मोह
मोह
श्मशान घाट पर भीड़ लगी थी। मलखान का अंतिम संस्कार किया जा रहा था। अर्थी से मलखान के शव को लकड़ियों पर रख दिया गया। एक बुजुर्ग बोले सामग्री रख मुँह अर छात्ति पै। मलखान के बेटे सुधीर ने चादर हटाई, मलखान के साँवले चेहरे पर रोबदार मुछें उसके जीवन चरित्र को प्रतिबिम्बित कर रहीं थी। तभी लोगो की भीड़ मे से एक बुजुर्ग ने ताना मारा “मरते के पिछवाड़े पै घी रगड़ दो, दिखान कु कि घी खुला-खुला कै पाला हा”
भीड़ मे बहुत से लोगो ने उसे इसके लिए टोका, लेकिन अधिकतर चेहेरो के भाव उसके ताने का अनुमोदन कर रहे थे। तभी उस बुजुर्ग ने थोड़ा धीमे स्वर मे कहा “भगवान सब देखरा”
सुधीर ने कुछ नहीं कहा और अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी करता रहा। शव की दहन प्रक्रिया शुरू हुए आधा घंटा बीत चुका था, लोग अपने दार्शनिक विचार एक दूसरे से साझा कर रहे थे। मलखान की बेबाकी और बहादुरी के क़िस्से सुनाये जा रहे थे, जिसे उसके जीते जी उसकी उदण्डता ही माना जाता था। जब कोई मर कर चिता पर लेट जाता है तो सिर्फ उसकी अच्छाइयों की ही चर्चा होती है। और श्मशान भूमि पर कहड़े हर व्यक्ति के भीतर का दार्शनिक भाव जागृत हो जाता था।
तभी एक बेबाक बुजुर्ग जो मलखान का भाई था, उसने एक अन्य बुजुर्ग से कहा “ बई भरत अब तो शांति पड़गी होगी, जेल मै ई दम निकला अगले का” ये मलखान के भाई ने एक ताना मारा था और ये ताना भरत को भीतर तक भेद गया था।
भरत तिलमिला गया और श्मशान भूमि का शिष्टाचार भूलते हुए चीख कर बोला “मुझे ना कहिए, मुकदमा चलरा हा, हम बी जारे हे तारीख पै अर वो बी जा रा हा, जेल तारीख छोड़ने की वजह से गया। जमानत तो होगी ही, क्यूँ ना भरवाये जमानती? तू ई बन जाता जमानती, तेरा बी भाई हा”
अब मलखान का भाई बचाव की मुद्रा मे आकर सफाई देने लगा “ लोन होरा हा जमीन पै, नु ना बन पाया मैं जमानती, पर जो मुकदमा ई खतम हो जाता तो कुछ बी ना हा”
भरत ने पलट कर जवाब दिया “मुकदमा तो खतम सा ही आ, पर कोई बोलता तो”
ये सब बहस हो इन दोनों के मध्य रही थी, लेकिन मलखान का बेटा सुधीर और उसका साला सबसे अधिक असहज हो रहे थे। सुधीर का साला बोला “20 लाख कौन देता?”
