STORYMIRROR

Jiwan Sameer

Abstract Inspirational Others

5  

Jiwan Sameer

Abstract Inspirational Others

कृष्ण सुदामा

कृष्ण सुदामा

6 mins
1


दीपक की टिमटिमाती लौ में सुदामा का दुर्बल शरीर अपनी ही छाया से बड़ा प्रतीत हो रहा था। बाहर झींगुरों की तीव्र पुकार थी, और भीतर बालकों की भूख से बिलखती सांसें।
सुशीला ने अपनी जीर्ण सारिणी (साड़ी) का अंचल संभालते हुए सुदामा के समीप बैठकर कहा, "नाथ, धर्म की रक्षा करते-करते क्या हम इन बालकों को काल के कपोल में ढकेल देंगे? जिनकी जिह्वा पर निसदिन 'गोविंद' का नाम रहता है, क्या उस गोविंद को अपने सखा की यह दुर्दशा नहीं दिखती?"
सुदामा ने अपने नेत्र बंद कर लिए। उनके मन के भीतर एक भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था। उन्होंने अत्यंत शांत किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया:
"सुशीले! दरिद्रता देह का कष्ट हो सकती है, आत्मा का नहीं। जो बिना मांगे सांसें देता है, वह अन्न भी देगा। द्वारकाधीश अब केवल मेरे सखा 'कान्हा' नहीं, संपूर्ण आर्यावर्त के अधिपति हैं। एक याचक बनकर उनके स्वर्ण-द्वार पर जाना, सांदीपनि आश्रम के उस पावन गुरु-कुल के ज्ञान का अपमान होगा।"
"मैं याचना का भाव लेकर जाने को कब कहती हूँ, स्वामी?" सुशीला ने एक जीर्ण वस्त्र से बंधी पोटली आगे बढ़ाई, "यह चार मुट्ठी तंदुल (पोहे) हैं, जो नगर की तीन गलियों से मांगकर एकत्र किए हैं। इसे प्रभु के चरणों में अर्पण कर दीजिएगा। सखा से भेंट करने हेतु खाली हाथ जाना भी तो शास्त्र-विरुद्ध है।"
सुदामा ने पोटली को छुआ। उसमें अन्न से अधिक अपनी अर्धांगिनी के अश्रु और विवशता का भार था। उन्होंने कांपते हाथों से उसे अपनी कांख में दबा लिया और भोर की पहली किरण के साथ प्रस्थान किया।

उसी भोर, जब द्वारका के मणिकंठित प्रांगण में धूप बिखरी, तो जगदाधार श्रीकृष्ण अपने रत्नजड़ित झरोखे में खड़े थे। महारानी रुक्मिणी ने प्रभु के कनक-कलश में चंदन का लेप लाते हुए देखा कि उनके प्रियतम की दृष्टि पोरबंदर की ओर उठी हुई है और कपोलों पर जल की एक बूंद ढुलक आई है।
"नाथ!" रुक्मिणी चकित हुईं, "त्रिलोकी के स्वामी के नेत्रों में यह अश्रुपात कैसा? क्या किसी दैत्य ने पुनः धर्म को संताप दिया है?"
श्रीकृष्ण ने एक दीर्घ उच्छवास लिया और मंद मुस्कान के साथ बोले, "देवि! आज धर्म संकट में नहीं, प्रेम अपनी परीक्षा देने आ रहा है। एक ऐसा पंडित, जिसके पास न तन ढकने को वस्त्र हैं, न पेट भरने को अन्न, किंतु उसका हृदय निष्काम भक्ति के सुवर्ण से मंडित है। मेरा सुदामा आ रहा है, रुक्मिणी... मेरा सुदामा!"

मार्ग में सुदामा के नंगे पैरों को कंकर और कांटे बींध रहे थे, किंतु उनका मन बरबस सांदीपनि आश्रम के उन दिनों में लौट जाता था।
वे सोचने लगे, 'वह भी क्या दिन थे! जब घनघोर वर्षा में हम गुरुमाता के दिए चने खाने जंगल गए थे। कान्हा ने जब मुझसे पूछा था कि 'सुदामा, क्या चबा रहे हो?', तो मैंने संकोचवश कह दिया था कि 'शीत से दांत बज रहे हैं।' हाय! मैंने अपने पूर्णब्रह्म सखा से चने छिपाए थे... क्या आज भी मैं स्वार्थवश ही उनकी ओर नहीं बढ़ रहा हूँ?'
मार्ग में मिलते यात्रियों से जब वे द्वारका का पता पूछते, तो लोग उनके फटे कपड़ों और कंकाल-शेष देह को देखकर उपहास उड़ाते। किंतु सुदामा का चित्त तो उस नीलमणि वर्ण वाले श्रीकृष्ण की बाल-छवि में अटका हुआ था।

द्वारका के मुख्य द्वार पर खड़े स्वर्ण-वर्मधारी प्रहरियों ने जब सुदामा का मार्ग रोका, तो सुदामा ने कांपते हुए कहा, "हे द्वारपालगण! राजाज्ञा हो तो महाराज से केवल इतना कह दें कि सांदीपनि आश्रम का सुदामा द्वार पर खड़ा है।"
प्रहरी अभी मुड़े ही थे कि राजसभा के भीतर बैठे श्रीकृष्ण के कानों में वह ध्वनि बिना कहे ही गूंज गई।

