचैनी बढ़ा रहा था।
कहीं वो कुछ कर न दे, एक बार फिर फोन करती हूं, कल रात ढंग से बात नही हो पाई, उल्टा मेने ही उसे खरी खोटी सुना दी थी, माफ़ी मांग लेती हूं, उसने सोचा।
राकेश को फोन मिलाया लेकिन ये क्या? फोन स्विचड ऑफ़ बता रहा है, उसने फिर कोशिश की लेकिन सारी कोशिशे बेकार साबित हुयी। उसका डर घड़ी की टिक- टिक के साथ बढ़ता गया, किसी अनिष्ट की आशंका से वो इतनी घबरा गई क़ि मजबूरन उसे वो फैसला लेना पड़ा जो उसके खुद के उसूलों के खिलाफ था।
उसने अपनी डायरी खोली और लिखना शुरू कर दिया।
पापा I'm sorry
मैं ये शादी नही कर सकती,
में राकेश से प्यार करती हूँ और वो भी मेरे बिना नही रह सकता।
में जा रही हूँ, जानती हूं ये गलती बहुत बड़ी है लेकिन आपने हमेशा मेरी हर गलती माफ़ की है, प्लीज् ये आखरी गलती भी माफ़ कर देना।
उसने जल्दी से वो पन्ना फाड़ा और मेज पर रख दिया। खिड़की खोली और घर छोड़ कर भागने लगी। ये सब काम उसने इतनी जल्दबाज़ी में किया कि वो अपने साथ कुछ भी लेकर नही आयी, उसके पास टेक्सी के लिए भी पैसे नही थे, वो पैदल ही चले जा रही थी, हालांकी राकेश ज्यादा दूर नही रहता था फिर भी उसे कभी इतना भागने की आदत नही थी। लगभग आधे घंटे की दौड़ भाग के बाद वो वहां पहुंची जहाँ राकेश किराये पर रहता था।
उसने दरवाजा खटखटाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया उसे अंदर से आवाज सुनाई देने लगी।
" बाबू तुम यहाँ कैसे रह लेते हो? कितने मच्छर है यहां। मै तो पूरी रात सो भी नही पायी, एक तो ये खून चूसने वाले मच्छर और ऊपर से तुम"।
ये किसी लड़की की आवाज थी। नेहा कुछ समझ पाती इससे पहले राकेश बोला
" तो ज्यादा परेशान किसने किया? मच्छर ने या???
नेहा का दिल जोर जोर से धड़क रहा था,ये सब सुनने के बाद जैसे नेहा के पाँव के नीचे से जमीन सरक गयी । उसे अपने कानों पर यकीन नही हो रहा था कि कल तक जो मारने मरने की कसमें खा रहा था क्या अंदर वही शख्स है या कोई और?
खैर नेहा ने थोड़ा हिम्मत दिखाते हुए दरवाजा खटखटाया।
"कोन हैं" अंदर से वही जानी पहचानी आवाज आयी।
अब नेहा का शक पुरे यकीन में बदल चुका था ।
"नेहा हूं।" वो बोली। अब राकेश की बोलती बंद हो चुकी थी।
"ये नेहा कौन है बाबू? " अंदर से फिर वही अनजान लड़की की आवाज आयी।
"दोस्त है," वो बोला "अरे नेहा आज तो तुमारे शादी होने वाली थी ना? फिर तुम यहाँ कैसे?? "।
नेहा अब खामोश थी, जैसे अब उसका पूरा शब्दकोष ही खाली हो गया हो, बोलती भी तो क्या? उसकी पूरी दुनिया जो लुट चुकी थी। उसने आगे कुछ न कहा और न ही अब उसमें कोई इच्छा थी आगे कुछ कहने सुनने की। वो चुप-चाप दबे पांव दरवाजे से ही वापस उसी दिशा में लौट गयी जहाँ से वो आयी थी। मन ही मन खुद को कोस रही थी वो, उसके कदम वापस घर की तरफ को आगे बढ़ रहे थे लेकिन जैसे उसके मन में वक्त का पहिया पीछे भूतकाल की तरफ घूमने लगा। अब वो एक साथ दो दुनियाओं का सफर कर रही थी।
2 साल पीछे जाकर कहीं वक्त का वो पहियां रुका ,नेहा उस दौर में पहुँच गयी जब पूरे कालेज में नेहा और राकेश का प्रेम प्रसंग मशहूर हो रहा था , और किसी परिचित व्यक्ति ने ये बात उसके पापा को बता दी। नेहा के पापा ने उसे पास बुलाया और बोले " बेटा ये मैं क्या सुन रहा हूं? तुम उस लफंगे के साथ दिन भर हाथ में हाथ डाले सड़को पर घूम रही हो? यही सब करने के लिए कॉलेज जाती हो क्या?"
