Sudha Adesh

Inspirational


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मायावी देश की चकाचौंध

मायावी देश की चकाचौंध

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ममा का प्यार भरा आग्रह था या छोटी बहन अर्चना से मिलने की चाह, वंदना विपुल पर बच्चों की जिम्मेदारी सौंप कर मायके चली आई थी। छोटी बहन जिसके साथ माता-पिता रूपी वटवृक्ष के तले बचपन से लेकर जवानी तक के चौबीस बसंत हँसते खेलते बिताए थे, साथ-साथ घूमे थे, साथ-साथ पढ़े थे, यहाँ तक कि एक दूसरे की ग़लती छुपाने के लिए, एक दूसरे के लिए डांट भी खाई थी। किंतु समय के प्रवाह ने उनकी मासूम भावनाओं को रौंदते हुए उन्हें अलग कर दिया था।

समय के प्रवाह को क्या कोई रोक पाया है ? समय तो समय है, एक ही गति, एक ही लय के साथ निरंतर चलता हुआ... जो उसके साथ चल सका चलता गया और जो रुक गया वह कहीं अंधकार में विलीन हो गया। यही हाल रिश्ते नातों का है सच तो यह है कि खून के संबंध भी कभी समय की कमी या दूरी के कारण असमय दिलों में दूरियाँ पैदा कर देते हैं पर उनके साथ ऐसा नहीं था। दूर रहते हुए भी अर्चना और उसने सदा संपर्क बनाए रखा। यही कारण था कि अर्चना ने उसे अपने भारत प्रवास के कार्यक्रम की सूचना महीनों पहले ही दे दी थी तथा साथ में क्षमा मांगते हुए कहा था कि समय की कमी के कारण वह मेरठ आने में असमर्थ है अतः तुम जीजाजी एवं नवीन और निधि के साथ रायबरेली आ जाओ कम से कम मिलना तो हो जाएगा वरना फिर पता नहीं कब भारत आना हो पाये।


संयोग ऐसा बना कि जिन दिनों अर्चना को आना था उन्हीं दिनों नवीन और निधि की परीक्षाएं पड़ गई। वंदना असमंजस में थी तथा कोई भी निर्णय नहीं ले पा रही थी। उसकी मनः स्थिति को समझकर विपुल ने कहा," तुम क्यों परेशान हो रही हो, मैं तो हूँ ना बच्चों के पास। अब बच्चे इतने छोटे भी नहीं है कि तुम्हारे बिना रह ना सकें वैसे भी तीन ही पेपर तो बाकी रह गए हैं। तुम निश्चिंत होकर जाओ परीक्षा समाप्त होते ही मैं बच्चों को लेकर आ जाऊँगा।"


नवीन और निधि ने भी विपुल की बात का समर्थन कर दिया था। विपुल प्रारंभ से ही बच्चों के स्वतंत्र विकास के पक्षधर रहे हैं। उनके अनुसार बच्चों को अपना काम स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए जिससे कि कभी किसी भी स्थिति में उन्हें परेशानी ना उठानी पड़े लेकिन परीक्षाओं के कारण वह स्वयं को जाने के लिए तैयार नहीं कर पा रही थी। विपुल और बच्चों के प्रोत्साहन एवं मम्मा पापा और अर्चना का आग्रह ना ठुकरा पाने के कारण वह बीती मधुर यादों के सुनहरे संसार एवं मम्मा की गोद में सिर छुपाने की आस लिए मायके चली आई। 


कल अर्चना आने वाली है पूरा घर बिछा जा रहा है उसके स्वागत सत्कार के लिए। आखिर इतनी भागदौड़ हो भी क्यों ना छह वर्ष के पश्चात बेटी दामाद अपने एक वर्षीय पुत्र विनी... विनय के साथ भारत आ रहे हैं। अखिलेश को नाश्ते में ख़स्ता कचौड़ी एवं हरी मिर्च का अचार पसंद है। खाने में केले के कोफ्ते, मटर पनीर ...एक सप्ताह का मीनू तैयार कर लिया गया है। कहीं मुनस्पलिटी के अशुद्ध जल से उनका पेट न खराब हो जाए इसलिये एक्वागार्ड वाटर फिल्टर की जगह आर.ओ. की व्यवस्था भी कर ली गई है।

