Yog Raj Sharma

Classics


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लक्ष्मीजी ने बांधी थी राजा बलि को राखी

लक्ष्मीजी ने बांधी थी राजा बलि को राखी

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श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। इसे आमतौर पर भाई-बहनों का पर्व मानते हैं लेकिन, अलग-अलग स्थानों एवं लोक परम्परा के अनुसार अलग-अलग रूप में रक्षाबंधन का पर्व मानते हैं। वैसे इस पर्व का संबंध रक्षा से है। जो भी आपकी रक्षा करने वाला है उसके प्रति आभार दर्शाने के लिए आप उसे रक्षासूत्र बांध सकते हैं।

राखी या रक्षाबंधन भाई और बहन के रिश्ते की पहचान माना जाता है। राखी का धागा बांध बहन अपने भाई से अपनी रक्षा का प्रण लेती है।

 राजा बलि द्वारा यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार जमाने की कोशिश की गई और बलि की तपस्या से घबराकर देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि विष्णुजी ब्राम्हण का रूप धारण करके राजा बलि से भिक्षा अर्चन के लिए जाएं। भगवान विष्णु ने धर्म रक्षा ,जगत कल्याण व देवताओं की सुरक्षा को मध्यनजर रखते हुए भू लोक की तरह ब्राह्मण भेष में निकल पड़े।राजा बलि दानवीर व वचनीय था और आय दिन दान करता था। विष्णु जी वहां पहुंच गए। जहाँ यज्ञ हो रहा था। यज्ञ सम्पन तभी होता जब व किसी को दान करता। ब्राह्मण भेष में विष्णु जी जब उसे वहाँ से गुजरते दिखे तो उसने उन्हें दान देने का प्रण / बचन दिया। शुक्राचार्य के मना करने पर भी राजा बलि ने अपने संकल्प को नहीं छोड़ा और जैसा कि ब्राह्मण ने तीन पग का दान मांगा उसने तीन पग भूमि दान कर दी।

ब्राह्मण भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। बलि ने भक्ति के बल पर विष्णुजी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। इससे लक्ष्मीजी चिंतित हो गईं। नारद के कहने पर लक्ष्मीजी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बनाया और संकल्प में बलि से विष्णुजी को अपने साथ ले आईं। उसी समय से राखी बांधने का क्रम शुरु हुआ जो आज भी अनवरत जारी है।



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