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मुश्किल फैसला

मुश्किल फैसला

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बेेसब्री से मयूरी ‘रेस्टोरेन्ट’ में माधव का इंतजार कर रही थी, उसे इस बार पूरा यकीन था कि माधव उसकी भावनाओं का मान रखते हुए उसका साथ निभायेगा। पूरे तीन साल की शादी में, सिर्फ मयूरी ही एडजस्ट करती आयी थी। इतने लम्बे वक्त में अब माधव पहले जैसा सहज स्वभाव का नहीं रहा। ससुराल में ससुर का भी व्यवहार कठोर होने से मयूरी का जीवन बद से बदतर हो गया था। 

मयूरी करतीे भी क्या, ‘शादी के बाद हर माँ अपनी बेटी को यही कहकर तो विदा करती है, कि अब ससुराल ही उसका सबकुछ है। पत्नी का कर्तव्य है आजीवन पति और पति के परिवार की सेवा करना। लड़की की डोली पीहर से विदा होती है और ससुराल से ही अर्थी उठती है।’ सभ्य समाज में रहने वाले लोगों की ये कैसी सोच है, कि लड़की भले ही घुट-घुटकर जिये मगर उसी को एडजस्ट करने को कहा जाता है ।एक लम्बे इंतजार के बाद भी जब माधव नहीं आया, तो मयूरी ने फोन करना ठीक समझा। ‘हेलो, माधव! मंै आपका दो घंटे से रेस्टोरेन्ट में इंतजार’ मयूरी की बात पूरी होने से पहले ही माधव ने उसे टोक दिया। ‘हाँ मालूम है, दो घंटे से इंतजार कर रही हो.... तो मैं क्या करूँ ? आॅफिस में काम करूँ या तुम्हारी बकवास सुनने वहाँ आऊँ, तुम्हारे पास तो कोई काम है नहीं। घर ही तो सम्भालना है, वो भी तुमसे ठीक से होता नहीं। बस बाबू जी, ऐसा कह रहे थे वैसा कह रहे थे .अरे वो हमारे बड़े हैं और तुम उस घर की बहू हो। और तुम्हारी शिकायतें तो कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है। एक तो आॅफिस में वर्कलोड ऊपर से तुम्हारी हर दिन की बक-बक’, इतना कहकर माधव ने गुस्से से भनभनाते हुए फोन रख दिया।मयूरी का गला सूख सा गया था . जैसे वहाँ अनकहे शब्द अटक से गये हों। आँखांे में कई सैलाब करवटें बदलने लगे थे, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर वो कहे क्या ? मयूरी के मन की सारी दुर्बलता, सारी वेदना जैसे सिमटकर रह गयी थी....। मन आनंदित नहीं था, उर गहरे अंधकार से घिर चुका था। उसके मुखमंडल पर सुनहरी आभा होने के बजाये एक अजीब सी मायूसी झलक रही थी।

मयूरी ने सिसकियों को दबाते हुए कहा, वेटर... जी मैडम, एक गिलास पानी ..! ‘ये लीजिए पानी, मैडम आपके लिए और कुछ लाऊँ’, वेटर ने पानी का गिलास टेबल पर रखते हुए कहा। अपनी उलझन में मयूरी ने शायद वेटर की बात को भी अनसुना सा कर दिया था, इसीलिए वेटर ने दुबारा पूछा, ‘मैडम, आप कुछ और लेंगी।’ 

‘नहीं, नहीं....मुझे और कुछ नहीं चाहिए’, मयूरी ने कातर स्वर में कहा।

जो मयूरी मेधावी हुआ करती थी, स्वाभिमानी हुआ करती थी.... वही आज कम बोलने वाली समझौतावादी घरेलू लड़की बन चुकी थी और गलत को गलत . सही को सही . कहने वाला ‘लीडरशिप क्वालिटी’ वाला एक खुली सोच का माधव, वही आज ‘कंजर्वेटिव माइन्ड’ का हो चुका था। ये समय के साथ का बदलाव था या एक खूबसूरत रिश्ते के टूटने का संकेत। स्पष्टवादी मयूरी, आज अपने ही ‘आत्मसम्मान’ की रक्षा करने में सक्षम नहीं थी .! आखिर वो किससे अपनी पीड़ा बाँटती, किसी से अपनी परेशानी बतलाती... तो लोग उसी को दोषी ठेहराते। कहते कि हर परिवार में शुरू में दिक्कतेें आती हैं... शादी के बाद पत्नी की यही जिम्मेदारी होती है कि, वो अपने पति के परिवार के प्रति अपने सारे फर्ज पूरी निष्ठा से निभाये। पति की हर बात का मान रखे मगर हर कोई ये क्यांे भूल जाता है.... कि भले ही गृहस्थी सम्भालने की पूरी जिम्मेदारी पत्नि की होती है, तो पत्नी का हर अच्छे बुरे समय में साथ निभाना पति का भी फर्ज होना चाहिए। क्या पति का पत्नि के प्रति कोई फर्ज नहीं, क्या शादी के बाद पति-पत्नि का रिश्ता महज समझौता बनकर रह जाता है....? ऐसे कई सवाल मयूरी के मन में घेराव किये हुए थे....