अर्चना पहली बार उसको लेकर आ रही है अतः परंपरा अनुसार छोचक भी देना होगा। लगभग बीस पच्चीस हजार का सामान तो देने के लिए आ गया है... पोते के लिए सोने की चेन, महंगे कपड़े, विभिन्न प्रकार के खिलौने... अर्चना के घर के अन्य सभी सदस्यों के लिए कपड़े इत्यादि इत्यादि। बीच-बीच में फिर भी बात उठ जाती कि विदेश में रहने वालों को यह सामान पसंद भी आएगा या नहीं। 


उसे याद आया वह दिन जब वह नवीन को लेकर पहली बार आई थी तब विदा के समय पापा ने नवीन को पाँच जोड़ी कपड़े एवं उसे एक साड़ी ब्लाउज देते हुए कहा था , "बेटा तू तो जानती है कितना ख़र्चा है। कुछ बचत नहीं हो पाती है। पूरा वेतन अर्चना और अनिल की पढ़ाई पर खर्च हो जाता है। कुछ भी नहीं दे पा रहे हैं तुझे।"

"यह सब तो दिखावे की वस्तुएँ हैं। मेरे लिए तो आपका प्यार एवं आशीर्वाद की बहुत है।" वह भी मामा पापा की मजबूरी समझती थी उनको दिलासा देते हुए बोली थी।


विपुल ने भी उसके कथन का समर्थन कर दिया था। निधि के समय उन्होंने कुछ कहने और देने की आवश्यकता ही नहीं समझी थी किंतु आज जब पापा रिटायर हो गए हैं वह पचास- साठ हजार कैसे खर्च कर कर पा रहे हैं ? सोचते-सोचते सिर दर्द करने लगा था। जितना अनचाहे विचारों को मन से निकालने की कोशिश करती, उतना ही वे बिन बुलाए मेहमान की तरह उसके दिल में दस्तक देने लगते। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे हो क्या रहा है ? पहले तो वह ऐसी नहीं थी। वह अर्चना की बड़ी बहन है फिर यह ईर्ष्या क्यों ?


वास्तव में ममा - पापा का छोटी बहन अर्चना के स्वागत का असीमित उत्साह देखकर वंदना का मन बुझ गया था। न जाने क्यों उसे ऐसा लगने लगा कि शायद ममा ने अपनी सहायता के लिए ही उसे बुलवा लिया है। वह भी वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ अपने घर परिवार को छोड़कर अपनी छोटी बहन से मिलने की चाह लिए दौड़ी चली आई है। अनायास ही बहन के लिए सहेज मन के सुकोमल संतों में जलन होने लगी।  इसके साथ ही मन में हीन भावना के निरंतर हावी होते विचार जो उसके मासूम दिल को कुरेद कुरेद कर लहूलुहान कर रहे थे। बिन बुलाए विचारों का कटीला बर्फीला तूफान उसके दिलो-दिमाग पर थपेड़े मार रहा था…


क्या वह इस घर की पुत्री नहीं है ? उसका और विपुल का तो उसके मम्मी पापा ने कभी ऐसा स्वागत नहीं किया। अच्छा ही हुआ जो विपुल नवीन और निधि की परीक्षा के कारण उसके साथ नहीं आ सकते किंतु जब दो दिन पश्चात में आएँगे तो अर्चना एवं अखिलेश के स्वागत की जोरदार तैयारियाँ देखकर क्या उनके मन को ठेस नहीं पहुँचेगी ? कहीं वह भी उसकी तरह ही न सोचने लगें ?

वैसे विपुल एक अनोखे व्यक्तित्व के मालिक है और सहनशीलता तो उन्हें विरासत में मिली है। गंभीर से गंभीर बातें भी वे हास्य विनोद में चुटकियों में सुलझा लेते हैं। फिर भी मानव बन तो शीशे जैसा नाजुक है जब तक ठीक है बेहद सुंदर एवं लुभावना, जिस दिन टूटा ना कोई दवा काम आती है और ना ही दुआ। जो रिश्ता विपुल का इस घर से है वही अखिलेश का फिर यह अंतर क्यों ? क्या विदेश प्रवास से ही कोई अति महत्वपूर्ण हो जाता है ? काश विपुल यहाँ न आयें, मन में बेहद तनाव एवं पुथल मची हुई थी... सोचते-सोचते सिर दर्द करने लगा देर रात तक वह करवटें बदलती रही।


