मित्र कौन
मित्र कौन
कहा गया है कि आपत् काल में मित्र की परीक्षा होती है। “ धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपत् काल परिखये चारी।” सच्चा मित्र कौन है यह तो आपत् काल आने पर ही पता चलता है। पर हमारे यहॉं धर्मग्रन्थों में यह भी कहा गया है कि” आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु हैं।”अपनी आत्मा का अपने से ही उद्धार करें। आप अपनी सहायता स्वयं ही कर सकते हैं। यदि आप न चाहें तो कोई आपकी सहायता नहीं कर सकता। आपको स्वयं आगे बढ़ना होगा।
हमारे यहॉं दोस्ती की मिसाल कृष्ण और सुदामा की दोस्ती से दी जाती है। कृष्ण और सुदामा संदीपिनि ऋषि के आश्रम में साथ पढ़ते थे। दोनों दोस्त थे। साथ ही पढ़ते थे साथ ही गुरु सेवा के लिये लकड़ी काटने जाते थे। पढ़ाई ख़त्म होने का बाद कृष्ण द्वारिका चले गये, वहॉं द्वारिकाधीश बने। उधर सुदामा निर्धन ब्राह्मण थे। निर्धनता से तंग आकर उनकी पत्नी ने उन्हें कृष्ण के पास भेजा। उपहार में वे एक पोटली में चिउड़ा बॉंधकर ले गये। वहॉं कृष्ण जी ने उनका बहुत आदर सत्कार किया और अपने हाथ से उनके चरण धोये। कवि नरोत्तम दास ने इसका वर्णन किया है-
“देखी सुदामा की दीन दशा,
करुणा कर करुणा निधि रोये,
पानी परात को हाथ छुओ नहीं,
नैनन के जल से पग धोये। “
कृष्ण उनकी निर्धनता देखकर इतने दुःखी हुए कि रो पड़े और अपने आंसुओं से ही सुदामा के पैर धो दिये। बाद में सत्कार कर उनको विदा किया और अपने समान ही ऐश्वर्य उनको दिया , उनकी झोंपड़ी की जगह महल खड़ा कर दिया बिन मॉंगे ही।
दूसरी कथा राजा द्रुपद की आती है जो गुरुकुल में द्रोण के दोस्त बने और उनसे कहा- “जब मैं राजा बनूँगा तब तुमको अपना आधा राज्य दे दूँगा “।
समय बीतने पर शिक्षा समाप्त हुई। द्रुपद पांचाल नरेश बने। द्रोण निर्धन रह गये। एक बार अपने नन्हें बालक अश्वत्थामा को दूध के लिये रोते देखकर वे विचलित हुए और सहायता मॉंगने पॉंचाल नरेश द्रुपद के पास पहुँचे और अपनी मैत्री की याद दिलाकर उनसे सहायता की मॉंग की। पर द्रुपद ने उनका सम्मान नहीं किया और उनको पहिचानने से ही इन्कार कर दिया और कहा कि -
“एक राजा में और एक निर्धन ब्राह्मण में मित्रता कैसी ? पर यदि तुम चाहो तो तुम्हें एक गाय दूध की व्यवस्था के लिये दे सकता हूँ “।
द्रोण वहॉं से असन्तुष्ट होकर निराश लौटे और हस्तिनापुर चले गये , वहॉं कौरव पाण्डवों को अस्त्र- शस्त्र की शिक्षा देकर उनके द्वारा राजा द्रुपद को हराकर अपने अपमान का बदला लिया। द्रुपद को दोस्ती नहीं निभाने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा।
दोस्ती निभाने के लिये मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का भी नाम लिया जाता है। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की तो उसे निभाया। उसके लिये निन्दा सहकर भी छिपकर उसके भाई बालि का वध किया, सुग्रीव की पत्नी वापिस दिलवाई और सुग्रीव को राज्य दिलाया।
श्रीराम ने विभीषण को भी शरण में ले राजा बनाया। राम रावण युद्ध में जब रावण ने विभीषण पर शक्ति चलाई तो श्रीराम ने विभीषण को पीछे कर शक्ति स्वयं पर झेलकर विभीषण को बचाया। इस तरह विभीषण से भी राम ने मित्रता निभाई।
जब सुग्रीव व विभीषण ने वही अपराध किया जो बालि ने किया था दूसरे की स्त्री को लेने का तो श्रीराम ने क्षमा किया, ध्यान में नहीं लाये मित्रता के कारण।
यदि सच्चा मित्र मिले तो दोस्ती अनमोल है। पर राम व कृष्ण की तरह सच्चा मित्र मिलना मुश्किल है। स्वार्थी मित्र आजकल होते हैं जो अपना स्वार्थ पूरा होते ही हट जाते हैं। जयचन्द व मीरजाफरों की कमी नहीं है। अतः नीति वचन है कि अपने पर विश्वास करो, अपनी सहायता स्वयं करो तो प्रकृति भी आपकी सहायता करती है आपको सहयोग मिलता है और आप आत्मविश्वास दृढ़निश्चय व संकल्प के बल पर सफलता पाते हैं। अपने सबसे अच्छे दोस्त आप स्वयं हैं।
