महाकाल का चक्र
महाकाल का चक्र
महासंग्राम: चोटी पर महाविनाश
आसमान के काले बादल बिजली की कड़क से नहीं, बल्कि सम्राट की भयानक काली शक्तियों के प्रभाव से फट रहे थे। पहाड़ की सबसे ऊँची और संकरी चोटी पर रुद्र और आर्यन खड़े थे। सम्राट की आँखों से निकलता काला धुआँ हवा में ज़हर की तरह फैल रहा था। उसने अपने हाथ हवा में उठाए और चीखा, "तुम तुच्छ इंसान इस अंधेरे को नहीं रोक सकते!"
रुद्र ने अपने भारी त्रिशूल को ज़मीन पर पटका। उसकी नोक से दिव्य नीली रोशनी की चिंगारियां निकलने लगीं। आर्यन ने अपनी मुट्ठी कसी, और उसकी अंगूठी से एक गहरी बैंगनी और आसमानी रोशनी का झरना सा बहने लगा। सम्राट ने अपनी पूरी काली शक्ति को बटोरकर एक विशाल, जलते हुए काले गोले के रूप में उनकी ओर छोड़ दिया। ऐसा लगा जैसे पूरा पहाड़ ही उस काली ऊर्जा के नीचे दब जाएगा।
"अभी आर्यन!" रुद्र चिल्लाया।
रुद्र ने अपने त्रिशूल को सामने की ओर ताना और आर्यन ने अपनी अंगूठी वाली हथेली उसके समानांतर रख दी। त्रिशूल की पवित्र नीली ज्वाला और अंगूठी की बैंगनी चमक आपस में उलझकर एक विशाल 'दिव्य रोशनी के चक्र' में तब्दील हो गई। यह चक्र किसी घूमते हुए सूरज की तरह तेज़ और शक्तिशाली था। जैसे ही रुद्र और आर्यन ने अपनी पूरी आत्मा की शक्ति उस चक्र में झोंकी, वह तेज़ी से सम्राट की ओर बढ़ा।
धमाका इतना भीषण था कि पहाड़ की चोटी का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया। सम्राट की काली ढाल कांच की तरह बिखर गई। वह दिव्य चक्र उसके सीने को चीरता हुआ पार निकल गया। सम्राट का काला शरीर धीरे-धीरे राख में बदलने लगा। उसके गले से रूह को कँपा देने वाली चीख निकली, लेकिन अगले ही पल वह धीमे से हँसा।
राख में मिलने से ठीक पहले उसने आर्यन की आँखों में देखा और खून से सने होंठों से बुदबुदाया, "मूर्ख... यह तो सिर्फ एक मोहरा था... यह तो बस शुरुआत थी आर्यन... अभी 'वह' बाकी है... जिसका नाम लेने से मौत भी कांपती है... वह आ रहा है।"
शब्द खत्म होते ही सम्राट का वजूद धूल बनकर उड़ गया। आर्यन और रुद्र वहां अकेले खड़े थे, लेकिन उनकी जीत की खुशी पर उस आखिरी सस्पेंस का गहरा साया मंडरा रहा था। 'वह' कौन था? क्या सम्राट से भी बड़ी कोई शक्ति अभी पर्दे के पीछे छिपी थी?
इस महासंग्राम की पूरी और रोमांचक दास्ताँ सुनने के लिए, मेरे पॉकेट नोवेल पर 'आशिक' कहानी सुनें।
