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Krishna Khatri

Drama

3  

Krishna Khatri

Drama

करवट बदलती ज़िन्दगी

करवट बदलती ज़िन्दगी

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“अरी भागवान, कुछ मीठा तो बना दो, वैसे आज मीठा खाने की बड़ी इच्छा हो रही है मूंग दाल का सीरा बना लो जो तुम बहुत अच्छा बनाती हो लंबे अरसे से तुमने नहीं बनाया, बड़ी आलसी हो गई हो तो आज तुम बना ही दो”


“ क्यों आज कौनसी लोटरी खुल गई है तुम्हारी ?”


“लोटरी नहीं खुली तो क्या हुआ किस्मत तो अपने राम की खुल गई है”


“वो कैसे ?”


“वो ऐसे कि अब तो परमानेंट ही तुम्हारे हाथ के स्वादिष्ट पकवान खाने को मिलेंगे और तुम्हारी बहुरानी के हाथ के भी। क्यों बहुरानी खिलाओगी ना ? क्योकि अब रिटायर हो गया हूं तो अब तुम्हारी सासू मां के भी रिटायरमेंट का टाइम आ ही गया समझो एक दो साल में”


“जी पापाजी” कहते हुए बाहर निकल गई जो आई रात को नौ बजे। यह देखकर मिस्टर खन्ना को कुछ अटपटा लगा पर बोले कुछ नहीं। हां, नाराजगी उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी यह आशाजी ने भली भांति महसूस किया लेकिन चुप रही। यह सिलसिला रोज़ ही चलता, बहू रोमा हर रोज इधर-उधर किटी पार्टियों में व्यस्त रहती और बेचारी आशाजी दिन भर किचन एवं घर के अंदर कामों लगी रहती। थोड़े से आराम की या पति के पास घड़ी दो घड़ी बैठने, बोलने-बतियाने की भी फुर्सत तक नहीं थी। मिस्टर खन्ना अच्छी तरह से देख रहे थे और बखूबी समझ भी रहे थे। कुछ कहने की कोशिश करते तो आशाजी चुप रहने को कहती। साथ ही सफाई भी देती – “देखिए जी, बहू पढ़ी लिखी और शहर में पली बढ़ी है, उसे काम करने की आदत नहीं। पर मुझे तो बचपन से है फिर काम करने से शरीर अच्छा रहता है। मैंने होम साइंस में भी पढ़ा है। मेरी दादी मां भी यही कहती थी समझे जी”


“जी, बिल्कुल समझा जी लेकिन यह तो बहुरानी पर भी लागू होता हैं। फिर शुरू-शुरू में किसी को भी काम करने की आदत नहीं होती और काम भी नहीं आता, सीखना पड़ता है”


“ठीक है जी, आज का जमाना कुछ अधिक ही मोडर्न है। बहू थोड़ा सहेलियों से मिल-मिला लेती है, थोड़ा घूम फिर लेती है, मन लगा रहता है क्या जी आप भी ना कौनसा मैं घिस जाती हूं”


“तुम घिस तो नहीं जाती हो पर तुम्हारी लाडली बहू को कभी काम करते देखा ही नहीं है। क्या उसका काम केवल खाना-पीना, सजना-संवरना, घूमना-फिरना ही है ? कितने सालों बाद हमें साथ रहने को मिला है और तुम दिन भर चकरघिन्नी की बनी काम में लगी रहती हो, मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता भागवान, अब जिन्दगी रही ही कितनी है? अपने बेटे - बहू , पोते - पोतियों के लिए तुमने मेरे साथ रहना ही छोड़ दिया था कि अकेली बहू को परेशानी होगी मगर मैं देख रहा हूं तुम्हारी बहू कभी नहीं सोचती, तुम्हें भी तकलीफ, परेशानी होती होगी ना। फिर तुम्हारी भी तो उम्र हो गई है बहुत कर लिया घर के लिए। हमारी अपनी भी जिन्दगी है इससे तो मैं वहीं भला था। गुप्ता जी तो कह भी रहे थे कि वहीं रह जाऊं और तुम्हें भी यहीं बुला लूं। सारी जिम्मेदारियां तो पूरी हो गई है अब खुद के प्रति भी जिम्मेदारी निभाएं लेकिन”


“नाराज़ क्यों होते हैं उन्हें मेरी जरूरत थी तभी तो इनके साथ रहना पड़ा वरना मुझे भी आपके बिना कहां अच्छा लगता है जी”