इसपर भरत ने कहा “20 लाख की बात कही होगी- जिसने कही होगी, मुझे ना चाह थे किसी के 20 लाख। बस खर्चा जो हुआ वो मांगा हा। बई सर बी म्हारे ही फुट्टे हे अर झुकते बी हम ई। फेर बी जिस दिन से मलखान जेल गया था, मै सबसे कहता फिररा हा, जहाँ कहो वहाँ गुंठा लगवा लो फैसले-नामे पै। पर मलखान का बुढ़ापा ना बिगाड़ो। नरक भुगवाया उसे उसके घरवालो ने अर बई सुधीर तेरी बउ अर सालो ने”
भरत की इस बात पर सुधीर तो कुछ नहीं बोला लेकिन उसके दोनों साले और बाकी ससुरालिया भड़क गए। लोगो ने दोनों पक्षो को शांत किया और श्मशान भूमि की गरिमा का भान करवाया। सब लोग शांत हो गए। अब लोग मे चर्चा का विषय चिता मे आग कहाँ तक जा चुकी है? ये था। कुछ लोग अग्नि को सुचारु रखने और सारी चिता मे फैलाने के लिए तरह-तरह के उपक्रम कर रहे थे।
मलखान का जीवन तो अच्छा ही कटा, लंबा, तगड़ा शरीर चेहेरे पर रोबदार मुछें। बचपन से ही खाने पीने की कोई कमी नहीं रही। तीन भाइयों मे सबसे अधिक लाड़ मलखान को ही मिला। मलखान तीनों भाइयों मे मझला था। बचपन से ही पहलवानी का शोक था, तो व्यक्तित्व रोबदार और आकर्षक बन गया था और स्वभाव मे दबंगई भरी थी। हालांकि मलखान सामाजिक रूप से मिलनसार था। लेकिन उसके हेकड़ी भरे स्वभाव के कारण उससे जुड़े एक मुकदमे ने उसके जीवन के अंत को त्रासद पूर्ण बना दिया। और लालच के कारण मानवीय भावनाए और रिश्तो की गरिमा कैसे शून्य हो जाते हैं ये भी बता दिया।
90 के दशक की बात होगी, मलखान जब 25 साल का युवा था। मलखान के एक 4 वर्ष की बिटिया और 1 साल का एक बेटा था। तब गाँव के ही प्रधान के लड़के भरत से उसका विवाद हो गया। भरत ने गाँव के ही एक नाई के बेटे को पीट दिया। जो मलखान को अच्छा नहीं लगा और मलखान ने भरत की अच्छे से कुटाई कर दी। भरत के साथ उसके चाचा का बेटा भी था, लेकिन वो भाग खड़ा हुआ। दोनों एकसाथ भी मलखान का क्या ही कर लेते? मलखान पहलवान तो था ही और लठिया चलाने मे भी माहिर।
भरत का भाई परिवार के और चार पाँच लोगो को बुला लाया। उन सभी को लगा कि सारे मिलकर मलखान को दबा लेंगे। सब मलखान को चिपट गए, लेकिन उनकी ख़ुशफ़हमी जल्दी ही दूर हो गयी। भरत को तो पहले ही मलखान ने ढीला कर दिया था, अब बाकी पर पिल पड़ा, पास खड़ी बुग्गी के खलवे से उसने बाकी सब की तगड़ी धुलाई कर दी। भरत समेत कई के सर फुट गए और भरत के तो हाथ की हड्डी भी टूट गयी। मलखान का जोश और बढ़ गया और उसने और जमकर उन्हे पीटना शुरू कर दिया। मलखान उन सब को उठा कर जमीन पर ऐसे पटक रहा था जैसे वो रुई के बोरे हों। गाँव वालो ने बीच-बचाव करवाया। प्रधान जी की भी जमकर सुताई हो गयी थी, तो बात इज्ज़त पर आ गयी थी। प्रधान जी के कुनबे को लोग ढोलड़े बुलाते थे और मलखान के कुनबे को पलसे, थे दोनों एक ही जाति के। ढोलड़े गाँव मे अच्छी संख्या मे थे, इस कारण उनका दबदबा भी गाँव मे अच्छा था। लेकिन इस घटना के कारण पूरे कुनबे की इज्ज़त पर बात आ गयी थी। पलसे जश्न माना रहे थे मलखान की बहदुरी पर।
लेकिन जब मामला पुलिस मे पहुँचा तो मलखान के परिवार को समझ आ गया कि क्यों बड़े बुजुर्ग थाना-कोर्ट-कचहरी से दूर रहने को कहते हैं। पुलिस की तगड़ी दबिस पड़ने लगी, प्रधान ने भी इज्ज़त की खातिर अपने प्रभाव और पैसे का खूब उपयोग किया और मलखान के परिवार के कई लोगो के नाम लिखवा दिये पुलिस रिपोर्ट में। पुलिस ने मलखान के दोनों भाइयो को उठा लिया।
अब जब मामला बहदुरी और शारीरिक बल के दायरे से बाहर हो चुका था तो कुनबे और परिवार का प्रेम ढीला पड़ गया। मलखान के बाकी भाइयों के नाम अच्छे-खासे पैसे भरकर निकलवा दिये गए रिपोर्ट से। मलखान के बाप ने सारा पैसा रिश्तेदारों से कर्ज़ लेकर लगाया। मलखान को जेल जाना पड़ा।
4 महीने बाद जिस दिन मलखान की जमानत हुई उससे अगले दिन सारे भाई और मलखान का बाप और कुछ और लोग अपने वकील के चैंबर मे गए थे। वकील साहब का गोल और काला चेहरा और चोटी सी या कहें ना के बराबर गर्दन उसके व्यक्तित्व को ऐसा बना रहीं हैं जो सबका ध्यान खींचे। पान खाने के कारण वकील साहब की सारी दाड़ खतम हो चुकी थी। आगे कुछ लंबे दाँत बचे थे जो जंग खाये लोहे की तरह सुर्ख़ हुए पड़े थे। वकील साहब इनके सामने ऐसे बैठे थे जैसे उनके ओज से पूरा अदालत परिसर दमक रहा हो। वो शान के साथ हाथो को फेंक-फेंक कर बता रहे थे “भाई मामला तो बिगड़ा पड़ा हा। मलखान की मार से अब तक भी सुददे ना हुए प्रधान के लोग। अर भाई दूसरी पार्टी बी कौन प्रधान...”
