लुप्त होते पक्षी (लघुकथा)
लुप्त होते पक्षी (लघुकथा)
हम सभी घर बैठे बात कर रहे थे कि आजकल कहीं भी कोई पक्षी दिखाई नहीं देता।
मेरी सासु मॉं कुर्सी पर बैठी बोल पड़ी, हम पहले ऑंगन में चावल बीनती थी, सूप से फटका कर भूसा बाहर फेंकती थी तो बहुत सारी गौरैयाऍं और सारिकाऍं नजदीक आकर दाना चुगती थी,वे कभी डरती भी नहीं थी। गर्मियों में हम मिट्टी के बड़े खुले बर्तन में पानी भी रखतें थे जहॉं पक्षी पानी भी पीते और खूब पंख फड़फड़ा कर नहाते भी थे।
क्यों कि पहले टीन या स्लेट की छतों वाले कच्चे या पक्के मकान होते थे तो उन छतों पर गौरैया सारिका और सबसे छोटी प्रजाति के चमगादड़ (चामचिड़े) अपना घोंसला बना कर रहते थे,क्यों कि वे सब मानव जाति के संग स्वयं को सुरक्षित समझते थे।
जब से लेंटर वाले पक्के मकान बने हैं तभी से इन पक्षियों का आसरा भी जाता रहा। इसलिए यह खेतों और जंगलों में घोंसले बनाने लगे।
गॉंव में यदि कोई पशु मर जाता था तो मोची लोग उसे दूर ले जा कर उसका चमड़ा निकाल कर ले जाते थे।
बाकी बचे मॉंस को चील , गिद्ध ,कौवे और आवारा कुत्ते खा जाते थे। इसी तरह पक्षियों के दर्शन भी हो जाते थे और पर्यावरण की सफाई भी हो जाती थी। तभी पास बैठी सुरभि बोल पड़ी, दादी! मैंने तो कभी चील गिद्ध नहीं देखे ,हॉं कौए कभी-कभी कॉंव-कॉंव करते दिखाई पड़ जाते हैं । दादी- हॉं सुरभि कौए तो सर्वाहारी होतें हैं यह मॉंस,फल, रोटी खा लेते हैं परन्तु चील , गिद्ध मॉंसाहारी बड़े पक्षी होतें हैं यह केवल मॉंस ही खातें है ।
आज लोग बहुत ही कम संख्या में पशु पालतें हैं और पशु मर जाने पर धरती में दवा देतें हैं जिस कारण मॉंसाहारी पक्षियों को मॉंस नहीं मिलता। इतने में बाहर से कुछ पक्षियों के चहचहाने की आवाज आई। सुरभि भाग कर बाहर निकल कर दौड़ कर अंदर आती है और सब को बताती है कि किसी ने सूखे खेत में आग लगा दी है और झाड़ियों के ऊपर पक्षी उड़-उड़ कर शौर मचा रहे हैं। सभी लोग बाहर आकर देखने लगे ।
आग पूरे जोश से फैल रही है ,आग बुझाने का कोई कारण नहीं था क्यों कि खेत का मालिक सूखी घास झाड़ियों को जला कर उसे जोतने के लिए तैयार कर रहा था। शाम ढलने पर आग बुझ गई। हमने देखा कि बहुत सारे पक्षियों के घोंसले जल चुके थे , उनमें दिए अण्डे भी जल चुके थे। सभी पक्षी पास के पेड़ पर उदास बैठे जले खेत को निहार रहे थे।
सुरभि - दादी यह पक्षी रो रहे हैं न?
दादी-हॉं बेटी इनकी संतानें इन्हीं के सामने जल रही थीं परन्तु यह बेचारे कुछ नहीं कर सके।
सुरभि- तो दादी यह तो चींचीं चिल्लाकर खूब शोर कर रहे थे, तो आग लगाने वाले को समझना चाहिए था न।
दादी- बेटी उसे अपने स्वार्थ के बिना कुछ नहीं दिख रहा था और न समझ आ रहा था। कोई खेतों में आग लगातें हैं तो जंगलों में । जीव -जन्तु जाए तो जाए कहॉं?
सुरभि- हॉं अब समझ में आया कि पक्षी जगत क्यों खत्म होता जा रहा है।
मानव इतना स्वार्थी और निर्दयी हो सकता है?
दादी- नहीं सुरभि! ऐसे सब नहीं होते।
ललिता कश्यप जिला बिलासपुर हिमाचल प्रदेश