“अब तो बच्चे भी बड़े हो गए हैं, स्कूल भी जाने लगे हैं। बहुरानी तो इधर-उधर रोजाना घूमती रहती है तो अब घर काम संभाल सकती है फिर तुम क्यों सारा दिन खटती - रहती हो ? बस अब बस, इस थके-हारे शरीर को आराम भी दिया करो। मैं भी जगा रहता हूं, सोने का तो बहाना करता हूं वरना तुम तो मेरे भी हाथ-पैर दबाने बैठ जाओगी और अपना दर्द जताओगी भी नहीं। देखता हूं रोज़ देर रात गए बाम लेकर कमर, हाथ-पैर और माथे पर लगाती रहती हो। अब तो बस भी करो यार थोड़ा समय इस गरीब के लिए भी निकाल लिया करो। बहुरानी संभाल लेगी घर, ये सब अब बहुरानी की ज़िम्मेदारी है, समझी भागवान ?


“जी, समझ गई जी लेकिन बहू की आदत नहीं है ना फिर एकदम काम छोड़ दूंगी तो बहू को बुरा लगेगा जी”


“यह तुम मुझ पर छोड़ दो, चलो अब सो जाते हैं। दूसरे दिन सुबह नाश्ते के समय सबको डाइनिंग टेबल पर एक साथ आने को कहा। सब लोग एक साथ आकर साथ ही नाश्ता करने लगे। नाश्ता खत्म होने के बाद मिस्टर खन्ना ने कहना शुरू किया “देखो बहुरानी, हमें एक साल से भी अधिक हो गया है आये हुए। जैसा कि हम सब जानते हैं एक निश्चित उम्र पर तो सरकार भी काम से छुट्टी कर देती है और साथ ही भरण-पोषण के लिए हर महीने निश्चित धनराशि भी देती है तो क्यों नहीं घर में माता-पिता और अन्य बुजुर्गों को भी काम से छुट्टी मिलनी चाहिए। चाहिए कि नहीं ? क्यों बहुरानी, मैं सही कह रहा हूं ना ?”


“जी पापाजी”


“तो फिर आज से आशाजी को भी काम-काज से छुट्टी दे दो। आज से घर का सारा काम, खाना वगैरह-वगैरह सब कुछ तुम ही करोगी तभी उसे आराम मिलेगा है ना बहुरानी ?”


“जी, पापाजी”” मरे मन से यह कहते हुए अंदर चली गई। आज से सारा काम रोमा के जिम्मे आ गया। इस तरह दिन गुजरते रहे, रोमा की आजाद जिन्दगी को मानो ग्रहण लग गया था। पहले तो आशाजी लगभग सारा काम निपटा लेती थी इसलिए उसे कुछ खास करना नहीं पड़ता था बस, यूं ही थोड़ा बहुत नाम के लिए कर लेती थी लेकिन अब तो जान गले में अटक रही थी। इन दिनों तो खाना भी समय पर नहीं बनता और ना ही ढंग का बनता था। मिस्टर खन्ना समझते सब थे मगर कहते कुछ नहीं थे। हां राहुल और बच्चे किट किट करते रहते थे - उन्हें खाना बिल्कुल ही पसंद नहीं आता था। बच्चे कहते दादी मां आप बनाओ ना खाना, मम्मा को अच्छा बनाना नहीं आता। राहुल ने भी कहा “क्या बात है मम्मी, पापा ने एक बार क्या कहा - आपने पूरी तरह से हड़ताल ही कर दी। हफ्ते एकाध बार तो अच्छा खाना खिला दिया करो मम्मी। ऐसी बातें सुनकर तो रोमा और भी घायल शेरनी बनती जा रही थी। “बहुत हो गया तुम सबका नाटक दिन भर मर-मर के काम करो फिर ऊपर से इनके नखरे सबको बैठे-बैठे चाहिए” और फिर धीरे धीरे से बड़बड़ाती “जबसे बूढ़ा आया है नाक में दम करके रखा है, बेचारी बुढ़िया काम करती थी तब कितना आराम था लेकिन बूढ़े ने आकर सब गड़बड़ कर दिया। अब मत पूछो बुढ़िया को भी चर्बी चढ़ गई है। पर किया धरा तो सब जब तक नहीं था शांति थी आते ही परेशानी खड़ी कर दी, हे भगवान”