ये कहने के बाद वकील साहब ने हसते हुए अपने सुर्ख़ दाँतो की सुंदरता बिखेरी और सर को हिला-हिला कर सबसे जबरन अनुमोदन करवाया।
फिर वकील साहब ने बताया “जज साहब तो मान ई ना रहे हे, फेर भाई सेटिंग करी। इतिहास बन गिया कोर्ट मे इस जमानत से”
मलखान का बाप जो अब तक भावहीन होकर सब सुन रहा था, बोला “अब आगे क्या हो, जमानत तो होगी”
वकील साहब ने आँखें बंद करके अपनी निराशा जताते हुए कहा “भाई मै हु ना, इस मुकदमे कु तो टिकन ई ना दूँ। एक आदमी पान-छ: कु कैसे मार लेगा? यो बी तो जवाब माँगूँगा”
मलखान के बाप ने कहा “अजी जमानत के टेम पै बी मांग लेते यो जवाब, इतनी मोटी रकम तो ख़रच ना होत्ति”
वकील साहब झल्लाते हुए बोले “भाई लंबरदार पैसे का काम तो पैसा ई करेगा”
मलखान का बाप बोला “कद तक लो निबट जागा यो मामला?”
वकील “भाई अभी तो शुरू बी ना हुआ ढंग तरियों, हो जागा... मैं हूँ ना”
इतने मे एक एक पतला सा व्यक्ति आया, जिसकी रात की शराब की खुमारी अभी तक नहीं उतरी थी। और उसका मुँह तंबाखू से भरा था और एक बीड़ी भी साथ मे चल रही थी। उसने एक काला कोट जो कॉलर पर से लगभग चिथड़े होने को तैयार था वो पहना हुआ था। उस पर भी कई जगह बीड़ी के पतंगे से छेद खुले हुए थे। उसकी कमीज अब लगभग सलेटी लग रही थी लेकिन कभी वो सफ़ेद ही रही होगी। उसने मलखान के बाप से कुछ जगह अंगूठे लगवाए और बोला “20 रुपए दो जी”
मलखान के बाप ने वकील की तरफ देखा “वकील साहब किसी फाइल को तन्मयता से पढ़ने लगे थे। मलखान के बाप ने 200 रुपए मुंशी के हाथ मे थमा दिये।
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मलखान के पिता पर बहुत सा कर्ज़ हो गया था। उसने 4 बिगहा जमीन बेचने की ठान ली कर्ज़ उतारने को। जमीन बिकने की बात आते ही मलखान के दोनों भाई उखड़ गए। उनका मानना था कि झगड़ा और मुकदमा मलखान का है तो जमीन उसके हिस्से की बिकेगी। अब तक जो सारे भाई एक जगह थे सब बटवारे की बात पर अड़ गए। मलखान भी बिना ना-नुकुर के मान गया और अपने ही हिस्से की जमीन बिकवा कर कर्ज़ चुका दिया गया। मुकदमा और मलखान की ज़िंदगी आगे बढ़ चली। आपसी तल्खियाँ खत्म हो गईं लेकिन मुकदमा चलता रहा। लंबे अंतराल की तारीख़ मिलती थी। बीच मे समझौते की बात ती भी तो प्रधान के लड़के की मांग देखकर रुक जाती थी। मलखान को भी लगता था कि साल-छ: महीने मे तारीख़ पर ही तो जाना पड़ता है बस।
लेकिन एक बार मलखान एक तारीख़ पर नहीं गया। ऐसा पहले भी हुआ था, लेकिन इस बार जज साहब ज़रा अधिक ही कड़े स्वभाव के थे। तो उन्होने गैर-ज़मानती वारंट करके मलखान को जेल भेज दिया। पूरे गाँव मे चर्चा शुरू हो गयी, कोई बोलता कि मलखान को उम्रक़ैद हो गयी तो कोई कुछ बोलता। मलखान का बेटा सुधीर, जिसके अब दो बेटे और एक बेटी थी। वो चार बहनो मे अकेला ही भाई था। विवाह हो चुका था और एक बेटा और एक बिटिया थी।
