Rama Seshu Nandagiri

Romance


5.0  

Rama Seshu Nandagiri

Romance


मैथिली

मैथिली

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साकेत और मैथिली पति-पत्नी, दोनों नौकरी करते हैं। उनकी शादी हुए सिर्फ़ चार महीने हुए। घर के सारे काम-काज साकेत की मां कमला ही अधिकतर संभालती हैं।

शनिवार का दिन। साकेत नाश्ते के इंतजार में हाल में बैठकर टीवी देख रहा है। मैथिली कमरे में है।

"मैथिली, आकर थोड़ा सब्जी देखो। मुझे अभी रोटी सेंकनी है।" कमला ने आवाज लगाई।

पर वहां से कोई उत्तर नहीं। दूसरी बार फिर से कमला ने आवाज लगाई। फिर भी कोई फायदा नहीं।

साकेत "मैं देखता हूं मां।" कहकर कमरे में दाखिल हुआ। वहां मैथिली आराम से लेट कर मोबाइल में कुछ देख रही है। साकेत बोला, "मैथी, मां बुला रही है, सुनी नहीं क्या।"

मैथिली उठ कर "कहदो न, मेरी तबियत ठीक नहीं।" असहनता दिखाते बोली।

"क्या हुआ तुम्हें, ठीक तो लग रही हो।" साकेत भौंहें तन कर पूछा।

"इसका मतलब है, मैं आराम नहीं कर सकती। नौकरी भी करो, घर में भी काम करो। यह मुझ से नहीं होता।" मैथिली ने असहनता दर्शाई।

"देखो, इन सब बातों पर बादमें विचार किया जा सकता है। अभी तो किचन में जाओ।" कटुता से बोला।

मैथिली पैर पटकते बाहर चली गई। साकेत भी पीछे हो लिया। किचन में जाते ही "मां, मेरी थोड़ी सी आंख लग गई थी। वो मुझ पर चिल्लाने लगे।" शिकायती की मैथिली ने।

"अरे, मुझे पता नहीं था। नहीं तो मैं आवाज नहीं लगाती। बेटा, क्यों जगा दिया बेचारी को।" ‌मां‌ने फटकारा।

साकेत बिना कुछ कहे हाल में जा बैठा। थोड़ी देर में साकेत के पिता रामनाथ जी भी आए, सब ने नाश्ता कर लिया।

"मां, मैं और मैथिली बाहर जा रहे हैं। हमारे लिए मत पकाना। शाम तक आएंगे।" कहते हुए कमरे में चला गया। मैथिली चकित हो उसके पीछे हो ली।

"साकेत, कहां जाना है हमें। मुझे तो कुछ बोले नहीं।'आश्चर्य से पूछी

"तो क्या हुआ, अब बोला है न। तैयार हो जाओ।" शांति से बोला।

थोड़ी देर में मैथिली और साकेत तैयार हो चले गए।

आधे घंटे के बाद एक काफी शाप में गए। काफी आर्डर कर टेबल पर बैठे। 

"मैथी, तुम्हारे मन में क्या है, तुम क्या चाहती हो।" साकेत ने पूछा।

"क्या, मतलब।" मैथिली ने चकित होकर कहा

"वही, तुम घर में मां का हाथ बंटाना नहीं चाहती। तुम आखिर क्या चाहती हो। तुम्हारा इरादा क्या है।" साकेत ने उसे गंभीरता से पूछा।

"पूछ कर क्या करोगे। तुम्हें तो पसंद नहीं।" आंखों में आंसू भरकर बोली।

साकेत सुन्न पड़ गया। उसे याद आया कि मैथिली शादी होने के कुछ दिन बाद ही बोली थी कि उसे सम्मिलित परिवार में रहना पसंद नहीं, क्योंकि वह बचपन से अपने माता-पिता के साथ छोटे परिवार में रही। उसे वैसे रहना ही पसंद है। उ‌सने उसकी बातों पर इतना गौर नहीं किया। धीरे-धीरे परिवार में रहने की आदत हो जायेगी, सोचा। पर आज समझा कि वह अपनी बात नहीं भूली। उसके मन में अभी भी वही इच्छा है।

