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लाल घेरे

लाल घेरे

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घर के कामों से फारिग होकर कुसुम ने घड़ी की तरफ देखा। अभी रात के 8 ही बजे थे। सूरज के घर आने में समय था। आज ऑफिस में बॉस की फेयरवेल पार्टी थी इसलिए उसने पहले ही बता दिया था कि खाना खाकर देर से ही घर आएगा। बच्चे खाना खा कर पढ़ाई कर रहे थे।

रोज की आदत की तरह कुसुम ने टी वी का रिमोट हाथ मे लिया लेकिन न जाने क्यों आज उसकी इच्छा नहीं हुई टी वी देखने की। तभी उसे याद आया कि बहुत दिनों से अपनी साड़ियों का बक्सा नहीं सम्भाला है। " चलो, आज यही काम कर लूं। सिल्क की साड़ियों की तह बदल कर रख दूंगी।"

कुसुम ने बेडरूम से लगे स्टोर का बल्ब जलाया और बक्से के पास एक स्टूल रखकर बैठ गई। बढ़ती उम्र के साथ घुटनों में भी थोड़ी तकलीफ रहने लगी थी इस कारण अब वह फर्श पर पालथी मारकर नहीं बैठ पाती थी।

बक्से पर ढंके फूलदार कवर को हटाकर उसने एक तरफ रखा और बक्सा खोला। सबसे ऊपर ही जामुनी रंग की सिल्क की साड़ी रखी थी जिसे उसने खुद काढ़ा था। जरी के धागों के क्रोशिया से बने फूलों को सुनहरे सितारों के साथ इस साड़ी पर जगह - जगह टाँक दिया था। यह साड़ी कुसुम के साथ ही साथ सूरज को भी बहुत पसंद थी। कुसुम जब भी इस साड़ी को पहनती ,सूरज हर बार कहता," ऐसा लगता है कि रात की चादर में तारों को पहन कर चाँदनी सामने आ गई हो।"

मुस्कुरा कर कुसुम ने उस साड़ी पर हल्के से हाथ फेरते हुए उसकी रेशमी छुहन को महसूस किया और फिर उसे दूसरी तरफ रख दिया। तभी बक्से के ढक्कन की दराज से उसे कुछ नीला कागज़ सा झांकता दिखा। कुसुम ने हाथ बढ़ाकर उसे बाहर निकाला तो देखा वह एक अंतर्देशीय पत्र था। कुसुम के होठों की मुस्कान गहरी हो गई।" ओह ये मैंने यहां रख दिए थे।" कुसुम ने उस दराज में हाथ डाला तो नीले पत्रों का एक पूरा बंडल ही बाहर निकल आया।

कुसुम ने सबसे पहले हाथ आये पत्र को खोला,

" प्रिय कुसुम,

मधुर स्नेह, आशा है तुम वहां अच्छी होगी। मैं भी यहां अच्छा हूँ। दोनों बच्चियां कैसी हैं? तंग तो नहीं कर रही न! घर मे सब कैसे हैं? अच्छा सुनो, तुम जो पीली शर्ट लाई थीं , आज पहनी मैंने। वैसे तो तुम्हारी पसंद मुझे छोड़कर थर्ड क्लास है लेकिन यह शर्ट भी अच्छी लगी पहन कर। अब तुम मेरे साथ सीखने लगी हो सब।"

 " हुहः, जैसे मैं तो अनाड़ी थी!", कहकर कुसुम ने उस पत्र को पूरा पढ़ा और सावधानी से तह बनाकर रख दिया। एक के बाद एक पत्र कुसुम पढ़ती जा रही थी । कुसुम का चेहरा इस वक्त एक नवयौवना के समान खिला हुआ था । कभी वह लजाती कभी मुस्कुराती कभी गुस्सा होती और कभी माथे पर हाथ रखकर कृत्रिम क्रोध से भृकुटि तान लेती।

" मम्मी, ये क्या पढ़ रही हो।", बड़ी बेटी की आवाज से कुसुम की तन्द्रा भंग हुई। 

" कुछ नहीं", कहती हुई कुसुम अचकचा कर पत्रों के उस बंडल को बंद करके रखने को उद्यत हुई तब तक एक पत्र बेटी के हाथ में आ चुका था।" ये तो पापा की और आपकी चिट्ठियां हैं। आप लोग एक दूसरे को चिट्ठी लिखा करते थे!"