सुबह-सुबह ममा चाय का कप लेकर आई और बोलीं, "बेटा खस्ता कचौड़ी की पीठी बना ली है। चल बनवा दे फिर सब आ जायेंगे, तो समय ही नहीं मिल पाएगा।"

करीब दस बजे गाड़ी का हॉर्न सुनाई पड़ा। सब बाहर भागे। अर्चना अपनी ससुराल बनारस से कार द्वारा रायबरेली आई है। जींस टॉप में वह एकदम मॉडल लग रही है। वह है भी सुंदर किंतु विदेश प्रवास ने उसके सौंदर्य एवं आत्मविश्वास को भी दुगणित कर दिया है। और भी निखार आ गया है उसके व्यक्तित्व में। 


उसके पीछे-पीछे अखिलेश उतरे, अपने पुत्र विनी को गोद में लिए। जो अचानक इतने लोगों को देखकर उनकी गोद में मुँह छुपाने का असफल प्रयास कर रहा था। वहीं छोटा भाई अनिल सामान उतारने लगा।

"इतनी गर्मी ...पता नहीं कैसे सह लेते हैं आप लोग ? " अर्चना कार से उतरती हुई बोली।

"क्यों तुम भी तो यही पली-बढ़ी हो, फिर छह वर्षों में ऐसा क्या हो गया कि गर्मी सहन नहीं कर पा रही हो ?" वंदना ने संतुलित आवाज़ में कहा। पता नहीं अर्चना का कथन उसे नागवार लगा था।


"तुम क्या जानो दीदी, वहाँ कैसा मौसम है, क्या नज़ारे हैं, क्या साफ-सफाई है ...मन खिला-खिला रहता है और यहां वही गंदी सड़कें वहीं गंदगी अच्छा भला आदमी भी बीमार हो जाए। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है पर यहाँ का वही हाल है। इतने वर्षों में भी कुछ नहीं बदला है।" अर्चना ने इंग्लैंड की प्रशंसा करते हुए कहा।

"हम तो भूल ही गए थे कि हमारी छोटी बहन पूर्ण रूप से विदेशी हो गई है। अब भला भारत जहाँ उसने जन्म लिया, पली-बढ़ी उसे क्यों अच्छा लगेगा !!" उसका भारी-भरकम सूटकेस उठाकर अंदर लाते हुए अनिल ने कहा।


"लो बेटा फ्रूट जूस, लीची का है, विशेष रुप से तुम लोग के लिए ही मंगाया है।" ममा ने शीतल पेय की ट्रे को अखिलेश के सामने रखते हुए कहा।

"लीची का है, तुम लोगों के लिए ही मँगाया है ... मैं समझा नहीं माँ जी।"

"यह रीयल फ्रूट जूस है। अर्चना ने बताया था कि तुम्हें लीची पसंद है। लीची तो सीजनल फ्रूट है, इस समय मिलती नहीं हैं अतः जूस मंगा लिया है।" माँ ने कहा।

"क्या इंडिया में प्रोसेस जूस मिलने लगा है ?"अखिलेश ने शीतल पेय के गिलास को पकड़ते हुए कहा।

"हाँ जीजाजी, इंडिया में बिजनेस के इतने अच्छे प्रोस्पेक्टस हैं कि विदेशी कंपनियां अपने पैर जमाना चाह रही हैं। अच्छा मज़ाक है भारतीय अपनी पहचान के लिए विदेश भाग रहे हैं और विदेशी पैसा कमाने के लिए भारत आ रहे हैं।" कहते हुए वह हँस पड़ा।


"यह क्या भइया, हँसना भी एक कला है। यह क्या फूहड़ों की तरह हँस रहे हो ?" अर्चना ने आदत अनुसार उसकी बेवजह की हँसी पर अंकुश लगाते हुए कहा। वस्तुतः उसे अनिल का अखिलेश की बात काटना अच्छा नहीं लगा था।

"तुम्हारे देश में हँसने पर राशनिंग होती होगी किंतु हमारे देश में सब कुछ फ्री है।"अनिल ने जो स्वयं मम्मा -पापा को आवश्यकता से अधिक तैयारी करते देखकर पहले से ही क्षुब्ध था, ने उत्तर दिया। 


अर्चना के शब्दों ने आग में घी का काम किया था। न चाहते हुए भी अनचाहे शब्द उसके मुँह से उफनती नदी की तरह बांध तोड़कर बह निकले थे।

