अंजलि सिफ़र

Drama


4.5  

अंजलि सिफ़र

Drama


निर्णय

निर्णय

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गाड़ी अपनी गति से गंतव्य की ओर जा रही थी और मेधा के विचार अपनी गति से। हालांकि विचारों का कोई गन्तव्य होता नहीं, कहाँ से उत्पन्न हो,कहाँ विलीन हो जाते हैं पता नहीं। उसके विचार भी ऐसी ही अनगिनत लहरों में बँटे हुए थे। एक लहर इस ओर से आती तो एक उस ओर से। एक महत्वपूर्ण फैसला जो उसने आज आखिर ले ही लिया था , ये लहरें उसी के तूफान की देन थीं। आँखों को बंद कर के जैसे उसने विचारों के लिए भी दरवाज़े बंद कर दिये थे।मेधा से आपका मैं परिचय तो करा दूँ। मेरी कहानी की मुख्य पात्रा। पढ़ी लिखी, स्मार्ट ,आकर्षक व्यक्तित्व, स्वाभिमानी....और भी अच्छे अच्छे विशेषण लगाना चाहूँगी क्योंक मेधा के अंदर काफी हद तक मैं खुद को ही देखती हूँ। मेघा को शायद मैने रचा ही अपनी प्रतिमा के रूप में है । मेघा मेरी तरह आत्मनिर्भर भी थी इसीलिए शायद आज वो छोड़ ही आई थी विनय को और उस घर को भी। सात सालगिरह लगीं उसे समझने में कि वो और विनय एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं। यूँ तो कई तमाचे मारे थे विनय ने उसे अलग अलग तरह से। कभी उसके ज़मीर पर ,कभी आत्म सम्मान पर, कभी चरित्र पर तो कभी पत्नीत्व पर ,मगर ये सब तो घरेलू हिंसा कानून के तहत नहीं आते ना। इन सब का आपके पास सुबूत नहीं होता ,इनकी आवाज़ नहीं होती, इनकी छाप नहीं होती । हम रिएक्ट करते हैं तो सिर्फ उस तमाचे पर जो गाल पर निशान छोड़ता है । जबकि दिल पर लगे, न मिटने वाले निशानों की कोई अहमियत नहीं होती । शायद समाज का डर ही ऐसे तमाचों का कवच होता है ,जिससे हम डर जाते हैं और यही डर आज छोड़ आई थी मेधा, उस कवच को आज वो तोड़ आई थी। 

ट्रेन का गंतव्य था मगर मेधा का नहीं। यूँ ही दिल्ली का टिकट ले लिया था ।सोचा था माँ के यहां दो तीन दिन गुज़ारेगी ।उतने में शायद विनय को उसकी ज़रूरत महसूस हो या अपनी गलती का एहसास हो तो वो मना ही ले ।दरअसल कमज़ोरी मेरी ही है । मैंने अपनी पात्रा को हिम्मत कर के घर तो छुड़वा दिया लेकिन एक आशा नहीं छुड़वा सकी कि शायद उसका पति यानी मेरी कहानी का पुरुष पात्र उसे लिवाने आ जाए ।

सामने वाली बर्थ पर बैठा एक आदमी रह रह कर उसे देख रहा था। हालांकि उसके देखने में अशिष्टता नहीं थी मगर फिर भी मेधा असहज हो रही थी।वो किसी अच्छी फैमिली का, पढ़ा लिखा सभ्य व्यक्ति लग रहा था। मेधा दरवाज़े तक गई तो वो भी पीछे आ गया।

"आप शायद चाय वाले को देख रही हैं। वो थोड़ी देर पहले ही आकर गया है ।आप सो रही थीं। मेरी भी एक कप चाय की तीव्र इच्छा हो रही है मगर चाय भी कोई अकेले पीने की चीज़ है।अगर बुरा ना मानें तो आपके लिए भी एक कप ले आता हूँ। वैसे भी पैंट्री दूर है और आप को अकेले नहीं जाना चाहिए ।" मैंने मेधा को मना नहीं करने दिया। इसमें हर्ज ही क्या था।

मेधा ने हल्का सा मुस्कुरा कर हाँ कह दी ।शुरू में मेधा को उससे डर लग रहा था मगर धीरे-धीरे बात करते हुए उसका डर जाता रहा। वैसे भी इतने लंबे सफर में उसे किसी कंपनी की ज़रूरत तो थी ही। 

कूपे में एक बुज़ुर्ग दंपत्ति और भी थे जिनकी वजह से मेधा का डर काफी कम हो गया था। उनका ज़्यादा समय सोने में बीत रहा था इसलिए वो मेरे दोनों ही पात्रों के लिए डिस्टरबेंस नहीं थे। 

