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Ashish Kumar Trivedi

Drama

1.0  

Ashish Kumar Trivedi

Drama

मासूम मुस्कान

मासूम मुस्कान

3 mins
243


चार साल का अनुज हाथ में छोटी सी पिचकारी लिए हूली है हूली है कहता पूरे आंगन में दौड़ रहा था। वह बहुत खुश था। अपनी समझ में वह पहली होली बना रहा था। पिछली होली तक तो शोर शराबे में डर कर अपनी मम्मी से चिपक जाता था। 

रजनी अपने बेटे को होली खेलते देख फूली नहीं समा रही थी। नन्हा अनुज दूसरों की जगह खुद पर ही रंग डाल रहा था। उसने होली खेलते अनुज को प्यार से अपने सीने में भींच कर पुचकारा। अनुज को यह व्यवधान अच्छा नहीं लगा। वह कुनमुनाया। 

"हूली खेलने दो..."

तभी अंदर से रजनी के पति महेश ने पुकारा। वह अंदर चली गई। 

होली खेलते हुए अनुज घर से बाहर निकल गया। बाहर आकर उसे सामने वाले घर का दरवाजा खुला दिखा। वह पिचकारी लिए हुए घर में दाखिल हो गया। 

यह घर घनश्याम सिंह का था। कई सालों से घनश्याम सिंह और अनुज के पिता महेश तिवारी के बीच दुश्मनी थी। आमने सामने रहते हुए भी कभी एक दूसरे के घर गमी होने पर भी नहीं जाते थे 

अनुज दरवाज़े से घुसा तो घर का आंगन मिला। आंगन में घनश्याम सिंह बैठे थे। अनुज अपनी पिचकारी लेकर उनके पास गया और रंग डाल कर खुशी से चिल्लाने लगा,

"हूली है...हूली है..."

घनश्याम सिंह को कुछ क्षण लगे उसे पहचानने में। 

"ये तो उस महेश का लड़का है।"

उनकी पत्नी संतोषी ने कहा,

"हाँ लगता है खुला दरवाजा पाकर घर से निकल गया।"

"ठीक है पर इसे बाहर करो..."

अपने पति का हर हुक्म मानने वाली संतोषी उनका यह हुक्म नहीं मानना चाहती थी।‌ उसके बच्चे बाहर थे। एक पोता भी था। उसे देखने को वह तरसती थी। 

अनुज उसे देखकर ‌मुस्कुरा रहा था। उसकी मुस्कान उसका दिल चुरा रही थी।

"क्या हो गया ? काठ मार गया क्या ?"

"बाहर निकाल कर कहाँ खड़ा कर दूँ। कहीं इधर उधर चला गया तो।"

"चला जाए कहीं भी तुम्हें क्या ? इसकी माँ को खयाल नहीं इसका।"

तभी घनश्याम सिंह के खास दोस्त आ गए। वह उनके साथ बैठक में चले गए। 

संतोषी ने अनुज का हाथ पकड़ा और अपने साथ रसोई में ले गई। 

महेश के पड़ोस में रहने वाली दस साल की सरला हांफती हुई घर में दाखिल हुई। उसने रजनी को बताया कि छज्जे पर खड़े हुए उसने देखा कि अनुज सामने वाले घर में घुस गया है। उसकी बात सुनते ही महेश और रजनी परेशान हो गए। महेश रजनी पर गुस्सा करते हुए बोला,

"दरवाज़ा क्यों खुला छोड़ा था। वह बाहर निकल गया। अब पता नहीं वो लोग क्या करेंगे। चलो हम अनुज को लेने चलते हैं।"

इधर अपने दोस्त को विदा करके घनश्याम सिंह भीतर गए तो संतोषी अनुज को गोद में बिठा कर मिठाई खिला रही थी। उन्हें देखकर बोली,

"अब गली में कहाँ छोड़ देती ? अभी जमुना के साथ घर भिजवा दूँगी।"

"मुझे भी बच्चे से दुश्मनी नहीं है। पर इसके माँ बाप ने इल्ज़ाम लगा दिया कि हमने इसे अगवा किया है तो ?"

संतोषी इस बात पर विचार कर रही थी कि तभी दरवाज़े की कुंडी ज़ोर से खटखटाने की आवाज आई। घनश्याम सिंह बाहर आए तो महेश और रजनी खड़े थे। महेश ने तैश में कहा,

"कहाँ है अनुज ?"

घनश्याम सिंह के बोलने से पहले ही अनुज बाहर आ गया। उसके एक हाथ में पिचकारी थी और दूसरे में गुझिया। रजनी के पास जाकर बोला,

"आंटी ने मीठी मीठी खाने को दी...."

रजनी ने संतोषी की तरफ देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता थी। संतोषी ने भी बिन बोले आँखों से कह दिया कि वह भी माँ है।

दोनों मर्द एक दूसरे से कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे।

पर बरसों से जमी बर्फ हल्की सी पिघली थी। 


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