"इतना बड़ा हो गया है लेकिन बचपना नहीं गया। पहले की तरह ही झगड़ना प्रारंभ कर दिया। माँ ने डपटते हुए कहा।

फिर अखिलेश एवं अर्चना की ओर देखकर बोलीं,"जाओ बेटा, हाथ मुँह धोकर फ्रेश हो लो। गरम पानी बाथरूम में रखवा दिया है फिर आराम से बैठ कर बातें करना। तब तक मैं नाश्ते का इंतज़ाम करती हूँ और हाँ अर्चना विनय के लिए गाय का दूध मंगा दिया है। जब उसका समय हो तब दे देना।"


"माँ गाय का दूध वहाँ के डॉक्टर ने देने के लिए मना किया है क्योंकि वह कीटाणु रहित नहीं होता अतः यदि पाश्चराइज दूध मिल जाए तो मँगवा देना। वैसे शाम तक के लिए दूध में बनारस से ही लेकर आई हूँ।"

"ठीक है मंगा दूँगी।" माँ किचन में जाते हुए बोली।


खाना खाते खाते शाम हो गई। अभी बाहर बैठकर बात कर ही रहे थे कि विपुल को नवीन एवं निधि के साथ आते देख आश्चर्य हुआ। वह तो बाद में आने वाले थे... पूछने से पता चला की स्कूल की नवनिर्मित इमारत के ढह जाने से छह बच्चों की मृत्यु हो गई है। पेरेंट्स के विरोध करने पर स्कूल को अनिश्चितकाल के लिए बंद करना पड़ा। जब तक पूरी जांच नहीं हो जाती, तब तक कोई भी अपने बच्चे को स्कूल भेजने के लिए तैयार नहीं हो रहा है।


"इस तरह तो बच्चों का साल भी बर्बाद हो जाएगा।" वंदना के मुँह से अनायास निकल गया।

"तुझे साल की पड़ी है पर जिनके बच्चे इस हादसे में अनहोनी का शिकार हो गए या मर गए ,उनकी तो दुनिया ही उजड़ गई होगी। एक पुत्र एवं एक पुत्री के सीमित परिवार में किसी एक का भी इस तरह अचानक चले जाना भीषण त्रासदी नहीं तो और क्या है !!" माँ ने वंदना की बात काटते हुए संवेदना प्रकट की।

"पता नहीं लोग थोड़े से पैसों के लालच में क्यों किसी के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। सीमेंट की जगह बालू ज्यादा मात्रा में बुलाएंगे तो इमारत गिरेगी नहीं तो और क्या होगा ! पुराने जमाने के भव्य महल आज भी देख जाएंगे किंतु चार वर्ष पुरानी इमारत जरा से आंधी तूफान से ढह जाती है।" पिताजी गहरी श्वास लेकर बोले।


"इसी वजह से तो भारत की प्रतिभाएं विदेश भाग रही हैं क्योंकि यहाँ उनकी योग्यता, उनके परिश्रम की कोई कद्र नहीं है। यहाँ तक कि उनकी जान-माल भी सुरक्षित नहीं है।" अर्चना जो सबकी बातें सुन रही थी,ने कहा।

"यह ठीक है यहाँ योग्यता एवं परिश्रम की कद्र नहीं है और शायद पैसा भी उतना नहीं मिलता जितना कि विदेशों में लेकिन क्या थोड़े से पैसों के लालच में विदेश जाना उचित है ? क्या हम यहाँ रहकर यहाँ की व्यवस्था को चुनौती देते नहीं दे सकते ? यहाँ के ब्रैन की विदेशों में कद्र इसलिए है क्योंकि वहाँ अधिकांश व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते और जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं वह उस कार्य को उतने कम पैसों में करने के लिए तैयार नहीं होते जितने की एशियाई मूल के व्यक्ति।" अनिल आक्रोश में बोल उठा।


"विकेंद्रीकरण के इस युग में आज व्यक्ति देश की परिधि के भीतर बंधकर नहीं रह सकता। अच्छी अपॉर्चुनिटी प्राप्त होने पर भी सिर्फ देश भक्ति के नाम पर बंधकर रहना मेरी निगाह में बेवकूफी ही कहलाएगी ...यदि ऐसा हो तो कोई देश या समाज तरक्की ही न कर पाए। पापा भी अच्छी सुविधाओं के लिए ही गाँव छोड़कर शहर आए थे। यदि वह भी तुम्हारी तरह सोचते तो तुम आज इंजीनियर नहीं हाथ में फावड़ा लेकर खेती कर रहे होते।" अर्चना ने कहा।


