वो आखिरी राखी
वो आखिरी राखी
मेरा नाम राधा है। मेरे दो भाई हैं - अमन और निखिल। बचपन से हर रक्षाबंधन हमारे घर में त्योहार जैसा होता था। माँ सुबह चार बजे उठ जाती। घर में पकवानों की खुशबू, पापा नया कुर्ता निकालते, और हम तीनों में लड़ाई कि राखी पहले कौन बंधवाएगा। मैं सबसे बड़ी थी, इसलिए जिम्मेदारी भी मेरी ज्यादा थी। जब मैं 12 साल की थी, तब पापा का ट्रांसफर नागपुर हो गया। हम पुणे छोड़कर नागपुर आए। नया घर, नया स्कूल, नए दोस्त। सब नया था, पर रक्षाबंधन वही पुराना रहा। हर साल मैं पुणे से नागपुर आती, भाइयों को राखी बाँधने। फिर मैं बड़ी हो गई। मेरी शादी तय हो गई। शादी मुंबई में। शादी के बाद पहला रक्षाबंधन आया। मैं बहुत खुश थी। मैंने दो सुंदर राखियाँ लीं, मिठाई ली, और नागपुर के लिए ट्रेन पकड़ी। पर उस साल अमन को नौकरी के लिए दिल्ली जाना पड़ा। वो नहीं आ पाया। मैंने पहली बार सिर्फ निखिल को राखी बाँधी। घर में कुछ खाली-खाली सा लगा। माँ ने कहा, "कोई बात नहीं, अगले साल दोनों होंगे।" अगला साल आया। इस बार निखिल को कॉलेज के एग्जाम थे। वो पुणे में ही था। इस बार अमन था, निखिल नहीं था। फिर ऐसा ही होने लगा। कभी एक भाई, कभी दूसरा। दोनों एक साथ कभी नहीं मिले। मैं हर साल राखी भेजती, पर कलाई पर बाँधने का जो सुख था, वो नहीं मिलता था। वीडियो कॉल पर राखी दिखाती, भाई स्क्रीन पर ही हाथ आगे कर देते। मैं हँस देती, पर अंदर से रोना आता। तीन साल पहले की बात है। माँ की तबियत खराब रहने लगी। डॉक्टर ने कहा दिल कमजोर है। रक्षाबंधन से एक हफ्ता पहले मैंने दोनों भाइयों को ग्रुप कॉल किया। मैंने कहा, "इस बार दोनों को आना ही है। प्लीज। माँ के लिए।" अमन ने कहा, "दीदी, बॉस छुट्टी नहीं दे रहा।" निखिल ने कहा, "दीदी, मेरा प्रोजेक्ट है।" मैंने फोन रख दिया और बहुत रोई। मेरे पति ने देखा तो बोले, "राधा, तुम चली जाओ। भाई नहीं आए तो क्या हुआ, तुम तो जा सकती हो।" मैं नागपुर गई। माँ बिस्तर पर थी। उसने मुझे देखा तो उसकी आँखें चमक उठीं। बोली, "तेरे भाई नहीं आए?" मैंने झूठ बोला, "आएंगे माँ, शाम तक आएंगे।" शाम हुई, रात हुई, कोई नहीं आया। माँ ने कुछ नहीं कहा, बस मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई। उस मुस्कुराहट में दर्द था। उसी रात माँ सो गई और फिर कभी नहीं उठी। माँ के जाने के बाद हम तीनों भाई-बहन पहली बार एक साथ मिले। अंतिम संस्कार पर। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। बस एक दूसरे को देख रहे थे। तेरह दिन बाद, मैं माँ की अलमारी साफ कर रही थी। उसमें एक डिब्बा मिला। उसमें तीन राखियाँ थीं। बिल्कुल नई, चमकदार। और एक चिट्ठी। चिट्ठी पर लिखा था - "मेरे बच्चों, अमन, निखिल और राधा। मैं जानती हूँ तुम तीनों अपनी जिंदगी में व्यस्त हो। पर बेटा, नौकरी, पैसा फिर मिल जाएगा, ये दिन नहीं मिलेंगे। मैंने तुम्हारे लिए आखिरी राखियाँ खरीदी हैं। राधा, ये राखी तू अपने दोनों भाइयों को बाँधना। और मेरे दोनों बेटों, अपनी बहन का हाथ कभी मत छोड़ना। वो तुम दोनों से बहुत प्यार करती है, बस कहती नहीं। तुम्हारी माँ" चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने दोनों भाइयों को बुलाया, चिट्ठी दिखाई। हम तीनों उस दिन बहुत रोए। पहली बार कई सालों बाद। उसके बाद से हर रक्षाबंधन, चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, हम तीनों एक साथ होते हैं। उसी घर में, उसी जगह पर जहाँ माँ बैठती थी। क्योंकि अब हमें समझ आ गया है, राखी सिर्फ एक धागा नहीं है। वो माँ का आखिरी वादा है। और उस वादे को हमें जिंदगी भर निभाना है। *समाप्त।