मैं सच बताऊँ तो बुज़ुर्ग दंपत्ति को मैंने ही बिठाया था कूपे में ,मेरी पात्रा की सुरक्षा के लिए।क्योंकि साहस करके मैंने उसे घर से निकलने तो दिया लेकिन अगर कभी विनय ने मेधा से पूछा कि रास्ते भर क्या तुम अकेली थी या अगर कभी उस हमसफ़र के बारे में मेधा के मुँह से कुछ निकल गया तो मुश्किल हो जाएगी ।बस इसी जवाबदेही से बचने के लिए मैंने उन्हें वहाँ बिठाया और दवाई खिला कर सुला भी दिया। अब एक लेखिका होने के नाते इतना हक तो बनता था अपनी कहानी के पात्रों पर ।

वैसे मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था अपने हिसाब से अपने पात्रों को चलाते हुए।शायद खुद को विधि के हाथों मजबूर देख,पात्रों की ज़िंदगी को अपने हाथों में लेने में मुझे आनंद आ रहा था । इसे ही शायद सैडिस्टिक प्लेयज़र कहते हैं।ऊपरवाला अगर वास्तविक जिंदगी का रचयिता था तो मैं भी काल्पनिक ज़िन्दगी की रचयिता तो थी ही। इस समय न सिर्फ़ ये तीन बल्कि कितनी ही ज़िंदगियां मेरे हाथ में थीं जिन्हें मुझे अपने मानसपटल से निकाल इस कल्पना की दुनिया में सजीव करना था। मैंने अपने या मेरे जैसी जाने कितनी ही और पत्नियों, जो कभी अपना घर छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाती, के बदले में मेधा से घर छुड़वा दिया था।खुद को तो शायद यह महसूस तक करने का हक नहीं दिया था मैंने कि पर पुरुष की नज़र मुझ पर कैसी पड़ती है मगर अपनी पात्रा पर हावी कर रही थी मैं उसी पर पुरुष को ।कहीं मैं लेखिका के अधिकार का दुरुपयोग तो नहीं कर रही थी ।क्या मैंने मेधा से एक बार भी पूछा कि वह विनय का घर छोड़ना चाहती भी है या नहीं। पति पत्नी के रिश्ते की डोर इतनी तो कमज़ोर नहीं होती कि एक तमाचे पर टूट जाए और जब विनय ने बीते दिनों में भी उसके दिल पर लगाये घावों को अपने प्यार की मरहम से भर दिया था तो फिर चेहरे के तमाचे की लालिमा तो पल भर में फीकी पड़ जाती है ।

ख़ैर दिल्ली आ गया था । सोमेश ने अपने साथ-साथ मेधा का भी सामान उतारा। दोनों बाहर तक आ गए।अब तक मेधा सोमेश के नाम के साथ साथ उसके बारे में भी कुछ जान चुकी थी । सोमेश ने टैक्सी बुलाकर कहा," होटल इंपीरियल "।

"सोमेश मेरी माँ का घर तो दूसरी तरफ है। मैं दूसरी टैक्सी ले लूँगी।"

"अरे बैठो ना । कुछ देर तो मेरे साथ रुको। फिर चली जाना अपनी माँ के यहाँ भी।"

अरे रे! ये क्या ! कहानी तो मेरे हाथ से फिसलती जा रही है। सोमेश ने मेधा को तो क्या मुझ तक को कुछ सोचने का मौका नहीं दिया । ये सोमेश भी तो मेरा ही गढ़ा हुआ पात्र है।फिर मेरी बात क्यों नहीं मानता। मैंने तो इसे सिर्फ एक शालीन हमसफ़र के रूप में मेधा से मिलवाया था। लेकिन परपुरुष शायद सामने की बर्थ तक ही शालीन रहता है। गलती मेरी है।मैंने ही तो मेधा से उसे आगे बढ़ने का मौका दिलवाया था। मगर अब क्या करुँ। मैं तो बस विनय को सबक सिखाना चाहती थी । उसका घर तोड़ने का कोई इरादा नहीं था मेरा ।झगड़ा किस घर में नहीं होता।

लेकिन तब तक मेरी ही अवज्ञा कर सोमेश मेधा को कार में बैठा चुका था। "आज मेरे पास रुको। कल छोड़ दूँगा तुम्हें तुम्हारी माँ के घर ",कह कर सोमेश ने ड्राइवर से चलने के लिये कहा।

"ड्राइवर गाड़ी रोको ",मेधा चिल्लायी।

जैसे ही गाड़ी रुकी, मेघा ने सोमेश का बैग गाड़ी से बाहर फेंका और ड्राइवर से कहा,"गाड़ी वापस स्टेशन की तरफ ले लो। मुझे अभी मुंबई की ट्रेन पकड़नी है।

सोमेश के लिए ये एकदम अप्रत्याशित था और मेरे लिए भी। 

मगर मुझे अफसोस नहीं था मेरी ही मुख्य पात्रा का मेरी ही अवहेलना करने वाले इस निर्णय पर क्योंकि आख़िरकार मैं भी शायद यही चाहती थी।


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