मेजर शैतान सिंह, जिनका नाम सुन आज भी कांप जाती हैं चीन की सेना!
मेजर शैतान सिंह, जिनका नाम सुन आज भी कांप जाती हैं चीन की सेना!
मेजर शैतान सिंह, जिनका नाम सुन आज भी कांप जाती हैं चीन की सेना!
मेजर शैतान सिंह का जन्म जोधपुर, राजस्थान में 1 दिसंबर, 1924 को हुआ था। शैतान सिंह का पूरा नाम शैतान सिंह भाटी था। उन्हें 1962 में हुई भारत-चीन की जंग के लिए जाना जाता हैं। जिसके लिए उन्हें साल 1963 में मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया था। भारत के पास पर्याप्त सेना और हथियार ना होने पर शैतान सिंह और उनके साथी आखिरी सांस तक लड़ते रहे।
रेजांग ला में शैतान सिंह और उनके सैनिक साल 1962 में 24 अक्टूबर को जो 13वीं कुमाऊंनी बटालियन की C कंपनी थी लद्दाख में तैनात थी। बटालियन में 120 जवान थे। 1962 की जंग में भारतीय जवानों ने रेजांग ला में चीनी सैनिकों का सामना किया, जिसकी अगुआई मेजर शैतान सिंह कर रहे थे। बता दें, जब चीन ने भारत में हमला किया उस वक्त जवानों के पास ऐसे हथियार नहीं थे जो चीन के का सामना कर सकते।
चीनियों ने रेजांग ला पर मोर्टार तथा रॉकेटों से बंकरों पर गोलीबारी शुरू कर दी। हिन्दुस्तानी सैनिकों को केवल अपने जोश का सहारा था, क्योंकि रेजांग ला पर बंकर भी नहीं थे और दुश्मन रॉकेट दागे जा रहा था। इस बीच शैतान सिंह के हाथ में गोली भी लग चुकी थी।
यहां इतनी ठंड थी कि दांत से दांत बजते थे। 18 नवंबर 1962 का ही वो दिन था जब चीन ने भारत पर हमला बोल दिया था. बता दें चीन 120 सैनिकों को पर हमला करने के लिए चीन करीब 2000 हजार सैनिकों के साथ आया था..
18 नवंबर 1962 को सुबह के चार बज रहे थे और चीनी सेना के करीब 2000 जवानों ने लगभग 114-120 सैनिकों की टुकड़ी पर हमला कर दिया. ठंड की मार और दुश्मनों की तरफ से शुरू हुई गोलियों की बौछार का सामना भारतीय सेना ने बड़ी बहादुरी से किया.
चीनी नहीं जानते थे कि उनका सामना शैतान सिंह और उनके वीरों से था। सुबह के करीब 5 बजे भारतीय सैनिकों ने चीनियों पर गोली बरसानी शुरू कर दी। कुछ ही देर में हर तरफ दुश्मन की लाशें पड़ी थी। जब कुछ चीनी मारे गए थे उस वक्त मेजर शैतान सिंह ने कहा था कि ये मत समझना युद्ध का अंत हो गया हैं। ये तो शुरुआत हैं। जिसके बाद चीन ने दोबारा आक्रमण किया। जब तक भारतीय सैनिकों के पास गोलियां लगभग खत्म हो गई थी। उस वक्त 5 से 7 गोलियां बची थी।
शैतान सिंह को आभास हुआ चीन की ओर से बड़ा हमला होने वाला है। तो उन्होंने अपने अधिकारियों को रेडियो संदेश भेजा और मदद मांगी। जिसके बाद वहां से जवाब आया कि इस वक्त मदद मुमकिन नहीं हैं। जिसके बाद उन्होंने कहा कि आप चौकी छोड़कर पीछे हट जाए।
जोधपुर के राजपूत मेजर शैतान सिंह भाटी के लिए पीछे हटना मुमकिन नहीं था। उन्हें मालूम था वक्त कम हे और चीन के सैनिक कभी भी हमला बोल सकते हैं। जिसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाया और कहा- "हम 120 हैं। दुश्मनों की संख्या हमसे ज्यादा हो सकती हैं। पीछे से हमें कोई मदद नहीं मिल रही हैं। हो सकता हैं हमारे पास मौजूद हथियार कम पड़ जाए। हो सकता हैं हम से कोई न बचे और हम सब शहीद हो जाए। जो भी अपनी जान बचाना चाहते हैं वह पीछे हट ने के लिए आजाद हैं। लेकिन मैं मरते दम तक मुकाबला करूंगा। शैतान सिंह का मानना था "प्राण जाए पर वचन ना जाए।"
