मेरा श्राद्ध भी कर दो
मेरा श्राद्ध भी कर दो
गहरी नींद में हड़बड़ाहट के साथ रवि उठ बैठा और बोला कि पापा कह रहे है कि मैं भूखा है, मुझे खाना खिला दो। मेरा श्राद्ध भी कर दो।
क्या बात कर रहे हो आप?? पापा जी कैसे बोल सकते हों ?
उनका देहांत हुए तो 2 साल हो गया है और आज तक तो कभी दिखाई नही दिए। अब क्या हो गया अचानक से मीनल ने कहा
तुम सही कह रही हो... शायद मैं ही सपना देख रहा था इतना कहकर रवि बाथरूम में चला गया।
तभी मीनल की पड़ोस में रहने वाली शीला जी आई बोली लो आज मैंने खीर बनाई है तो उसका प्रसाद लायी हूँ मीनल को देते हुए बोली आज मेरे ससुर जी का श्राद्ध है उन्हें खीर बहुत पसंद थी तो अब मैं उनके श्राद्ध पर हमेशा खीर जरूर बनाती हूँ।
अच्छा मीनल ने कहा...
लेकिन हम तो श्राद्ध नही मानते, न ही कोई खाना किसी पंडित को देते है, हम तो कुछ नही करते... न ही मेरे ससुराल में इस तरह कोई खाना बनाकर पंडितों को दिया जाता है
शीला ने बड़े अचरज से कहा... करना चाहिए श्राद्ध... ये तो हमारा कर्तव्य है, संस्कार है, हमारे समाज की परंपरा है कि जिनकी मृत्यु हो जाती है। उनका श्राद्ध किया जाता है।
उनके लिए खाना, कपड़े, और कुछ जरूरी सामान पंडितों को दिया जाना चाहिए। खाना पक्षियों को डालते है...
ऐसा करने से हमारे बड़े बुजुर्गों को खुशी मिलती है, उनका आशीर्वाद हमेशा मिलता है और हमे संतोष मिलता है।
अच्छा तो क्या मैं भी श्राद्ध कर सकती हूं मीनल ने पूछा
हां तुम कर सकती हो... शीला ने कहा तुम्हारे ससुर जी की मृत्यु ही चुकी है तुम भी पंडित से पुछकर श्रद्धा से अपने ससुर का श्राद्ध करो।
तभी रवि भी आ गए मीनल ने रवि को सारी बात बताई तो रवि ने कहा हम भी पापा का श्राद्ध करेंगे।
पंडित को खाना खिलाने की बजाए किसी गरीब को खाना देंगे ताकि उस गरीब की दुआ भी मिल जायेगी।
रवि और मीनल अपने पापाजी के श्राद्ध की तैयारी करने लगे। अब पिताजी दूर से देखकर खुश थे कि अब उनके बच्चे भी उनका श्राद्ध करेंगे।
