मैं हूँ
मैं हूँ
सुवासित प्रेम भरा परिमित आँगन हूँ।
तिरस्कृत भावों का कोरा दर्पन (दर्पण) हूँ।
जिसे कोई अपना कहना नहीं चाहता,
वो साझे ‘मैं’ के भीतर ‘मैं’ का मन हूॅं।
मुझे कोई और पुकारे और कैसे भी,
भ्रमणहारी बहता मैं मुक्त पवन हूॅं।
तुम्हें कंटक पर उसको पुष्प लगे है,
मैं मीठी मादक शोख सुभग चितवन हूॅं।
तुम्हारा और कि मेरा छोड़ के अब मैं,
‘हमारे’ में संरक्षित साझा मन हूँ।