" खेती करना कोई निकृष्ट काम तो नहीं है। कृषि और किसान तो देश की रीढ़ हैं। उनकी मेहनत के कारण ही हमें दो वक्त की रोटी मिल रही है।" अनिल ने उत्तर दिया। 

"अच्छा अब विषय परिवर्तित करो। प्रत्येक देश में कुछ अच्छाइयां होती हैं और कुछ बुराइयाँ, अच्छा होगा यदि हम व्यर्थ बहस करने के बजाय प्रत्येक देश की अच्छाइयों को ग्रहण कर समन्वय का प्रयास करें।" अर्चना और अनिल की नोंक- झोंक के कारण बातों में बेवजह आती कटुता को दृष्टिगत कर विपुल ने बात का रुख बदलने की चेष्टा करते हुए कहा। फिर अखिलेश की ओर उन्मुख होकर बोले , "और सुनाइए ,कई वर्ष बाद आए हैं कैसा लग रहा है हमारा भारत ?"


"इन छह वर्षों में काफी परिवर्तन आया है .. लेकिन सच पूछिए तो यहाँ की मिट्टी का सौंधापन कहीं नहीं मिला। इंसान के रग-रग में व्याप्त प्रेम और स्नेह के अटूट बंधनों की मिसाल दुनिया के अन्य किसी देश में देखने को नहीं मिलेगी। यहाँ आकर लौटने की इच्छा तो नहीं करती किंतु कॉन्ट्रैक्ट तो पूरा करना ही होगा। " शून्य में देखते हुए अखिलेश ने उत्तर दिया।

विपुल ने अपनी जिंदादिली से बोझिल वातावरण में जान डाल दी थी अतः शीघ्र ही दोनों बातों में मशगूल हो गए। कुछ यहाँ की और कुछ वहाँ की। अखिलेश इंग्लैंड के पर्यटन स्थलों, व्यावसायिक केंद्रों एवं कार्य पद्धति के बारे में जानकारी दे रहे थे। पापा वहीं बैठे बैठे दोनों की बातों का आनंद ले रहे थे। बीच-बीच में चाय नाश्ते की व्यवस्था ममा ने ले रखी थी। आवश्यकता पड़ती तो वह उसे आवाज़ दे देतीं। अर्चना तो विशिष्ट अतिथि थी।


सुबह से ही एक बात पर बार-बार ध्यान जा रहा था कि अर्चना बात -बात में स्वदेशी वस्तुओं की तुलना विदेशी वस्तुओं से कर रही थी तथा स्वदेशी वस्तुओं की आलोचना किए जा रही थी। वह घर के सभी सदस्यों के लिए कुछ ना कुछ उपहार लेकर आई थी। पिताजी के लिए ओवरकोट, उसके लिए उसके एवं माँ के लिए साड़ी एवं सॉफ्ट लेदर के पर्स,व विपुल एवं अनिल के लिए जींस शर्ट तथा नवीन के लिए फर वाला कोट एवं एक रिमोट कंट्रोल से चलने वाले कार, निधि के लिए फ्रॉक, नाइटी तथा फर वाला पर्स इत्यादि। अपनी लाई चीजों की प्रशंसा करते हुए वह फूली नहीं समा रही थी।


"देखो ममा, यह साड़ी कितनी मुलायम है, व चाहो तो एक अंगूठी से पूरी साड़ी निकाल लो। फ़्रेन्च शिफॉन है। यह कोर्ट कितना हल्का एवं नर्म, पहन लो तो पता ही न चले। वहाँ की प्रत्येक वस्तु अपने आप में अनोखी एवं अद्भुत है।"

"तुम भी दीदी, व्यर्थ ही भारत में पैदा हुई यदि वहीं जन्म लेतीं तो तुम भी वहाँ की वस्तुओं की भांति अद्भुत एवं अनोखी होतीं।" अनिल ने एक बार फिर व्यंग्यात्मक स्वर में कहा।

"हाँ, इसीलिए तो हमने विनी को इंग्लैंड में जन्म लेने दिया। वहाँ पैदा हुए बच्चों की बात ही दूसरी होती है।" विदेशी संस्कृति की भ्रमित अर्चना,अनिल के व्यंग्यात्मक लहजे को समझते हुए बोली।