पूरी जिन्दगी जैसे मयूरी की आँखों के सामने घूमने सी लगी थी। जैसे कल ही की बात हो, जब पहली बार मयूरी की मुलाकत माधव से हुई थी। बस स्टाॅप पर खड़ी मयूरी ने बस को हाथ हिलाकर रोका, और वो अंदर जाकर बैठ गयी। मयूरी, विंडो सीट पर चुपचाप बैठी थी ... तभी अचानक से कुछ आवारा लड़के काॅलेज की लड़कियों को छेड़ने लगे। सब लोग बस तमाशाबीन बने रहे, कोई उन लड़कियों की मदद को न आया । यही तो हमारे समाज की सबसे बड़ी विड़म्बना है जो होता है .. होने दो, अपने परिवार का मामला थोड़े ही है...आखिर कब तक कुछ बदहवास लोगों की मनमानी से हम लड़कियाँ घुटघुटकर जीने को मजबूर होती रहेंगी। मयूरी उन लड़कों की बदतमीजी को देखकर अंदर ही अंदर कुढ़ रही थी। एक पल को उस के मन में ख्याल आया, कि क्यों न वो खुद ही उन लड़कियों की मदद कर दे। मगर अकेले ऐसा करने की वो हिम्मत न जुटा पायी, इसीलिए मयूरी ने एक कोशिश की .मयूरी ने अपनी पिछली सीट पर बैठे एक अधेड़ उम्र के आदमी से कहा- ‘भाईसाहब.... आपको नहीं लगता कि, हमें इन आवारा लड़कों को सबक सिखाना चाहिए। आखिर ये लड़कियाँ भी किसी की बहन, बेटी होंगी। माना हम लोगों के परिवार की नहीं, क्या आप लोगों को नहीं लगता कि ये लड़के गलत कर रहे हैं .‘मैडम आप कैसी बात करती हो, कौन उलझेगा इन आवारा लड़कों से . आप तो हमें लेक्चर देकर यहाँ से चुपचाप निकल जाओगी और मदद करके हम सब फँस जायेेंगे’, उस व्यक्ति की हाँ में हाँ मिलाते हुए आसपास के लोग बोल पड़े। हमारा रोज का बस से आना-जाना लगा रहता है, कौन इन लड़कों से भिड़ेगा। हम लोग बेवजह मुसीबत में क्यांे पड़े...? आज इन लड़कियों को छेड़ रहे हैं, कल को हमें बेवजह तंग करंेगे। इन लड़कों का क्या हैं, आये दिन किसी न किसी लड़की को छेड़ते ही रहते है, आप किस-किस को रोक पकितना अजीब सच है कि, समाज में महिलाओं पर लागू करने के लिए बहुत से नियम कायदे हैं, पर पुुरूष को अपनी मनमानी करने की पूरी आजादी है। कल को अगर किसी महिला के साथ कोई अमानवीय घटना घट जायेगी तो कुछ उसे अबला, और कुछ चरित्रहीन कहेंगे। 

मयूरी, जिसका मानना था... कि पुरूष और महिला के एक समान अधिकार होने चाहिए....। वही आज इस गुत्थी को सुलझाने में लगी हुई थी, कि आखिर समाज का महिलाओं को देखने का वास्तविक नजरिया क्या है? क्या व़ाकई समाज महिलाओं के प्रति संवेदनशील है या फिर दोहरी मानसिकता का शिकार है?