साकेत को मौन देखकर मैथिली ने कहा ", मैं समझ गई। तुम्हें पसंद नहीं। छोड़ दो। जैसे भी होगा, वैसे ही रह लूंगी।" मुंह मोड़ते हुए निराश भरे स्वर में बोली

"मैथी, मुझे सोचने दो। मैंने उस समय तुम्हारी बात पर इतना गौर नहीं किया। अभी तो तुम्हारे मन की बात समझ सका। इस विषय पर हम चर्चा करेंगे। ठीक है।" साकेत ने समझाने के लिहाज से कहा।

"किस से चर्चा करोगे।" शंकित हो बोली मैथिली।

"किसी और से नहीं, आपस में चर्चा करेंगे।" हंसते हुए कहा।

"किस बात पर चर्चा करनी होगी! हम दोनों को पसंद हो तो अलग रहेंगे। इसमें सोचने, समझने या बहस करने की क्या जरूरत है?" मैथिली ने आश्चर्य से कहा। उसे लग रहा था कि साकेत किसी न किसी रूप में उसे समझा कर मिल-जुलकर रहने को बाध्य करेगा।

साकेत उसके दिल की बात भांप कर हंसते हुए "मैथी, क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं! देखो, कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले एक से दो बार सोच लेना अच्छा है। जल्द बाजी में नहीं करना चाहिए। तुम सब्र करो। सब कुछ तुम्हारी इच्छा के अनुसार होगा।" आश्वासन दिया।

मैथिली को विश्वास हो गया कि अब साकेत उसकी चाहत पूरी करेगा। इस आश्वासन से खुश होकर वह अपने घर के स्वप्न देखने लगी। साकेत ने उसे पुकारा और कहा "अभी हमें सिनेमा देखने जाना है, चलो।" दोनों वहां से सिनेमा घर पहुंचे।

कुछ और दिन बीत गए। मैथिली को अपने मौसी के लड़की की शादी में शरीक होना था। उस कारण वह बहुत व्यस्त हो गई। दोनों अपनी चर्चा को तात्कालिक रूप से रोक दिए।

इस प्रकार दो महीने तक बीत गए। एक दिन साकेत ने उससे दोस्त के घर चलने का आग्रह किया। दोनों शाम को तैयार होकर दोस्त के घर पहुंचे।

"राहुल, राहुल।" दरवाजे पर दस्तक देते हुए साकेत ने पुकारा।

"आ रहा हूं।" अंदर से आवाज़ आई और साकेत के हम उम्र के व्यक्ति ने दरवाजा खोला और मुस्कुरा कर उनका स्वागत किया।

"राहुल, ये है मेरी पत्नी मैथिली। मैथिली, यह है राहुल। " साकेत ने दोनों का आपस में परिचय किया।

"आइए भाभी," कहते हुए राहुल ने पुकारा "सोना, देखो कौन आए।"

इतने में सोनाली बाहर आई, "कैसे हैं भैया" कहती हुई "आइए मैथिली जी, हम अंदर बैठते हैं।" अंदर ले गयी।

"अब बोल राहुल, कैसे चल रहा है।" दोस्त का हाथ अपने हाथ में लेकर पूछताछ की साकेत ने।

"क्या कहूं यार। शादी के कुछ दिन बाद आफिस दूर होता कहकर घरवालों से दूर आ गये। अब वह प्रेगनेंट हैं, काम नहीं कर सकती। आराम नहीं मिलता। उसकी मां ने पहले ही कह दिया कि ‌पिताजी

शुगर पेशंट हैं, उनको छोड़ कर नहीं आ सकतीं। मेरी मां को किस मुंह से आने के लिए कहूं। उनको छोड़ कर हम बाहर आ गये। क्या करूं, समझ नहीं आता।" राहुल लंबी सांस लेते हुए कहा।

"एक बार पूछ लेना चाहिए। शायद मां आ जाए तो तुम्हारी दुविधा दूर हो जाती न।" साकेत ने कहा।

"मैं ने तो नहीं, पर एकबार मेरी बहन ने मां को उसके पास आने के कहा तो मां ने कह दिया कि वह घर छोड़कर आएगी तो पिताजी को मुश्किल होगा, इसलिए वह कहीं नहीं आएगी, उनके पास जो भी

