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Anuradha Kumari

Romance

2  

Anuradha Kumari

Romance

मन की बाते...

मन की बाते...

2 mins
73

तुम ही कहते हो की तुम मेरी सबकुछ हो। और तुम्हारा सबकुछ होने के बाद जब तुम कह देते हो की तुम पहले ऐसी थी वैसी थी तुम्हारे लायक नहीं थे हम फिर भी तुमने अपना लिया कोई और होता तो छोड़ के चला गया होता जब ये सब कहते हो तो ,कुछ देर के लिए मन में आहत जरूर होती है। इतना सब किया तुम्हें खुश रखने के लिए अपने खुशी को भी कुर्बानी किया।तुम्हारी खुशी के लिए क्या से क्या छोड़ दिया पता नहीं । इतना सब किया तुम्हारे लिए फिर भी कभी कभी हमारे बुराई का अहसास दिलाते हो । खैर छोड़ो मैं कुछ पल के बाद इस खयाल को मन से भुला देती हूँ। तुम भी तो ओ सब मुझे नहीं दे सके जो हमें चाहिए था ,और मैं भी न दे सकी ओ सब तुम्हें जो तुम्हें चाहिए था। कोई भी कहां दे पाता किसी को o सब जो चाहिए रहता है। पर हां तुम्हारे खुशी के लिए तुम्हारे खुशी के लिए जो मेरे पास था जो हमसे हों सका ओ मैंने दिया । मैं अपने आप से समझौता की तुम्हें खुश रखने के लिए और तुम्हें कुछ पल ही सही खुश रखी। अगर तुम इस समझौते को सहयोग कहते हो तो ओ मैंने बिल्कुल नहीं किया । न अपने आत्मसम्मान के साथ न अपने स्त्रीत्व के साथ और चाहे जो हो जाए न कभी करूंगी भी नहीं ताकि मैं खुद को जीवन भर कोसते रहूं.....।    

      


     


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