मयूरी ने निःसंकोच होकर कहा- ‘वाह क्या बात है .! पत्थर मारने वाले को न रोककर घर के खिड़की दरवाजे बंद कर लो। क्या वाकई आप लोगों को लगता है, कि ऐसा करके आप खुद को बचा सकने में कामयाब हांेगे? कितने दिन खुद को बचाने के लिए घर से बाहर नहीं निकलेंगे। क्या इससे आपकी मुसीबत टल जायेगी...? जो आदमी पत्थर मार रहा है, वो क्या अपनी हरकतों से बाज आ जायेगा..? आपको नहीं लगता आपको डरा सहमा देखकर उसके गलत इरादे और ज्यादा मजबूत हांेगे।’ मुझे बहुत हैरानी हो रही है आप सब लोगों की बातें सुनकर, बिलकुल ठीक बात है आप क्यों दूसरों की मुसीबत में पड़ें, वो आपके घर का मामला थोड़े न है? अगर होता... तो आप लोग जी तोड़ कोशिश करते अपने-अपने परिवारों को सुरक्षित करने की पिछली सीट पर बैठा दिवाकर गम्भीर स्वर में बोला, ‘सुनिए मैडम, बात तो आपकी बिल्कुल सही है.... मदद करने को तो हम मदद कर भी दें...।’ बाद में अगर कोई पुलिस का मामला हो गया तो आप ही बताईये, क्या सब काम-धाम छोड़-छाड़कर हम थाने के ही चक्कर लगाते रहेंगे....? ‘हम मानते है कि वो लड़के बहुत गलत कर रहे हैं पर .’, आत्मग्लानि से दिवाकर के पास बैठे रमेश ने कहामयूरी मन ही मन बहुत उदास थी, चाहते हुए भी वो उन लड़कियों की कोई मदद नहीं कर पा रही थी। फिर अचानक से बस रूकी, मयूरी ने बाहर देखा तो पाया कि वो लड़कियाँ एक काॅलेज के सामने उतर गयी हैं। मयूरी ने राहत की सांस ली, और कहा- ‘थैंक गाॅड.. कि वो लड़कियाँ उतर गयीं, वरना न जाने ये बदतमीज लड़के उन सबको और कितना तंग करतेवहीं से बस में दो महिलाएँ भी चढ़ीं, साथ में एक लड़का भी था। पहली महिला के हाथों में प्यारा-सा शिशु था, जो भूख के कारण बिलख-बिलखकर रो रहा था....। दिवाकर ने अपनी सीट से उठकर कहा- ‘बहन जी, आप अपने बच्चे को लेकर मेरी सीट पर बैठ जाइये।’ वो महिला दिवाकर को ‘धन्यवाद’ कहकर उसकी सीट पर आकर बैठ गयी .।कौन सी माँ अपने बच्चे को ऐसे भूख से रोते बिलखते हुए देख सकती थी, इसी कारण असहज महसूस करते हुए भी वो महिला अपने शिशु को बस में ही स्तनपान कराने लगी...! यह देखकर वो आवारा लड़के दूसरी महिला पर भद्दी कमेंट्स पास करने लगे।इस बार मयूरी ने उन दो महिलाओं के साथ जो लड़का चढ़ा था, उससे कहा- ‘भाईसाहब! आप तो इन के साथ चढ़े है, फिर भी इनकी कोई मदद नहीं कर रहे हैं.... मौन साधे, बस तमाशा देख रहे हैं, ये तो हद है।’ 

माधव ने संयमित स्वर में मयूरी से कहा- ‘मैडम, जब हम मुसीबत में होते हैं, तो क्यों अपनी बगले झांकते हैं कि कोई आकर हमारी थोड़ी सहायता कर दे। अरे, मुसीबत आप पर आयी है .तो आपको हिम्मत से उसका सामना करना चाहिए ! मैं आज इनकी मदद कर दूँगा, तो ये हर बात पर दूसरोें पर निर्भर हो जायेगी।’ अचानक से कुछ महिलाएँ उठी, उन्होंने अपनी-अपनी सैंडिल उतारी और उन आवारा लड़कों को पीटने लगी....। ये देखकर कंडेक्टर ने बस रूकवा दी, और वो लड़के बस से उतकर डर के मारे वहाँ से भाग खड़े हुए....मयूरी शांत स्थिर स्वर में माधव की ओर देखते हुए कहा- ‘एक पल को आपकी बातों से मुझे लगा कि आप में जरा सी भी इन्सानियत नहीं है, ऐसे वक्त में आप मदद करने के बजाये लैक्चर दे रहे है....पर जब गंभीरता से सोचा तो महसूस हुआ कि आपने बात बिल्कुल सही कही है। जब मुसीबत हमारी है, तो हमें खुद हिम्मत से उसका सामना करना चाहिए, आखिर बार-बार कौन हमारी सहायता को आयेगा।’