सुधीर ने भाग-दौड़ करके ज़मानत करवा ली। जमानत होने के बाद अगले दिन ही सुधीर मलखान से मिलने जेल मुलाक़ात पर गया, साथ मे उसका साला भी था। सुधीर बहुत खुश था, मलखान को जमानत की बात बताई। मलखान ये सुनकर भी मायूस ही लग रहा था। सुधीर ने मलखान के दोनों कंधो पर हाथ रखकर कहा “पिताजी क्या हुआ, तम खुश ना दिखरे...कोई दिक्कत हुई क्या यहाँ”
मलखान ने सर उठाकर सुधीर की तरफ देखा। मलखान की आँखों मे पानी था। मलखान ने कहा “मलखान कु कोई क्या दिक्कत कर देगा, पर अब यो जेल भारी पड़ी भाई। पोते-पोती की याद बहुत आई अर फेर यो उमर जेल मे रहन की ना है।“
सुधीर भी भावुक हो गया था, उसने रुँधे गले से कहा “कोई ना पिताजी हर तारीख करेंगे, फेर जेल क्यूँ आना पड़ेगा”
मलखान ने सुधीर की आँखों मे आँखें डालकर एक संक्षिप्त टिप्पणी की “अर जब अदालत का फैसला आ जागा मेरे खिलाफ”
ये टिप्पणी मलखान का प्रश्न थी या अंदेशा पता नहीं, परंतु सुधीर के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। सुधीर प्रश्नवाचक दृष्टी से मलखान को देखने लगा और कहा “फेर क्या हो अब?”
मलखान ने एक सांस छोड़ते हुए कहा “भरत 20 लाख मांगरा हा, 15 मे तो मान ही जागा। कुछ खूड़ बेचने पड़ेंगे। समझौता करूंगा अब, रांद ई कट जागी”
ये बात सुनकार सुधीर पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा लेकिन उसके पास बैठा उसका साला पूरी तरह से असहज हो गया।
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घर पर आकर सुधीर के साले ने ज़मीन बेचने की बात सुधीर की पत्नी सुलोचना से बता दी। रात को घर का माहौल हंगामाखेज़ हो गया था। सुधीर की पत्नी के आँसू थम ही नहीं रहे थे।
जब सुधीर ने कारण जानना चाहा तो सुलोचना चीख कर बोली “बुद्धि घुटनो मे ई धरी या वहाँ बी ना, ज़हर दे दे मुझे बी अर बालको कु बी”
ये बात अधिक गंभीर मांग को पूरी करवाने के समय ही सुलोचना बोलती थी। फ्रिज और टीवी लेने के लिए भी ऐसे ही बोली थी।
सुधीर ने कहा “कुछ बतावेगी भी, या बस गंझन गाती रहगी”
इतना सुनकर सुलोचना ने अपने भाई की तरफ देखा और कहा “देख लो कैसे से ब्याह दी, थारी इज्ज़त की खातर टाइम काट री बस”
सुधीर के कुछ खास समझ नहीं आ रहा था। सुधीर के साले ने अपनी बहन को शांत किया और बोला “बात करो आपस मे बैठ कै, लड़ने से कोई हल ना होने का है”
इस तरह कुछ समय के प्रयासो के बाद सुलोचना असली मुद्दे पर आई “जब यो मुकदमा छिड़ा हा 4 बीगे तो जब बिचगी ही। तुम्हारे चाचाओ का काम देख लो। अधिक जमीन ही तो और बी ले ली, शहर मै पिलोट बी ले लिए। हम क्या कररे, खूड़ इतने हैं ना जो घर का खर्च पूरा हो जा। फ़ैक्ट्री मे मजदूरी करते फिरो। अब और खूड़ बिक जांगे तो बचेगा क्या? ब्याहा होना बी भारी हो जागा लोंडे का। अब पुराना टाइम ना कि तुम्हारा हो गिया हा अर मेरे जैसी सोहनी-सूतरी लुगाऊ मिलगी ही”
