ऋतुचक्र
ऋतुचक्र
नगर के उस कोलाहल से दूर, एक संकरी गली के मोड़ पर स्थित वह पुराना कैफे धुंधली रोशनी और पुरानी किताबों की खुशबू से महकता रहता था। आरव के लिए वह कैफे कोई विश्रामगृह नहीं, बल्कि उसकी अंतर्यात्रा का एक पड़ाव था। खिड़की के समीप वाली वह कोठरी जैसी टेबल उसकी नियति बन चुकी थी, जहाँ वह घंटों बैठा बिना चीनी की कड़क ब्लैक कॉफी की कड़वाहट के घूंट लेता और अपने नए उपन्यास के पन्नों पर शब्दों के संसार को उकेरा करता। उसका स्वभाव हिमालय की शांत वादियों जैसा धीर और गंभीर था।
उसी कैफे के एक दूसरे कोने में, रोज शाम अनन्या आकर बैठती थी। वह रंगों की साधक थी—एक चित्रकार, जिसके जीवन में रंगों का उत्सव था। आरव की कड़वाहट से उलट, उसे दूध और ढेर सारी चीनी से सराबोर, खौलती हुई चाय पसंद थी। जहाँ आरव शब्दों से मौन को भरता, वहीं अनन्या अपनी डायरी में रेखाचित्र खींचकर उस मौन को रूप देती। दोनों के बीच हफ़्तों तक केवल दृष्टियों का मूक आदान-प्रदान होता रहा। कोई शब्द नहीं, कोई परिचय नहीं, बस दो अलग संसार एक ही छत के नीचे सांस ले रहे थे।
एक शाम कैफे में असाधारण भीड़ थी। नियति का खेल कहिए कि पूरे कैफे में केवल एक ही कुर्सी रिक्त थी—आरव की मेज के ठीक सम्मुख। अनन्या अपनी कला-दीर्घा (डायरी) समेटे हुए संकोच भरे कदमों से आगे बढ़ी। उसकी आँखें झुक गईं और अत्यंत धीमे स्वर में उसने पूछा, "क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?"
आरव ने लेखन के प्रवाह से आँखें उठाईं, उसकी सौम्य आँखों में एक सहज स्वीकृति थी। उसने बिना कुछ कहे, केवल एक मंद मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
उस दिन दोनों के बीच शब्दों का कोई सेतु नहीं बना। आरव की कलम पन्नों पर चलती रही और अनन्या की पेंसिल कागज़ पर आकृतियां गढ़ती रही। किंतु, जाते समय अनन्या अपनी उस कड़क चाय का आधा कप मेज पर ही छोड़ गई। वह आधा भरा कप, उस शांत केबिन में एक अनकही पहेली की तरह चमक रहा था।
अगली शाम जब संध्या अपनी लालिमा समेट रही थी, अनन्या पुनः उसी आसन पर आकर बैठ गई। इस बार मौन तोड़ने का दायित्व आरव ने लिया। उसने अपनी ब्लैक कॉफी का कप रखते हुए कहा, "आपकी चाय अक्सर अधूरी रह जाती है... जैसे कोई विमर्श बीच में ही छूट गया हो।"
अनन्या के अधरों पर एक सात्विक मुस्कान तैर गई। उसने आरव की आँखों में देखते हुए कहा, "कुछ अधूरेपन जान-बूझकर छोड़े जाते हैं, ताकि आने वाले कल के पास वापस लौटने का एक न्यायसंगत बहाना सुरक्षित रहे।"
उस शाम के बाद, वह मेज दो विपरीत धाराओं के मिलन का संगम बन गई। आरव अपने उपन्यासों के जटिल किरदारों के अंतर्द्वंद्व अनन्या को सुनाता, और अनन्या अमूर्त रंगों के पीछे छिपे रहस्यों को आरव के समक्ष खोलती। समय बीतने के साथ, आरव की उस कड़वी ब्लैक कॉफी में अनजानी मिठास घुलने लगी थी, और अनन्या की चाय अब केवल पेय नहीं, बल्कि गहन वैचारिक संवादों का माध्यम बन चुकी थी।
ऋतुएं बदलीं और एक दिन अनन्या ने अपनी वह रहस्यमयी डायरी, जिसमें वह रोज कुछ न कुछ रचती थी, आरव की ओर बढ़ा दी। आरव ने जैसे ही पहला पन्ना पलटा, उसकी चेतना स्तब्ध रह गई।
डायरी का प्रत्येक पन्ना आरव के ही विभिन्न स्वरूपों को समर्पित था—कभी एकाग्रचित्त होकर लिखते हुए आरव का एकांत, कभी किसी विचार में डूबा उसका गंभीर मुखमंडल, तो कभी खिड़की के बाहर शून्य को निहारती उसकी गहरी आँखें। अनन्या ने अपनी तूलिका से आरव के मौन को पूरी श्रद्धा से जिया था।
जब आरव ने अंतिम पन्ने को देखा, तो वहाँ रंगों से निर्मित एक चाय का आधा भरा हुआ कप था। उस चित्र के ठीक नीचे, अत्यंत सुंदर अक्षरों में अंकित था:
"इस आधे भरे कप की भांति, मेरा अस्तित्व भी तुम्हारे बिना एक अधूरी कविता है। क्या इसे पूर्णता दोगे?"
आरव ने डायरी से आँखें उठाकर अनन्या की ओर देखा, जहाँ प्रेम की निश्छल गंगा बह रही थी। शब्दों के उस शिल्पी के पास क्षण भर को कोई शब्द न बचा। उसने अत्यंत आत्मीयता से अनन्या के कांपते हाथों को अपने हाथों में ले लिया और धीमे, किंतु दृढ़ स्वर में कहा:
"अब से जीवन का यह आधा कप कभी अकेला नहीं रहेगा। तुम्हारी चाय का अधूरापन और मेरी संगति मिलकर, इस जीवन की यात्रा को पूर्ण करेंगे।"