कम हथियारों को देखते हुए रणनीति बनाई गई कि जब चीनी सैनिक फायरिंग रेंज में आएं। तभी उन पर गोली दाग़ी जाए। मेजर सिंह ने जवानों को बताया कि एक फायरिंग में एक चीनी सैनिक को मार गिराओ। इस रणनीति पर काम करते हुए भारतीय सेना ने चीनी पक्ष को खदेड़ दिया।
करीब 18 घंटों तक चली इस जंग में भारतीय सेना के 114 जवान शहीद हुए। गोलीबारी के दौरान पलटन ने संदेश दिया कि चीनी पक्ष को खदेड़ दिया गया हैं। हालांकि, कुछ देर बाद ही चीनी सेना ने गोला दाग दिया। इस दौरान हुई जमकर गोलीबारी और बमबारी में भारतीय सेना के तीन बंकर तबाह हुए। बमबारी में ही मेजर सिंह के हाथ में शेल का टुकड़ा आकर लग गया और वो घायल हो गए। साथी जवानों के समझाने के बावजूद वो लड़ते रहे। उन्होंने मशीन गन मंगाकर उसके ट्रिगर को पैर पर बंधवाया।
शैतान सिंह जानते थे ये लड़ाई जीत पाना संभव नहीं हैं 2000 चीनी सैनिकों के सामने 120 भारतीय जवान कब तक टिक सकते थे, लेकिन वह ये भी जानते थे कि अगर सभी जवान शहीद हो गए थे तो कोई कभी नहीं जान पाएगा रेजांग ला में क्या हुआ था। जिसके बाद उन्हों ने दो घायल सैनिकों से कहा कि वहां से चले जाए और जाकर सीनियर अफसरों को सूचना दी जाए 13वीं कुमाऊंनी बटालियन की C कंपनी के सैनिक किस तरह से लड़े थे।
घायल मेजर पैरों की मदद से दुश्मनों पर गोलियां बर सा रहे थे। हालांकि, तब तक काफी खून बहने के चलते उनकी हालत बिगड़ती गई। जंग में मौजूद सूबेदार रामचंद्र यादव ने भी बड़ी भूमिका निभाई। वो मेजर को अपनी पीठ पर बांधकर बर्फ में लुढ़क गए। बाद में उन्होंने मेजर सिंह को पत्थर के सहारे लिटाया। कुछ समय बाद ही मेजर दुनिया को अलविदा कह गए।
मेजर शैतान सिंह आखिरी सांस तक युद्ध भूमि नहीं छोड़ना नहीं चाहते थे। 13वीं कुमाऊं के इस पराक्रमी पलटन में केवल 14 जवान जिन्दा बचे थे। इनमें भी 9 गंभीर रूप से घायल थे। भारत के 120 जवानों ने 1,300 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। इस जंग में 114 भारतीय जवान शहीद हुए, 5 को युद्धबंदी बनाया, लेकिन भारत ने भी करीब 1300 चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया था।
जिसके बाद युद्ध को खत्म हुए 3 महीने हो गए थे। वहीं शैतान सिंह के बारे में कुछ भी नहीं मालूम चला था। तीन महीने बाद जब बर्फ पिघली और रेड क्रॉस सोसायटी और सेना के जवानों ने उन्हें खोजना शुरू किया। तब एक गड़रिया अपनी भेड़ चराने के लिए रेजांग की ओर जा रहा था। वहीं बड़ी सी चट्टान में वर्दी में कुछ नजर आया। जिसके बाद उसने ये सूचना वहां मौजूद अधिकारियों को दी।
गड़रिया की खबर के बाद जब सेना वहां पहुँची तो उन्होंने जो देखा उससे देखकर सबके होश उड़ गए। एक-एक सैनिक उस दिन भी अपनी-अपनी बंदूकें थामे ऐसे बैठे थे, जैसे मानो अभी भी लड़ाई चल रही हो। उन में शैतान सिंह भी अपनी बंदूक थामे बैठे थे। रेजांग ला आज शूरवीरों का तीर्थ हैं| मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को उनके घर जोधपुर भेजा गया जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया। वहीं बाकी वीरों को पूरे सम्मान से वहीं अंतिम संस्कार किया गया।