माधव ने मयूरी के सामने अपनी बात रखते हुए कहा- ‘कठिन समय आने पर जो इंसान, सामना करने के बजाये.... उसे टालने की कोशिश करता है, वो अपनी दिक्कतें और बढ़ा लेता है। मुसीबत का आत्मविश्वास से सामना करना चाहिए न, कि डर के मारे घर में छुप जाना चाहिए .।’ ‘जी, आपने बिल्कुल सही कहा- वैसे भी डरने वालों को लोग और अधिक डराते है’, मयूरी ने दृढ़ता से कहा। 

मयूरी और माधव एक दूसरे से अनजान थे, मगर इस छोटी-सी मुलाकात ने उन्हें बहुत कुछ सहेजने लायक दे दिया था .। मयूरी के पास बैठी महिला रास्ते में उतर गयी, सीट खाली होने पर माधव वहाँ आकर बैठ गया। ‘मैडम.... आपका नाम क्या है, वैसे आप करती क्या हैं? ये मत समझियेगा कि मैं आपसे फ्लर्ट कर रहा हूँ, पता चला आप मुझे सैंडिल उतारकर मारने लगे’, माधव हँसते हुए बोला। 

‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, जी....मेरा नाम मयूरी है... मैं टीचर हूँ और आप’, मयूरी ने मुस्कुराते हुए कहा। माधव ने अपना कार्ड थमाते हुए मयूरी से कहा- ‘जी, मैं माधव, एक प्राईवेट कंपनी में काम करता हूँ।’ मयूरी ने कार्ड अपने पर्स में रख लिया। थोड़ी बहुत बातचीत में दोनों को एक दूसरे का स्वभाव पसंद आने लगा था। बातों-बातों में पता चला कि दोनों के परिवार वाले एक दूसरे से परिचित है। मयूरी ने देखा कि उसका स्टाॅप आ गया है, उसने कंडेक्टर से बस रोकने को कहा। ‘अच्छा....अब मुझे जाना होगा.... मेरी मंज़िल आ गयी है।’ मयूरी, आपसे मिलकर अच्छा लगा, जी मुझे भी। इतना कहकर मयूरी बस से उतर गयी।

सात महीने बीत गये।

फिर एक दिन, माधव की मुलाकत मयूरी से एक शादी समारोह के दौरान हुई। माधव ने उल्लास से पूछा- ‘मयूरी, अरे आप यहाँ कैसे....? आपको यहाँ देखकर बहुत खुशी हो रही है।’ 

‘जी, ये मेरे दूर के रिश्तेदार के घर की शादी है’, मयूरी ने मुस्कुराते हुए कहा। दोनांे एक बार फिर एक-दूसरे से मिले और यहाँ से मिलते रहने का सिलसिला शुरू हो गया। एक घटना से शुरू हुआ एक अनजाना-सा रिश्ता कई मुलाकतों में बदल गया ! 

पहले दोस्ती हुई, एक दूसरे के प्रति सम्मान-भाव उजागर हुआ। फिर दोनों के अन्दर अंकुरित प्यार का पौधा कुम्हला गया, दो साल के साथ के बाद मयूरी और माधव ने शादी करने का निर्णय लिया। मयूरी के परिवार वालों को माधव पसंद आया। मगर माधव के पिता को इस रिश्ते से एतराज था, वो मयूरी को इसीलिए नापसंद करते थे.... क्योकि उन्हें अपने बेटे के लिए घरेलू लड़की चाहिए थी, न कि सर्विस वाली बहू। माधव ने महेंदर बाबू को समझाने की बहुत कोशिश की, मगर उन्होंने अपने बेटे की एक न सुनी। महेंदर बाबू ने तो मयूरी के परिवार वालों से मिलने तक को मना कर दिया। जब ये मुश्किल आसान होती न दिखी, तो मयूरी और माधव ने ये फैसला किया कि मयूरी कुछ वक्त के लिए अपनी नौकरी छोड़ देगी।ना नुकूर करते-करते, आखिरकार महेंदर बाबू ने मयूरी और माधव के रिश्ते को मंजूरी दे दी। बड़ी धूमधाम से दोनों की शादी हुई। शादी के दो साल अच्छे से बीते, सब बहुत खुश थे.... लेकिन महेंदर बाबू के स्वभाव में थोड़ा सा भी परिवर्तन नहीें आया। वो हर बात पर मयूरी को ताने मारते रहते। उसे नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। मयूरी करती भी क्या.. वो उस घर की बहू थी, अगर कुछ कहती तो महेंदर बाबू तिल का ताड़ बना देते .! मयूरी की सासू माँ का स्वभाव विन्रम था, मगर महेंदर बाबू के सामने उनकी भी कहाँ चलती थी । 

महेंदर बाबू, जो कह देते वही समझो पत्थर की लकीर ..

