मायके से मिली विदाई
मायके से मिली विदाई
सासु मां को जवाब देते हुए गायत्री बोली "यह साड़ियां मेरी नहीं हैं अपितु यह तो भाभी की वह साड़ियां हैं जो कि वह पहनती ही नहीं हैं। हमारे मायके में तो मम्मी भाभी और मैं एक दूसरे की साड़ियां पहन लेते हैं। इसलिए मैं इन्हेंअपने साथ ले आई हूं।"
"पहले तो तुम्हारे माता-पिता तुमको कितने पैसे विदा में दिया करते थे अब तो तुम्हारी भाभी के आने के बाद उन्होंने तुम्हें पैसे देना बंद क्यों कर दिया?" सासु मां बोलीं.
"अब क्या बताऊं माता जी? मायके में भैया की शादी पर मम्मी ने दहेज में कुछ भी नहीं लिया, आपको पता तो है। जब मैं मायके से इतना सामान लाऊंगी तो कहीं भाभी को दुख ना पहुंचे, इसलिए मैं भी कह देती हूं कि बस अब मुझे भी बहुत मिल चुका है अब कुछ भी लेने देने की जरूरत नहीं है। फिर भी उनके बहुत जिद करने पर मैं ₹10 विदा के ले लेती हूं। आप कहो तो वो पैसे ला कर आपको दे दूं"। इतने में गुड़िया के रोने की आवाज सुनकर गायत्री अपने कमरे में चली गई।
हुंह कहकर सासू मां भी दूसरी तरफ निकल गईं और रानी दीदी हसरत भरी नजर से रोज गायत्री के कपड़े देखा करती थीं। अपनी बहू के मायके से ना लें तो उनकी मर्जी, लेकिन बेटी को भी ना दें यह अनोखी रीत चलाई है इसके मायके वालों ने! सासु मां और रानी की आवाजें आ रही थीं। रहने दो अम्मा, आजकल बहुएं पालना इतना आसान काम नहीं है, रोज के किस्से तो आप सुन ही रही हो। दिन पर दिन रजत भी तो अब इसकी तरफदारी करने लगा है। हां--- पर!
पिछली 3 बारी से ऐसा ही हो रहा था। बच्ची होने के बाद छू छक में भी तो कुछ नहीं आया। कुल एक एक साड़ी देकर विदा कर दिया। पैसे भी तो कितने कम दिए । लेकिन फिर वह दोनों चुप हो गई शायद उन्हें एहसास हो गया था कि बच्ची की रोने की आवाज बंद होने के कारण गायत्री को अब सब कुछ सुन रहा होगा। गायत्री भी ख्यालों में खो गई। विवाह के समय वह अपने पर्स में अपने जुड़े हुए पैसे भी ससुराल में लेकर चली गई थी लेकिन जाते ही उससे पर्स ले लिया गया और उसमें से पैसे निकालने के बाद सासु मां ने बतलाया कि यह सारे पैसे मायके वाले ससुराल की औरतों को पैर छूने के लिए देते हैं। गायत्री बहुत दुखी हुई। उसकी अच्छी साड़ियां भी उसकी ननद रानी ने ले ली थी। केवल इतना ही नहीं उसकी 2 साड़ियां चाचा जी की दोनों बेटियों को भी यह कहकर दिलवा दी गई तुम्हारे मायके से आई साड़ियां कम पड़ गई हैं।दूसरी बार जब वह पगफेरा करने के बाद वापस आई तो रानी ने उसकी नई साड़ियों में से भी एक साड़ी छांट ली। पुरानी साड़ी यह कहकर नहीं लौटाई कि एक बार पहनी हुई साड़ी का क्या लौटाना?
उसके बाद वह जब भी मायके जाती थी, उसके मायके से मिले हुए सारे पैसे सासू मां रख लेतीं थी। उनके ख्याल से बहू को पैसों की जरूरत ही क्यूं है? सारा घर का सामान तो महीने की शुरुआत में आ ही जाता है और फिर अगर किसी खास चीज की जरूरत है तो बहू अपने मायके से मंगवा सकती है।
बेटी होने के समय में गायत्री को बहुत कुछ घर से अलग कुछ खाने को मन होता था लेकिन क्योंकि रजत की तनख्वाह में से सारे पैसे तो उसको अपनी मां को ही देने होते थे उसमें से कुछ पैसे उन को जेब खर्च के मिलते थे उसी में से ही जोड़कर वह गायत्री के खाने के लिए कुछ ले आता था।
गायत्री के पास तो पैसे रहते ही नहीं थे इसलिए अब गायत्री कई बार तनावग्रस्त भी हो जाती थी। पिता बनने के कारण खर्चा बढ़ेगा इसलिए अब रजत ने भी फैसला कर लिया था कि अपनी तनख्वाह वह खुद रखेगा और घर खर्च के कुछ पैसे ही अपनी मां को दिया करेगा। बेटी होने से पहले अब के जब वह मायके गई तो उसने घर में पहनने के लिए गाउन खरीद लिए और अपनी मम्मी से कपड़ों के लिए केवल पैसे ही लिए।
मां को भी उसकी समस्या समझ में आ गई थी और यूं भी भाई की शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे। उन्होंने भाभी के ससुराल वालों से कुछ भी नहीं लिया था। भाभी के पिता तो थे ही नहीं उनकी मां स्वयं ही उसके भाई भाभियों पर आश्रित थी। जैसे तैसे विवाह निपट गया वही काफी था।
गायत्री के माता-पिता ने अपनी तरफ से ही गायत्री को उसके ससुराल वालों के लिए उपहार देकर भेजा था। ससुराल वालों के बढ़ते लालच से गायत्री खुद भी परेशान थी और क्योंकि अब उसे मां भी बनना था उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ने वाली थी।
अब के ससुराल वापस जाने पर हमेशा के जैसे उसने सारे पैसे सासु मां को नहीं दिखाए अपितु कहा कि क्योंकि मम्मी ने भाभी के मायके से कुछ भी नहीं लिया है इसलिए भाभी को महसूस ना हो तो उसने भी अपने मायके से विदा में केवल ₹10 से ही लिये हैं। वह पैसे आप लेना चाहो तो ले लो।
बहुत देर तक सासुमां के रजत के सामने चिल्लाने की आवाज आती रही लेकिन रजत कुछ भी नहीं बोला। उसके बाद गायत्री अब मायके से लाए पैसे सासू मां को नहीं देती थी और ना ही लाए हुए कोई कपड़े दिखाती थी।
शुरू में एक दो बार रूसा मनव्वल हुआ लेकिन अब घर में रानी और सासू मां दोनों को समझ आ चुका था। रजत अब भी घर खर्च के काफी पैसे घर में दे देता था लेकिन अपनी बच्ची के लिए भी उसने बचत करनी शुरू कर दी थी।
पाठकगण आपका क्या ख्याल है माना गायत्री झूठ बोलकर ही मायके से आए हुए सारे पैसे रख लेती है लेकिन वह गलत भी तो नहीं है ना?
