रक्षाबंधन - एक धागा, हजार यादें और जन्मों का रिश्त
रक्षाबंधन - एक धागा, हजार यादें और जन्मों का रिश्त
सावन का वो धूप-बारिश वाला दिन था।
अनु दरवाज़े पर खड़ी थी। हाथ में एक छोटी सी राखी। पर सामने भाई नहीं था। दादा मुंबई में, काम की वजह से आ नहीं पाया।
माँ ने कहा, "कूरियर कर दे बेटा।"
अनु मुस्कुराई। बोली, "माँ, राखी तो कूरियर से चली जाएगी, पर वो स्पर्श? हाथ पर राखी बाँधते हुए आँखों में जो पानी आता है, उसे कैसे भेजूँ?"
उसने वीडियो कॉल लगाया।
भाई दिखा। शर्ट का बटन खुला, आँखें थकी हुईं। पर बहन को देखते ही चेहरा खिल उठा।
"भैया, हाथ आगे करो।"
स्क्रीन पर ही उसने हाथ आगे किया। अनु ने हवा में ही राखी बाँध दी। दोनों हँसे, आँखें नम थीं।
भैया बोला, "याद है अनु, बचपन में तू मेरी जेब से 10 रुपये चुराती थी? मैं चिल्लाता था, तू रोती थी... फिर मैं ही तुझे 20 रुपये दे देता था।"
अनु बोली, "और तू मुझे साइकिल सिखाते हुए कहता था - 'रोना मत, मैं हूँ ना'।"
वही तो रक्षाबंधन है ना?
वो धागा नहीं है। वो एक शब्द है - *"मैं हूँ ना।"*
वो 10 रुपये में नहीं, 1000 यादों में है। वो राखी में नहीं, उस भरोसे में है कि दुनिया इधर-उधर हो जाए, पर एक इंसान हमेशा तुम्हारे पीछे खड़ा है।
द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली पर अपनी साड़ी का टुकड़ा बाँधा था। कृष्ण ने जीवन भर उसकी रक्षा की। धागा छोटा था, वचन बहुत बड़ा था।
आज अनु के हाथ की राखी सोने की नहीं थी। 30 रुपये की थी। पर उसमें बचपन की दिवाली का किला था, माँ के हाथ के पूरनपोली की खुशबू थी, और पापा की डांट की मिठास थी।
भैया स्क्रीन से बोला, "अनु, फिक्र मत कर। ये धागा जहाँ भी रहेगी, तुझे संभालेगा।"
अनु ने आँसू पोंछे और कहा,
*"भैया, राखी तेरे हाथ पर नहीं, मेरे मन पर बंधी है। ये कभी नहीं टूटेगी।"
*शब्द मेरे... एहसास तुम्हारे...*
*- अभिलाषा देशपांडे | g5d*
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