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Abhilasha Deshpande

Drama Inspirational Children

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Abhilasha Deshpande

Drama Inspirational Children

बापू की साइकिल*

बापू की साइकिल*

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 गाँव, बापू और एक सपना* *Title: -- मेरे बापू के पास एक पुरानी साइकिल थी। काली रंग की, जिसमें आगे एक छोटी टोकरी लगी थी। जब मैं छोटी थी, बापू उसी साइकिल पर मुझे स्कूल छोड़ने जाते थे। मैं आगे टोकरी में नहीं, बल्कि पीछे कैरियर पर बैठती थी, और बापू के कुर्ते को कसकर पकड़ लेती थी। पूरा गाँव हमें देखता था। लोग कहते, "देशपांडे की बेटी फिर अपने बापू के साथ निकली।" बापू किसान थे। ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, पर उनका एक सपना था - "मेरी बेटी शहर में पढ़ेगी, बड़ी अफसर बनेगी।" गाँव के लोग हँसते थे। कहते, "लड़की को इतना पढ़ाकर क्या करेगा? शादी कर दे।" पर बापू किसी की नहीं सुनते थे। मैंने दसवीं पास की। पूरे गाँव में पहली लड़की थी जिसने दसवीं पास की थी। बापू ने उसी पुरानी साइकिल पर पूरे गाँव में मिठाई बाँटी थी। उनकी आँखों में आँसू थे। फिर ग्यारहवीं के लिए मुझे शहर जाना था। शहर यहाँ से 20 किलोमीटर दूर था। रोज आना-जाना मुश्किल था। बापू ने कहा, "तू शहर में हॉस्टल में रहेगी।" माँ ने कहा, "पैसे कहाँ से आएंगे?" उसी रात मैंने देखा, बापू अपनी साइकिल को साफ कर रहे थे। बहुत देर तक उसे देखते रहे। अगले दिन बापू बाजार गए और साइकिल बेच आए। मुझे जब पता चला तो मैं बहुत रोई। बोली, "बापू, आपने अपनी साइकिल क्यों बेची?" बापू ने हँसकर कहा, "अरे पगली, साइकिल से ज्यादा कीमती तेरा सपना है। साइकिल फिर आ जाएगी, पर तेरी पढ़ाई का समय फिर नहीं आएगा।" उस पैसे से मेरी हॉस्टल की फीस भरी गई। मैं शहर गई। खूब मन लगाकर पढ़ा। क्योंकि मुझे पता था, मेरी हर किताब के पीछे बापू की साइकिल की आवाज है। साल बीत गए। मैं कॉलेज पास हुई, फिर स्पर्धा परीक्षा की तैयारी की। दो बार फेल हुई। तीसरी बार में पास हुई। जिस दिन मेरा रिजल्ट आया, मैं सीधे गाँव भागी। हाथ में नियुक्ति पत्र था। घर पहुँची तो देखा, बापू खेत से आ रहे थे, पैदल। धूप में। मैंने दौड़कर उनके पैर पकड़ लिए। बोली, "बापू, मैं अफसर बन गई।" बापू कुछ नहीं बोले, बस रोते रहे। अगले हफ्ते मैं पहली तनख्वाह लाई। पूरे पैसे से मैं बाजार गई। वहाँ एक नई साइकिल खरीदी। वही काली रंग की, आगे टोकरी वाली। और उसे लेकर बापू के सामने खड़ी हो गई। बापू ने साइकिल देखी, फिर मुझे देखा। बोले, "ये क्यों लाई?" मैंने कहा, "बापू, आपकी साइकिल बेचकर आपने मेरा सपना पूरा किया था। अब मेरी पहली कमाई से मैं आपका सपना वापस लाई हूँ।" बापू ने साइकिल को छुआ, जैसे कोई पुराने दोस्त से मिल रहा हो। उस शाम बापू ने मुझे फिर से अपनी साइकिल पर बिठाया। मैं अब बड़ी हो गई थी, पर फिर भी पीछे बैठ गई और उनका कुर्ता पकड़ लिया। पूरा गाँव हमें देख रहा था। पर इस बार कोई हँस नहीं रहा था। सबकी आँखों में इज्जत थी। पीछे से किसी ने कहा, "देखो, देशपांडे और उसकी अफसर बेटी जा रही है।" और बापू की साइकिल की घंटी पूरे गाँव में बज रही थी - ट्रिन-ट्रिन। *समाप्त।* 


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