मिस्टर और मिसेज खन्ना तो अक्सर अपने कमरे में रहते, हां, कभी - कभी बाहर दालान में भी बैठते थे। एक दिन इस तरह बड़बड़ाते हुए सुन लिया तो आशाजी ने कहा - बहू , तुम हमारे लिए इस तरह का भाव रखती हो ? अरे, इतने साल तेरे आगे मजदूरी की, तुम्हारे बच्चों को पाला-पोसा, तुम्हारा घर संभाला और खन्नाजी हर महीने अपनी पगार एक मोटा हिस्सा तो यहां भेजते थे वह भी तो तुम लोगों के ही काम आती थी। मैं तो दो टाइम की रोटी ही तुम लोगों से खाती थी कभी सोचा तुमने ? क्यों इस तरह से मैं काम करती थी ? लेकिन तुम यह सब सोच भी कैसे सकती हो जो रिश्तों के मायने भी नहीं समझती ? इस तरह की बातें करती हो ? अरे, मुझे तो खुद पर शर्म आने लगी है। तुमको काम करना पड़ रहा है इसलिए इस तरह की बेहूदा बातें कर रही हो ? अरे हमारे बारे में कभी तो सोचती लेकिन तुम्हें क्या पड़ी है ? आज मुझे समझ में आ रहा है वाकई कोई किसी का नहीं सब मतलब के यार हैं। मैंने अपनी मां को अक्सर कहते सुना है - '' काम वाला है चाम वाला नहीं '' कितना सच है। वाकई काम प्यारा है व्यक्ति नहीं। आज मैं काम नहीं करती हूं, खन्नाजी भी रिटायरमेंट के बाद यहां आ गए तो अब पैसे भी नहीं आते और मैं भी जब तक नौकर की तरह लगी रही तब तक अच्छी थीं। मगर अब हम दोनों की गिनती केवल बूढ़ा-बुढ़िया में रह गई है कुछ पूछने पर बात - बात में यह कहा जाता है - चुपचाप बैठे रहो क्या करना है आप लोगों को ? जब-तब बीच में टपकते रहते हैं, हमारी लाइफ में दख़लअंदाज़ी मत करो, हमें चैन से जी ने दो न खुद काम करते हैं और ना ही किसी नौकर को टिकने देते हैं। इस तरह की बातें करते हो मन को चुभ जाती है, भीतर ही भीतर गड़ने लगती है। लेकिन हमने कब कहा कि नौकर मत रखो, यह तुम ही रोज ही खर्च पूरा न पड़ने का रोना रोते रहते हो तो हमने कहा था काम भी कितना है नौक की क्या जरूरत है ?”


“वो तो ठीक है लेकिन मैं अकेली इतना सारा काम कैसे करती, पापाजी ने तो मम्मीजी आपको भी मना कर दिया”


“तुम्हारी मम्मीजी अकेले कैसे करती थी ?”


 “मैं भी तो करती थी”


 “अच्छा तुम्हें काम करने की फुर्सत थी ?”


 “पापाजी, आप हद से बढ़ रहे हैं”


 “बहू , खबरदार जो अपने पापाजी के लिए कुछ कहा”


 “हां-हां, कुछ कहो मत। बस बिठाकर रखो इनको, इनसे मुफ्त की रोटियां तुड़वाते रहो”


“बस अब एक शब्द नहीं। चलिए जी यह अपना घर नहीं है और ना ही ये हमारे कुछ हैं। चलिए, चलते हैं”


“ठीक है आशाजी, आज ही चलते हैं, तुम अपना सामान बांध लो तब तक मैं टिकट ले आता हूं और हां सिर्फ हमारे कपड़े ही लेना और तुम्हारा अपना व्यक्तिगत सामान जो भी होगा ले लेना”


“जी”


“हाँ-हाँ, जाओ ताकि हम भी चैन से जियें”


“जरूर जियो, हमारा आशीर्वाद है। वैसे जरूरी नहीं है, चाहिए तो रख लेना” कहते हुए खन्नाजी टिकिट लेने चले गए और आशाजी पैकिंग में जुट गई मगर आंखें थीं कि गंगा-यमुना हो रही थी। दिल बेचारा रो रहा था, बिलख रहा था मां का दिल जो था मगर दिमाग कह रहा था – “ऐसी औलाद के लिए मैंने ज़िन्दगी के सुनहरे साल यूं ही खो दिए। काश कि मैं...” फूट-फूट कर रो पड़ी।


 जिन्दगी इस तरह भी करवट बदलेगी किसे था पता ?


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