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Abhilasha Deshpande

Inspirational

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Abhilasha Deshpande

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हाथ नहीं, हौसला है - शीतल देवी की कहानी जो हर दिल

हाथ नहीं, हौसला है - शीतल देवी की कहानी जो हर दिल

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राष्ट्रीय खेल दिवस। मेजर ध्यानचंद जी की जयंती। आज पूरा देश अपने खिलाड़ियों को सलाम कर रहा है। पर आज मैं आपको एक ऐसी खिलाड़ी की कहानी सुनाने जा रही हूँ, जिसने मेडल ही नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों को जीने की नई उम्मीद दी है। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले का एक छोटा सा गाँव लोईधार। चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़। यहीं एक नन्ही सी बच्ची का जन्म हुआ - शीतल देवी। भगवान की भी अजीब लीला है बाळा। शीतल जन्म से ही फोकोमेलिया नाम की बीमारी से पीड़ित थी, जिसके कारण उसके दोनों हाथ नहीं थे। माँ ने जब पहली बार अपनी बेटी को देखा तो रो पड़ी। पिता किसान थे, घर में पहले से ही गरीबी थी। गाँव वालों ने कहा, "इस बच्ची का क्या होगा? ये तो जीवन भर दूसरों पर बोझ रहेगी।" लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। शीतल बचपन से ही जिद्दी थी। उसने कभी खुद को दूसरों से कम नहीं समझा। स्कूल में वो अपने पैरों से लिखना सीख गई। जो काम दूसरे बच्चे हाथों से करते, शीतल वही काम पैरों से करती। धीरे-धीरे गाँव वाले भी हैरान होने लगे। साल 2019 में शीतल की जिंदगी बदल गई। भारतीय सेना द्वारा किश्तवाड़ में एक यूथ इवेंट लगाया गया। वहाँ कोच अभिलाषा चौधरी और कुलदीप वेदवान ने शीतल को देखा। उन्होंने शीतल में कुछ अलग देखा - उसकी आँखों में एक चमक, कुछ कर दिखाने का जुनून। उन्होंने शीतल को तीरंदाजी के लिए चुना। शुरुआत आसान नहीं थी बाळा। तीरंदाजी एक ऐसा खेल है जिसमें दोनों हाथों की जरूरत होती है - एक हाथ से धनुष पकड़ना, दूसरे से तीर खींचना। पर शीतल के पास तो हाथ ही नहीं थे। कोच ने एक नया तरीका निकाला। शीतल अपने दाहिने पैर से धनुष को पकड़ती, छाती पर एक बेल्ट से सहारा लेती, और अपने कंधे और मुंह की मदद से तीर खींचती। सुनने में जितना मुश्किल लगता है, करने में उससे सौ गुना ज्यादा मुश्किल था। पहले दिन शीतल जमीन पर गिर गई। दूसरे दिन उसके पैरों में छाले पड़ गए। तीसरे दिन उसकी गर्दन में तेज दर्द हुआ। कई बार उसने सोचा कि छोड़ दे। पर माँ का एक वाक्य उसे याद आता - "बेटा, दुनिया तभी तक तेरा मजाक उड़ाएगी जब तक तू खुद हार नहीं मान लेती।" शीतल ने हार नहीं मानी। रोज 7 घंटे अभ्यास। सुबह 5 बजे उठकर दौड़ना, फिर तीरंदाजी, फिर पढ़ाई। और फिर 2023 में चमत्कार हुआ। एशियन पैरा गेम्स में शीतल ने 2 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल जीत लिया। पूरी दुनिया ने देखा - बिना हाथों वाली लड़की ने तीर से इतिहास लिख दिया। 2024 पैरालंपिक, पेरिस। शीतल सिर्फ 17 साल की थी। दुनिया की सबसे बड़ी प्रतियोगिता। शीतल ने मिक्स्ड टीम इवेंट में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर भारत का तिरंगा लहरा दिया। वो पैरालंपिक में मेडल जीतने वाली भारत की सबसे कम उम्र की तीरंदाज बन गई। आज शीतल के पास अर्जुन अवार्ड है, करोड़ों लोगों का प्यार है। बाळा, मेजर ध्यानचंद जी ने कहा था - "गेंद को ऐसे मारो जैसे वो तुम्हारी प्रेमिका हो।" उन्होंने हॉकी में जादू दिखाया। आज शीतल उसी जादू को तीरंदाजी में दिखा रही है। यह कहानी हमें सिखाती है कि शारीरिक कमी कोई कमी नहीं होती। असली कमी तो हमारे हौसले में होती है। अगर शीतल बिना हाथों के तीर चला सकती है, तो हम अपने पूरे शरीर के साथ क्या कुछ नहीं कर सकते? इस राष्ट्रीय खेल दिवस पर आओ, हम शीतल जैसी बेटियों को सलाम करें और एक प्रण लें - कभी भी अपनी कमजोरी को बहाना नहीं बनाएंगे। *जय हिंद! जय खेल!* ---़़़़़ *


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