" और नहीं तो क्या, तब फोन थोड़े ही होते थे।"

" वाओ , हाऊ रोमांटिक!", बेटी ने शरारत से कुसुम की आंखों में झांका।

" हाँ बेटी, हम पत्र से ही बातें करते थे जब तुम्हारी मम्मी अपने मायके जाती थीं। पत्र भेजने के बाद जबाब के लिए पोस्टमैन का जितना इंतजार करते थे उतना किसी का भी नहीं। " , सूरज की आवाज सुनकर कुसुम ने चौंककर घड़ी की तरफ देखा ।रात के दस बज गए थे, पत्रों में खोई कुसुम को समय का जरा भी अंदाज नहीं हुआ था। सबकी आवाज सुनकर छोटी बेटी भी आ गई थी। " क्या आपने शुरू से अब तक के सभी पत्र सम्भाल कर रखे हैं? ", पत्रों के बंडल को देखकर उसने सवाल किया।

" अब तो फोन आ गए लेकिन हां शादी के बाद के सभी पत्र सम्भाल कर रखे हैं सिवाय.... सिवाय एक के।", कुसुम यह कहते हुए थोड़ा हकला गई और दूसरे ही पल थोड़े गुस्से से सूरज की तरफ देखने लगी।

" मैं बताता हूँ कि क्या हुआ था।", कहता हुआ सूरज दरवाजे से टिक कर खड़ा हो गया," तुम्हारी मम्मी डबल एम ए, बी एड हैं वह भी संस्कृत और हिंदी से।"

" हाँ, यह तो हमें पता है, पी एच डी भी हैं।", गर्वसे खनकती आवाज में दोनों बेटियों ने कहा।

" हाँ बिल्कुल सही, तो हुआ यह कि शादी के बाद मैंने तुम्हारी मम्मी को पत्र भेजा जब वह पहली विदा पर अपने मायके गई थी।"

"फिर?",बेटियों की जिज्ञासा बढ़ी हुई थी।

" पत्र भेजने के बाद मैं रोज पोस्टमैन का इंतजार करता था। उसे सख्त हिदायत दी थी कि मेरे नाम का पत्र आये तो मेरे ही हाथ में देना, घर में मम्मी- पापा या बहन को नहीं।"

" अच्छा!", कहती हुई दोनों बहनें खिलखिला दिन। उन्हें यह सब सुनने में बहुत मजा आ रहा था। बड़ी बहन ने छोटी को कुहनी से टहोकते हुए मम्मी की तरफ देखने का इशारा किया, कुसुम झेंपती हुई मुस्कान के साथ फर्श को देख रही थी। " फिर क्या हुआ पापा?",छोटी ने सवाल किया।

" पांच- छह दिन बाद पोस्टमैन ने मुझे तुम्हारी मम्मी का पत्र लाकर दिया।मुझे उस वक्त उस पत्र को हाथ में लेते हुए कोहिनूर को थामने जैसा अहसास हो रहा था। बढ़ती हुई धड़कनों को काबू करते हुए मैंने पोस्टमैन को उसका इनाम दिया और अपने कमरे में जाकर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया।"

दोनों बहनों की मुस्कान और भी गहरी हो गई थी।

सूरज ने आगे कहा," वह एक लिफाफा था। मैंने उसे सावधानी से खोला तो देखा उसके अंदर एक अंतर्देशीय पत्र है। उसे लिफाफे से बाहर निकाल कर पढ़ने के लिए खोला तो देखा कि वह मेरा ही लिखा हुआ पत्र था।", यह कहकर सूरज ने कुसुम को घूरते हुए देखा।

कुसुम ने आंखें और नीची कर लीं और चेहरे पर आ रही मुस्कान को छिपाने के लिए अपनी एक हथेली मुँह पर रख ली।

" उस पत्र में तुम्हारी मम्मी ने मेरे लिखे गलत शब्दों पर लाल पेन से घेरे बना रखे थे और नीचे लिखा था इनको पांच- पांच बार सही से लिखकर मुझे लौटती डाक से भेजिये।", यह सुनते ही दोनों बहनों ने आश्चर्य से भरकर कुसुम की तरफ देखा और उसके बाद तो कमरे में जैसे हँसी का विस्फोट हो गया।

हँसी थोड़ी रुकने के बाद दोनों बहनों ने पूछा कि वह पत्र कहाँ है पापा?

"कहाँ है!.... मैंने उसी वक्त उसके टुकड़े- टुकड़े कर दिए थे। मैं विज्ञान का छात्र था। मेरी भावनाएं समझने की जगह मैडम.......!"

" लाल घेरे बना कर भेज रही थीं।", बात पूरी करते हुए दोनों बहनें फिर से हँस पड़ी।" आप गुस्सा तो बहुत हुए होंगे?"

"बहुत, पर मैने बदला लेने के लिए एक तरकीब निकाली और तुम्हारी मम्मी को हमेशा के लिए अपने घेरे में कैद कर लिया।", कहते हुए सूरज कुसुम के पास आकर खड़ा हो गया।

" हटो जी!", कहती हुई कुसुम सुर्ख हो गई।

कुछ समझती कुछ न समझती दोनों बच्चियों ने मुस्कुरा करके दूसरे को देखा और मम्मी- पापा को गुड नाईट कहकर अपने कमरे में आ गईं। आज उनको समझ आ गया था कि मम्मी को लाल रंग प्रिय क्यों है।


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