"सॉरी पापा! में आपको को सब कुछ बताने ही वाली थी , मैं और राकेश एक दूसरे से प्यार करते है। हम लोग कॉलेज के बाद शादी करना चाहते है।" "बेटा तू अभी नादान है, तुझमे लोगो को पहचानने की समझ नही। और ना ही मैं प्यार के खिलाफ हूँ, लेकिन राकेश तेरे लिए सही लड़का नही है।"
ये दृश्य नेहा की आँखों के सामने घूम रहे थे कि तभी उसे अहसास हुआ कि उसने आज क्या गलती कर दी, वो दौड़ कर घर की तरफ जाने लगी, इससे पहले कि वो ख़त जो उसने भागने से पहले पापा के लिये लिखा था , उसके पापा के हाथ लग जाये उसे घर पहुंचना ही होगा, उसने सोचा। दौड़ते दौड़ते वो घर पहुंची । चारों ओर सन्नाटा फैला था। जैसे कल तक शादी की जो रौनक थी वो आज किसी मातम के सन्नाटे में बदल गयी हो। मकान को रोशन करने वाले छोटे छोटे बल्बों की मालाएँ निकाली जा रही थी। जो लोग कल तक रंग - बिरंगे कपड़ो में नजर आ रहे थे आज वो कही दिखाई नही दे रहे थे।
शादी का टैंन्ट, साउंड सिस्टम , सब सामान वापस गाड़ी में पैक किया जा रहा था, फिर धीरे धीरे लोग वहां से जाने लगे। वो सीधे दौड़ कर घर में घुसी, उसने देखा परिवार क अधिकांश सदस्य सब सफ़ेद कपड़ो में है। "क्या हुआ!" वो चिल्लाकर बोली। "शर्मा जी नही रहे।" एक सज्जन ने दबी हुई आवाज में कहा। "कैसे हुआ?" "हाई ब्लड प्रेशर था। हार्ट अटेक्ट आ गया।" नेहा अब मौन थी, जैसे उसे कोई सांप सूंघ गया हो। वो दौड़ कर अपनी माँ के पास गयी और फूट-फूट कर रोने लगी। वो लगातार रोये जा रही थी, और दूसरी तरफ शर्मा की की अर्थी को तैयार किया जा रहा था।
"Im sorry papa, please उठ जाओ" अर्थी के पास जाकर वो चिल्लाने लगी " माफ़ कर दो। आपने हमेशा मेरी हर बात मानी है, please ये बात भी मान जाओ, जैसा आप बोलोगे में अबसे वैसा ही करूँगी। माफ़ कर दो, मै आपके बिना नही जी सकती, please मुझे अपने आपसे दूर मत करो! Please! Please! Please! उठ जाओ। कुछ तो बोलो, डाँटो मुझे, चाहे तो मार भी लो, लेकिन कुछ तो बोलो। मैं नही रह सकती आपने बिना।"
रोते नेहा को ये एहसास हुआ कि वो अपने पापा से कितना प्यार करती है। हालांकि कुछ देर पहले जब वो राकेश की हकीकत से वाकिफ हुयी थी तो उसे बहुत बुरा लग रहा था, लेकिन वो दर्द इस पीड़ा से बहुत मामूली था ।