"दीदी, कहीं ऐसा न हो कि यही विनय बड़ा होकर यह न कहने लगे कि ममा, मैं अंग्रेज हूँ, मेरे माता-पिता भारतीय हो ही नहीं सकते।" एक बार फिर अनिल ने भोला से मुंह बनाकर अर्चना को चिढ़ाते हुए कहा।

"अनिल , तुझे हो क्या गया है बेटा,अपनी बहन से ऐसे बातें की जाती हैं !! " उसके व्यवहार से परेशान ममा ने एक बार फिर उसे डांटते हुए कहा।

"ममा, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि जिस देश में हम पैदा हुए, जिस देश का अन्न जल खा पीकर बड़े हुए, जिस देश की माटी की सुगंध में जीवन के पच्चीस वर्ष व्यतीत किए, वहीं बेगाना हो गया और मात्र कुछ वर्ष जिस देश में अजनबियों की तरह रहे, वही अपना हो गया। पराए देश की समस्त वस्तुएँ अब अच्छी हैं और निज देश की  सब स्तरहीन, ऐसा क्यों ममा ?"आवेश से थर्रा उठा था अनिल। 


"दो दिन के लिए बहन आई है। उससे भी झगड़ा... न जाने कब बुद्धि आएगी।" अनिल के मानसिक अंतर्द्वंद से बेखबर बड़बड़ाती हुई ममा रसोई में चली गई। 

उनके लिए तो बेटी दामाद का विदेश प्रवास सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि का द्योतक़ था। बेसिर पैर की बेचते बातों को सोचने समझने का उनके पास समय ही नहीं था।

"मौसी , यह कार चल ही नहीं रही है। देखिए क्या हो गया इसमें !!" तभी नवीन अपनी रिमोट कंट्रोल की कार लेकर आया और बोला।

अर्चना ने उसे अलट पलट कर देखा लेकिन उससे कुछ समझ में नहीं आया तो उसने कहा , "जाओ अपने मौसा जी को दिखा दो शायद समान के बीच में दब कर कुछ खराब तो नहीं हो गया। 

अभी वह वाक्य भी पूरा नहीं कर पाई थी कि निधि जो नवीन के पीछे खड़ी थी बोली , "मौसी यह दोनों पर्स एक जैसे ही नहीं लग रहे हैं। बताइए आप कौन सा लाई हैं ?"


अर्चना निधि की बात सुनकर चौक गई। दोनों पर्स को हाथ में पकड़ कर देखने लगी। एक ही डिजाइन, व एक ही रंग के दो पर्स ... वह तो एक ही पर्स लाई थी फिर यह दूसरा कहाँ से आया ? 

वंदना भी एक ही प्रकार के दो पर्स देखकर चकित थी। तभी निधि ने समस्या का समाधान करते हुए कहा, "माँ, आप भी भूल गई ...पिछले वर्ष जब हम शिमला घूमने गए थे तो आपने यह वाला पर्स दिलवाया था।"


निधि की बात पर वंदना को भी याद आ गया। उस पर्स को शोकेस में लटका देखकर निधि ज़िद कर बैठी थी और विपुल जो पर्यटन पर निकलने से पहले ही ताकीद कर देते हैं कि हम घूमने जा रहे हैं ना कि शॉपिंग करने, ने अपनी प्यारी पुत्री की ज़िद पूरी कर दी थी। इसके साथ ही नवीन को लेदर की जैकेट भी खरीदवा दी थी। वह तो कब की भूल चुकी थी किंतु निधि विशेष अवसरों पर उस पर्स को सदैव साथ लेकर चलती है।


"लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है ? यह पर्स तो मैंने लंदन से खरीदा है।" अर्चना ने अविश्वसनीय मुद्रा में उन्हें देखते हुए कहा।

अचानक वह पर्स को उल्टा कर देखने लगी। उस पर "मेड इन इंडिया " लिखा देखकर उसने चैन की सांस लेते हुए कहा, " यह तुमने शिमला से खरीदा है। आजकल नकल भी इतनी अच्छी तरह से होने लगी है कि असली चीज भी पहचान में नहीं आती है।"


तब तक निधि ने दूसरा पर्स भी पलट डाला तथा बोली , "मौसी, "मेड इन इंडिया" तो इस पर्स में भी लिखा है।"

