मेरी छोटी बहना*************
मेरी छोटी बहना*************
मेरे बड़े भाई की सबसे छोटी बेटी यानि मेरी सबसे छोटी भतीजी की शादी में हमारी छोटी बहन जब आयी थी बड़ी भाभी से नेग की लेन-देन में कुछ कहा-सुनी हो गयी थी। तभी से वह हम सबसे मुंह फुलायी हुई थी। ना आना-जाना ना फोन से बात-चित। भतीजी की शादी के बाद और कितने मौके आये उसके मायके आने के मगर कोई-न-कोई बहाना करके टाल गयी।
हम पांच भाई-बहनो में सबसे छोटी होने के कारण बचपन से ही परिवार में सबसे ज्यादा प्यार उसे ही मिलता था। इस कारण वह थोड़ी नकचढ़ी भी थी। उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी हुआ करती थी। या यूं कहिए कि अपनी जिद्द से अपनी सारी मांगे पूरी करवा लिया करती थी। एक बार मन में जो ठान ले उसपर अडिग रहना उसकी फितरत हो गयी थी और आज भी दो छोटे-छोटे बच्चों की मां होने के बावजूद भी वह वैसी की वैसी ही थी।
भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीकात्मक त्यौहार रक्षा बंधन नजदीक आ रहा था। मेरी मिसेज ने जिक्र किया तो मेरा दिल भर आया। बचपन से शादी होने से पहले तक कितने चाव से राखी बांधती थी। सावन महीने के शुरू होते ही वह दिन गिनना शुरू कर देती थी। कब श्रावणी पूर्णिमा आये और हम तीनों बड़े भाईयों की कलाईयों पर राखियां बांधकर रूपयों और कपड़ों वाले तोहफों के साथ-साथ अपने गालों पर प्यार भरी चपत भी पाये। राखी बांधने से एक मिनट पहले तक प्रतिदिन पूरी मासूमियत से यही पूछा करती थी। भैया इस बार क्या दोगे,इस बार मेरे लिए क्या लाये हो.?
शादी के बाद भी पिछले दो सालों को छोड़कर वह हर साल हम तीनो भाईयों को राखी बांधने अवश्य आया करती थी। जब आती थी क्या शमां बंधता था। आते ही अपने छोटे-छोट बच्चों के साथ पूरे घर में उधम मचा के रखती थी मालती। मेरा ये समान कहां है मेरा वो सामान कहां है। मां-बाबू जी से झगड़े भाभियों से तकरार। अंततः मेरे समझाने पर ही समझती थी। तब का वो दिन और आज का ये दिन। कैसे मनाऊं मैं अपनी बहन को। मिसेज ने इस बात का जिक्र कर मेरी बेचैनी और बढ़ा दी थी। मालती आने वाली नहीं थी। पिछले साल वह नहीं आयी तो मैं भी गुस्से से नहीं गया था।
इस बार भी उससे फोन पर बात करने की मुझे हिम्मत नहीं हो रही थी। अंततः मेरी मिसेज ने उससे आने की बात की तो वह रो पड़ी और बहुत देर तक रोती रही। जब दिल के छाले आंसुओं के साथ बहकर निकल गये तो वह बोली---"भैया कहां है..?" तो मिसेज ने मुझे फोन दिया। मैंने जब हेलो किया तो "छोटे भैया"कहकर सुबकने लगी। मेरे समझाने पर वह सामान्य हुई तो मैंने कहा--"रोती क्या है पगली, सारी पुरानी बातें भूला दो और आ जाओ। बहुत दिन हो गये तुम्हें देखे। मां-बाबूजी भी हमेशा चिंतित और दुखी रहते हैं तुम्हारे कारण। "
"अच्छा भैया"---कहकर उसने फोन रख दिया। शायद इससे ज्यदा वह नहीं बोल सकती थी,शायद दिल के गुबार अभी पूरी तरह बाहर नहीं हुए थे उसके।
वह बाहर से जितनी नकचढ़ी और गुस्सैल थी अंदर से उतनी ही कोमल। छोटी-छोटी बातों पर दिल द्रावित हो जाया करता था उसका।
मेेरे काफी समझाने के बाद वह आने को राजी हुई और हम तीनों भाइयों को राखियां बांधकर खुशी-खुशी अपने घर वापस गयी।
