मोहभंग

मोहभंग

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श्रीधर बाबू बहुत ही सरल स्वभाव के ईश्वर में आस्था रखने वाले व्यक्ति थे। पिता ने बहुत खेती जमीन उनके नाम छोड़ कर गए थे। पर गाँव की खेती जमीन बेचकर शहर में उन्होंने एक आलीशान घर बना लिया। पूरा परिवार शहर में शिफ्ट हो गया। पत्नी कान्ता उनके स्वभाव से विपरीत चंचल और बनाव शृंगार वाली स्त्री थी। अपने रूप का घमंड था उसे। तीन बच्चों की माँ होकर भी लगता जैसे अभी ही ब्याही लड़की हो। दो बड़े बेटे और तीसरी बेटी जो चार वर्ष की और बेटे क्रमश: छह,नौ साल के। दोनों बेटे शहर के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते थे, बिटिया नर्सरी में। श्रीधर बाबू की रेडीमेड गार्मेंट का दो मंजिल का शोरूम बाज़ार के बीच में था। ये शोरूम उनके लिये बड़ा शुभ सिद्ध हुआ। लक्ष्मी प्रसन्न थी। पर कहते है न, लक्ष्मी चंचल होती है। श्रीधर बाबू व्यापार और पैसों के बीच ऐसे डूबे कि अपनी चिंता छोड़ दिये। वैसे ही मंझोले कद के, नाक-नक्श में भी ईश्वर ने कृपणता बरती, उस पर गद्दी पर बैठे-बैठे शरीर फूलता गया। चलना फिरना दूभर हो गया। शोरूम में उन्होंने दो नौकर रख लिये। वे ग्राहकों को संभालते और श्रीधर बाबू अपनी तिजोरी।

अपनी तिजोरी तो उन्होंने संभाली पर घर की लक्ष्मी न सम्भाल पाये।

उनका एक नौकर रमेश जवान, नयी-नयी नसे भीग रही, सुगठित काया चतुर बुद्धि का, श्रीधर का दायाँ हाथ,और कान्ता देवी की आँखों को भा हृदय में बस गया।

कान्ता देवी, दस साल बड़ी रमेश से, पर प्रेम तो उम्र की सीमाएँ लाँघ लेता है।

रंग जमने लगा दोनों में। पहले छुप-छुप कर। कान्ता को अपने बच्चों का भी ख्याल न रहा। बच्चे स्कूल में, श्रीधर गद्दी पर, रमेश किसी न किसी बहाने श्रीधर के घर पर। किसी को कानोकान खबर नहीं, सब अपनी-अपनी जगह खुश। श्रीधर तिजोरी में, बच्चे स्कूल में,और दोनों प्रेमी प्रेम में।

कहते हैं इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते। शोरूम से निकले रमेश को बहुत देर हो गई। लौटा नहीं। घर से माल उठवाना था।श्रीधर अपने भारी भरकम शरीर के साथ उठे और घर की ओर चले।

घर पहुँच जो देखा, उसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। कान्ता और रमेश को उनके आने की भनक भी नहीं लगी, श्रीधर उल्टे पैर दुकान पर लौट आये।

श्रीधर अब पहले वाले श्रीधर नहीं रहे। अवसाद में डूबे हुए, तिजोरी से बेखबर, वो लक्ष्मी के पीछे भाग रहे थे,और घर लक्ष्मी मर्यादा भंग करते हुए कहीं और भाग रही थी। वितृष्णा भर गई मन में। दुकान छोड़ उनके पैर कहीं और जाने लगे। आकन्ठ शराब में डूबे, अर्धचेतन अवस्था में घर लौटते।

ये शराब ही थी जो उनके करीब थी। औरों से उन्होंने नाता तोड़ लिया। धीरे-धीरे शोरूम भी बर्बादी के मुहाने पर खड़ा हो गया।रमेश, धन और शरीर सुख लूट कर भाग गया। कान्ता अपनी गलती पर पछता रही थी। अब बहुत देर हो चुकी थी। श्रीधर का जीवन से, संसार से, परिवार से यहाँ तक कि अपनी प्यारी तिजोरी से मोहभंग हो गया था।


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