असली मामला अब सुधीर के समझ आ गया था। पूरी रात चर्चा के बाद सुधीर को भी सुलोचना की बात व्यावहारिक ही लगी। जीवन भर देखता रहा वो कि उसके चाचाओ और ताऊ के पास उनसे अधिक जमीन थी तो उनकी ज़िंदगी भी उनसे अधिक खूशहाल थी। फिर ना तो मलखान और ना ही सुधीर दोनों मे से कोई भी इतना व्यावहारिक और तेज़ थे कि कुछ और काम-धन्दा जोड़ पाते। सुधीर पढ़ाई मे भी खास नहीं था तो ले-दे कर फ़ैक्ट्री मे मजदूरी ही कर रहा था।
इसके बाद कुछ दिन लगातार सुधीर के ससुरालियों का सुधीर के पास आना-जाना लगा रहा। वो सब सुधीर को समझाने मे कामयाब हो ही गए थे।
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जेल मे मलखान की कोई भी मुलाक़ात उस दिन के बाद नहीं आई। कोई ख़बर मिले 2 महीने से ऊपर बीत चुका था। मलखान को बस एक ही व्यसन था बीड़ी का। अब मलखान के पास पैसे भी नहीं बचे थे तो बीड़ी मांग-मांग कर पी रहा था।
किसी ने पूछा “पहलवान क्या बात तुम्हारी तो जमानत हो गयी थी फिर कोई ख़ैर-ख़बर नहीं आई?”
मलखान ने अनभिज्ञता और इंकार जताते हुए होठो को बिचकाकर सर हिला दिया। मलखान की आँखों मे आँसू आ गए। उस आदमी ने मलखान के कंधे पर हाथ रखा और पूछा “सब ठीक तो है”
मलखान ने कहा “गाम के हैं दो लोंडे भीतर ई, उनके मुलाकातीयों ने बताया सब ठीक है। बालक अपने काम पै लगरे भाई। जमानत कु नु बोलरे कि जमानती ना मिलरे अभी”
दूसरे आदमी ने कहा “अरे यार जमानती तो सब मिल जाते हैं, 30000 के जमानती भरे जांगे तुम्हारे तो। वकील से बात कर ले वो ई जुगाड़ करवा देगा”
मलखान ने पिछली मुलाक़ात पर जो जमीन बेचने कि बात काही थी वो उस आदमी को बताई और बोला “भाई जब यो मुकदमा शुरू हुआ था तब भाइयों ने साथ छोड़ दिया था। अबकी बार बेटा भी साथ छोड़ गया”
उधार गाँव मे सुधीर से जो भी जमानत के विषय मे पूछता तो सुधीर जमानती ना मिलने की बात बोलकर उनके सर पर ही बात डाल देता। मलखान की बेटियाँ और दामाद भी पीछे हट गए थे। सुधीर को जमीन मिलनी थी इसलिए वो जमानत नहीं करवा रहा था, और लोगो को कुछ नहीं मिलना था तो वो इसलिए इस चक्कर मे नहीं पड़ रहे थे। सबके पास अपने –अपने बहाने थे।
मलखान की ज़िंदगी एसे ही कटने लगी। खाना तो जेल मे मिल जाता था, लेकिन कपड़े, चप्पल, बीड़ी और ऐसी जरूरतों ने मलखान को भिखारी बना दिया था। मलखान जेल से आज़ादी चाहता था, क्योंकि उसे अपने पोते-पोतियों, बेटे और अपने घर की याद सताती रहती थी। ये मोह था की छूट ही नहीं रहा था।
9 महीने बीत जाने के बाद एक दिन रात मे मलखान को दिक्कत हुई। तुरंत जेल के अस्पताल मे ले जाया गया, लेकिन तब तक वो हृदयघात से गुजर चुका था।