दोनों पर्स पर " मेड इन इंडिया " का टैग देखकर अर्चना किंकर्तव्यविमूढ़ ठगी सी बैठी रह गई। धीमे स्वर में एक बार पुनः बोली , "मैं सच कह रही हूँ यह पर्स मैंने लंदन के एक प्रसिद्ध डिपार्टमेंटल स्टोर से खरीदा है।" 


"आपने अगर यह पर्स लंदन से खरीदा है तो इसमे " मेड इन इंडिया " कैसे लिखा है ? आप झूठ बोल रही हैं मौसी।" निधि ने अपने शब्दों पर जो डालते हुए कहा।

"नहीं बेटा, मैं सच कह रही हूँ।" 

"देखा दीदी, ऑल दैट ग्लिटर्स इज नॉट गोल्ड ...जिन्हें तुम अच्छा समझती हो , देखती हो, वह सब कुछ सुंदर नहीं है। तभी तो तुम वहाँ भी धोखा खा गई। भारतीय वस्तुओं की विदेशी भी कद्र करते हैं। वे अपने बाजार को उत्कृष्ट वस्तुओं से भरने की चेष्टा करते हैं चाहे वह कहीं भी निर्मित क्यों न हुई हो किंतु हम भारतीय अपने देश में निर्मित वस्तुओं की भी कद्र नहीं कर पाते। ऐसा क्यों दीदी ? विदेशी अपनी झूठन भी पत्तल में परोस कर दे दें तो हम अमृत समझकर ग्रहण कर लेंगे और निज देश का अमृत भी जहर समझ कर फेंक देंगे। हमारा आत्मसम्मान, आत्मगौरव जो हमारी ऐतिहासिक धरोहर था, आज ना जाने कहाँ विलुप्त हो गया है। देश प्रेम की पावन भावना क्यों हमारे दिलों से विलुप्त होती जा रही है ? क्यों हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूलते जा रहे हैं ? " अनिल जो पीछे खड़ा इस ड्रामे का दर्शक था, ने दर्द भरे स्वर में कहा।


"तू ठीक कह रहा है मेरे भाई मैं ही मायावी देश की चकाचौंध से भ्रमित हो गई थी। आज तूने मेरे नेत्र पर पड़ी यवनिका को हटा दिया है। तेरी जीवन भर आभारी रहूँगी।" अश्रुपूरित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए अर्चना ने कहा।

"मुझे क्षमा कर दो दीदी, मेरा आशय तुम्हारा दिल दुखाने का नहीं था लेकिन निज देश की अवमानना  मैं सहन नहीं कर पा रहा था।" अनिल ने अर्चना का हाथ अपने हाथ में लेते हुए क्षमा याचना करते हुए कहा।


" वस्तुतः दोष ना तुम्हारा है अर्चना और नहीं अनिल का ...दोष है हमारी सोच का, हमारी मानसिकता तथा हमारी विचारधारा का जिसके कारण हम पूर्व और परिश्रम की तुलना करने लगते हैं। दोनों देशों की अलग संस्कृति , अलग मूल्य हैं। उनमें कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराइयाँ हैं। आज आवश्यकता है एक दिव्य दृष्टि की जो अच्छे बुरे में पहचान कर सके ...इस संतुलन से जिस नई सोच ,नई धारा का निर्माण होगा उससे पूरी मानवता का भला होगा।" वंदना ने उनकी बात सुनकर उन्हें समझाते हुए कहा।

"शायद आप ही कह रही है दीदी।" दोनों एक साथ बोले।


 वंदना सोच रही थी कि व्यर्थ ही पिछले कुछ दिनों से मन के गहरे समुद्र में डूब उतरा रही थी, व्यथित थी, निज अहं, निज अस्तित्व को लेकर... कहीं भी तो कोई उलझन, टकराव नहीं है। सब कुछ पहले जैसा ही सामान्य , उज्जवल एवं निर्मल है। एकाएक से लगा सुदूर गगन से कोई चमकता सितारा अचानक टूट कर उसके आँचल में आ गिरा है जिसके निर्मल प्रकाश से मन की कलुषिता क्षण भर में ही तिरोहित हो गई है तथा चहुँ ओर प्रेम और विश्वास के दीपों ने टिमटिमाकर घर आँगन को ज्योतिर्मय कर दिया है।



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