आए, उनकी मदद करेगी। अब कैसे पूछूं, बताओ।" राहुल ने कहा निराश भरे स्वर में।

इतने में चाय लेकर आगये सोनाली और मैथिली।

"आइए, चाय पीते हैं," कहते हुए सोनाली ने सबको चाय पकड़ाया।

"कैसी हो सोनाली, आफिस जा रही हो।" साकेत ने पूछा।

"हां भैया, जा रही हूं। पर बहुत मुश्किल है भैया। घर में कोई मददगार न हो तो काम निपटाने में बहुत दिक्कत हो रही है।" बोली सोनाली।

"ये गधा क्या करता है, मदद नहीं करता?" पूछा साकेत ने राहुल के पीठ पर हाथ जमाते हुए।

"राहुल भी कितना कर सकते। इसलिए मैने निर्णय ले लिया है भैया। राहुल, आपसे भी अभी बोल रही हूं, हम वापस मां के पास चले जाएंगे।" सोनाली ने कहा।

राहुल आश्चर्य से "क्या कह रही हो सोना।" पूछा।

"हां राहुल, मां को यहां बुलाने में आप संकोच कर सकते हैं, पर हमारे वापस जाने में क्या दिक्कत है।" सोनाली ने कहा

"लेकिन - " राहुल हकलाने लगा।

"राहुल, आप मत झिझकना। मैं स्वयं मां और पापा से बात करूंगी। जरुरत पड़े तो पांव पडूंगी। पर मुझसे यह सब सहा नहीं जाता। अभी यह हाल है तो कल बच्चे होने के बाद क्या होगा। अब तो मैं ने निर्णय ले लिया है कि वापस अपने घर चले जाएंगे।" आंखों से बहते आंसुओं को पोंछ ते हुए बोली। राहुल उठकर उसके पास जाकर बाहों में भर कर कहा "नहीं चिंता मत करो, मैं हूं न, उन्हें मना लूंगा।'

साकेत "राहुल, ये सब क्या है। तुम लोग ठीक हो।" विस्मित हो कहा।

राहुल साकेत की तरफ़ देखकर बोला "साकेत, तुम दोनों हमारी जैसी गलती कभी नहीं करना। कुछ दिन सब कुछ अच्छा लगा। पहले पैसे की तंगी, फिर धीरे धीरे छोटी छोटी बातों में तू तू - मैं मैं । इतने में प्रेग्नेंसी। पूछो मत। इसलिए अब वापस अपने घर जाने का निर्णय किया है।"

थोड़ी देर उनसे बातें करके दोनों वापस आ गये।

अगले दिन साकेत के मां और पापा रिश्तेदारों से मिलने गए। घर पर ये दो ही थे। साकेत ने मैथिली को बुलाया और कहा "मैथी, हम दोनों अलग से रहने के विषय में बात करने वाले थे। पर आज तक समय नहीं मिला। आज हम अकेले हैं। बात करते हैं बैठो।"

मैथिली साकेत को एकटक देखती हुई बोली " साकेत, क्या आप मेरी परीक्षा लेना चाहते हो। नहीं साकेत। मेरी आंखें खुल गईं। कल उन दोनों को देखकर समझ गई कि बड़ों की कितनी आवश्यकता है। मैंने अपने को सोनाली के स्थान पर रखा और महसूस किया। मेरे समझ में आगया कि हम अकेले नहीं रह पाएंगे। मुझे माफ़ कर दो, मैंने मेरी बातों से आपको कष्ट पहुंचाया।"

"नहीं मैथी, ऐसा कुछ नहीं। मै तुम्हें खुश देखना चाहता हूं। जहां तुम खुश रहोगी, मैं भी वहीं खुश रह सकूंगा।" कहते हुए साकेत ने मैथिली को बाहों में भर लिया। मैथिली भी उस आलिंगन मे सुखमय भविष्य देखने लगी। 

साकेत मन ही मन खुश हुआ कि बड़ों तक बात गये बिना सुलझ गई। राहुल और सोनाली के रूप में उसकी समस्या का समाधान मिल गया।


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