लोग , दार्शनिक ,विद्वान और विचारक सभी कहते है कि एक लड़की का पहला प्यार उसका पिता होता है, जो उसे बिना किसी शर्त के प्यार करता है और उसके लिए दुनिया की हर तकलीफ झेल लेता है, और बदले में कुछ नही मांगता। शायद यही कारण है कि लड़कियां अपने प्रेमी या पति में अपने पिता की ही तस्वीर ढूंढती है। और लोग ये भी कहते है कि किसी चीज़ की कीमत उसके खोे जाने के बाद ही पता चलती है। आज नेहा को लोगो की वो बात और सच्चे प्रेम का अर्थ समझ आ गया था।
नेहा जोर जोर से रो रही थी, उसकी आँखे नम पड़ गयी थी , चिल्ला चिल्ला कर गले की हालत ख़राब हो गयी थी ।
लेकिन तकदीर में जो लिखा हुआ था उसे मिटाया नही जा सकता है, और न ही बीता हुये कल में वापस जा कर उसे सुधार जा सकता है, सुधारा जा सकता है क्या? क्या जिंदगी दूसरा मौका देती है? शायद कभी नही(!) शायद कभी कभी(!)।
"उठ जाओ बेटा! आज तुमारी बारात आने वाली है। और नींद में क्यों चिल्ला रहे थे बच्चे? मैं यही तो हूं तुम्हारे पास! आँखे खोलो, आज बहुत काम करने है, उठ जाओ जल्दी से।" शर्मा जी बोले।
नेहा ने आँखे खोली, उसके पापा उसके सामने खड़े थे। सपना टूट चुका था, जिंदगी ने उसे दूसरा मौका दे दिया था, इस डरावने सपने नेे उसकी आँखे खोल दी थी। वो बिस्तर से उठ कर पापा के पास गयी और उसे गले से लगा कर बोली " I'm sorry papa, I love you" शर्मा जी हैरान थे कि कल तक गुमशुम रहने वाले नेहा को आज अचानक क्या हो गया, लेकिन नेहा खुश थी, मानो आज पूरी दुनिया की दौलत उसे मिल गयी हो , उसे पता चल गया था सच्चे प्रेम का अर्थ।
और प्रेम ही पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ,लेकिन इससे पहले ये जानना भी जरुरी है कि प्रेम आखिर है क्या ?? नेहा ने एक सपने में ही प्रेम के वास्तविक अर्थ को समझ लिया था या यूँ कहे कि उसे जिंदगी ने दूसरा मौका दे दिया था। लोग अपनी पूरी जिंदगी गवां देते है लेकिन फिर भी ये साधारण बात उनके पल्ले नहीं पड़ती, जो बात नेहा को एक रात में पता चल गयी थी ।
लेकिन ये भी सच है की जिंदगी बेरहम है, ये हर किसी को दूसरा मौका नहीं देती ।
आज भी समाज में नेहा जैसी हज़ारों लड़कियां है जो बहकावे में आकर अनजाने में ही उन लोगो को तकलीफ देती है जिन्होंने अपनी पूरी उम्र ही उनके लिए समर्पित कर दी थी। जिन्होंने अपने बच्चो से निस्वार्थ भाव से प्रेम किया लेकिन कभी एहसान नहीं जताये , बदले में कभी कुछ माँगा नहीं। जिनके लिए प्रेम ही प्राथमिकता रही ।
जिन्होंने वास्तव मे प्यार किया वो प्यार जिसमे छल -कपट नहीं था ,सिर्फ प्यार था सच्चा वाला प्यार।
और प्यार का मूल्य तो सिर्फ प्यार देकर ही चुकाया जा सकता है ।