राजाज्ञा, मुकुट, पीतांबर और राजसी गरिमा—सब कुछ हवा में उड़ गया। द्वारकाधीश नंगे पांव दौड़े। राजसभा में बैठे उग्रसेन, बलराम और महामात्य अवाक रह गए।
जब श्रीकृष्ण ने नगर के मुख्य द्वार पर धूल में सने, दुर्बल सुदामा को देखा, तो वे रुके नहीं। उन्होंने सुदामा को अपनी बाहुओं में भींच लिया।
"कान्हा!" सुदामा के मुख से केवल यही शब्द निकला।
"सुदामा... मेरे भ्राता! इतना विलंब कर दिया?" श्रीकृष्ण का गला रुंध गया।
श्रीकृष्ण उन्हें राजसभा में ले आए। स्वयं अपने स्वर्ण-सिंहासन पर बिठाया। जब रुक्मिणी कनक-परात में जल लेकर आईं, तो प्रभु के नेत्रों से अश्रुओं की ऐसी धारा बही कि परात की आवश्यकता ही नहीं पड़ी—प्रभु के अश्रुओं से ही सुदामा के क्षत-विक्षत चरण पखारे गए।

"सखा!" श्रीकृष्ण ने सुदामा की कांख में छिपी उस मलीन पोटली की ओर संकेत करते हुए कहा, "भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है? क्या अब भी बचपन की भांति अपने चने अकेले ही खा जाओगे?"
सुदामा ने संकोचवश पोटली को और पीछे छिपाना चाहा। वे मन ही मन सोचने लगे, 'इस ऐश्वर्य के स्वामी को मैं यह तुच्छ, मोटे पोहे कैसे दूँ?'
किंतु श्रीकृष्ण ने हठ करके वह पोटली छीन ली। जैसे ही उन्होंने उसे खोला, पूरे राजप्रासाद में एक अलौकिक सुगंध तैर गई।
"अहो! यह तो त्रिलोक का सबसे दुर्लभ नैवेद्य है!" श्रीकृष्ण ने आनंदित होकर एक मुट्ठी तंदुल मुख में डाले।
पहला ग्रास: सुदामा को पृथ्वी लोक (मर्त्यलोक) का समस्त राज-वैभव और सुख संपदा समर्पित हो गई।
दूसरा ग्रास: सुदामा को स्वर्गलोक का समस्त ऐश्वर्य और अमरत्व प्राप्त हो गया।
जैसे ही श्रीकृष्ण ने तीसरी मुट्ठी उठाई, महारानी रुक्मिणी ने अत्यंत कातर होकर प्रभु का हाथ थाम लिया।
"नाथ!" रुक्मिणी जी ने मद्धिम स्वर में कहा, "यदि तृतीय लोक भी दे देंगे, तो यह दासी और आप स्वयं कहाँ निवास करेंगे? क्या अपने इस बैकुंठ को भी सखा के नाम कर देंगे?"
श्रीकृष्ण हँस पड़े। सुदामा इस दिव्य लीला से पूर्णतः अनभिज्ञ थे। वे केवल अपने सखा के मुख मंडल को निहार रहे थे।

अहोरात्र विश्राम के पश्चात, सुदामा ने विदा ली। उन्होंने श्रीकृष्ण से एक कौड़ी भी नहीं मांगी।
चलते समय सुदामा मन ही मन प्रसन्न थे: 'अच्छा हुआ कान्हा ने मुझे धन-दौलत नहीं दी। धन तो मनुष्य को अहंकारी बना देता है। मैं जैसा आया था, वैसा ही निष्पाप और भक्ति-भाव लेकर लौट रहा हूँ।'
किंतु जब वे पोरबंदर पहुंचे, तो उनका भ्रम टूट गया।
जहाँ उनकी टूटी झोपड़ी थी, वहाँ कनक (सोने) और मणियों से जड़ा एक विशाल प्रासाद खड़ा था। हाथियों की गर्जना हो रही थी, और दिव्यांबर पहने सुशीला अपने स्वस्थ, सुंदर बालकों के साथ मुस्कुराती हुई बाहर आई।
"नाथ!" सुशीला ने सुदामा के चरणों में शीश नवाया, "आपके सखा ने हमारे अभाव को नहीं, हमारी भक्ति को देखा। उन्होंने बिना मांगे ही हमें वह दे दिया जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।"
सुदामा की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वे प्रासाद के द्वार पर ही भूमि पर बैठ गए और द्वारका की दिशा में हाथ जोड़कर बोले:
"अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी।
लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥"

(अर्थात: जो प्रभु पूतना जैसी राक्षसी को भी माता की गति दे देते हैं, उन कृपालु श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और किसकी शरण में जाया जाए!)

द्वारका में बैठा राजा अपने ऐश्वर्य में भी भक्त के भाव का ऋणी रहा, और पोरबंदर का ब्राह्मण महल में रहकर भी जीवन भर निष्काम विरक्त बना रहा। एक ने प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा दिया, और दूसरे ने सर्वस्व पाकर भी केवल 'कृष्ण-प्रेम' को ही अपना असली धन माना।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Abstract