‘मयूरी बहू, क्या आज नाश्ता मिलेगा या मुझे भूखा मारेगी....? तू तो यही चाहती है, कि मैं मर-मरा जाऊँ.... जिससे मेरे बेटे को तू अपनी उंगलियोेें पर नचा सके। तेरी माँ ने अगर तुझे घर के काम अच्छे से सिखा दिये होते तो कितना अच्छा होता। तेरी नौकरी की कमाई पर जीते आये है तेरे माँ बाप, छी...छी... शर्म आनी चाहिए दोनों को’, महेंदर बाबू ने खिजते हुए कहा।

मयूरी नाश्ता टेबल पर लगाते हुए बोली- ‘बाबू जी, आप गलत समझ रहे हैं, मेरे माता-पिता ने मुझे हर तरह से आत्मनिर्भर बनाया है और ।’ ‘तुझे थोड़ी बहुत तमीज भी सिखा दी होती तो अच्छा होता। ले जा.... ये नाश्ता, और दफा हो जा यहाँ से’, महेंदर बाबू गुस्से से तिलमिलाते हुए बोले। मयूरी ने नाष्ता टेबल से उठाया, और किचन में ढककर रख दिया। मयूरी को समय का पता ही नहीं चला, रेस्टोरेन्ट में बैठे-बैठे उसे चार घंटे हो चुके थे। उसका फोन लगातार बज रहा था, मगर उसे तो किसी बात की कोई सुध ही नहीं थी। फिर माधव अपना सब काम निपटाकर मयूरी से बात करने रेस्टोरेन्ट पहुँचा, ‘हां मयूरी बताओ क्यों बुलाया मुझे यहाँ’, माधव ने पूछा? मगर मयूरी के दिमाग में अतीत की ढेरों यादें घूम रही थीं उसे तो माधव की मौजूदगी तक वहाँ महसूस नहीं हुई। 

माधव ने मयूरी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- ‘तुम किस सोच में डूबी हुई हो।’ 

‘नहीं कुछ भी... तो नहीं, आप कब आये माधव’, हड़बड़ाते हुए मयूरी बोलीे। बस अभी-अभी आया मयूरी....! मैं काम को लेकर काफी टंेशन में था, बस इसीलिए तुम पर गुस्सा हो गया। वैसे ऐसी क्या बात थी, जो तुम घर पर नहीं कह सकती थीं....।मयूरी द्वंद में थी, कि वो कैसे माधव से अपने मन की बात करे....! आखिरकार बहुत हिम्मत जुटाकर वो बोली- ‘माधव क्या मैं दोबारा कहीं नौकरी ज्वाइन कर सकती हूँ, साथ-साथ मैं घर भी सम्भाल लूंगी?’ इस एक सवाल ने जैसे वहाँ का माहौल ही बदल दिया था। माधव को समझ ही नहीं आ रहा था कि, वो इस बात का क्या जवाब दे .! 

गहरी सांस भरते हुए माधव बोला- ‘ओह तो ये बात है, मगर क्यों? किस बात की कमी है तुम्हें सारी सुख-सुविधायें तो है घर पर... फिर तुम्हें नौकरी क्यों करनी है? और तुम जानती तो हो....बाबू जी का स्वभाव, ये बात सुनंेगे.. तो आसमान सिर पर उठा लेंगे।’

मयूरी ने ॉदय को दृढ़ करते हुए कहा- ‘कमी है माधव... ‘आत्मसम्मान’ की।’ मयूरी के एक शब्द ने उसके दिल का हाल बयाँ कर दिया था। ये फैसला करना दोनों के लिए आसान नहीं था ! मयूरी की हालत देखकर . माधव की आँखें छलक उठी, उसके चेहरे पर ग्लानि भाव बिखर गया। आखिर माधव के भरोसे ही तो मयूरी ने अपनी नौकरी छोड़ी थी, और अब जीवन की आपाधापी में किये हुए वायदें भी जैसे धंुधला से गए थे।

माधव ने मयूरी के मुख को स्नेह नेत्रों से देखते हुए कहा- ‘मयूरी....क्यों मैं तुम्हारी पीड़ा को महसूस न कर सका....? तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही होगा चलो अब घर चलते हैं’, माधव ने मजबूती से मयूरी का हाथ थाम लिया। उस एक पल में मयूरी ने माधव के विश्वास भरे कोमल स्पर्श को महसूस किया।


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