Sarita Maurya

Drama


4.5  

Sarita Maurya

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कोरोना और इंसानियत का रियलिटी

कोरोना और इंसानियत का रियलिटी

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शाम 7 बजे जब वो जोधपुर से जैसलमेर की बस में बैठी तो पता नहीं था कि सरकार कोरोना जैसी महामारी से सुरक्षा के लिए किसी प्रकार की लॉकडाउन घोषणा इतने लंबे समय के लिए अचानक करने वाली है, ऐसे में आगामी परिस्थितियों की कल्पना करने का तो सवाल ही नहीं था। साधारण तौर पर उसने अपने मकानमालिक को फोन किया कि उसे पहुंचने में रात्रि के 12 बज जायेंगे। सामान्य तौर पर उसकी आदत थी कि जितना हो सके अपनी जिम्मेदारी से सूचना देकर ही कहीं आये जाये ताकि उसकी वजह से किसी को अतिरिक्त परेशानी नहीं उठानी पड़े। मकान मालकिन ने उसे आश्वस्त किया कि उस समय तक तो वैसे ही सब लोग जागते रहेंगे अतः वो बिना किसी चिंता के आ सकती थी। उधर से हरी झंडी मिलते ही उसने चैन की सांस ली और बाकी जरूरी फोन करके अपने शुभ चिंतकों को सुरक्षित पहुंचने की खबर देकर मोबाइल को फ्लाइट मोड पर डालकर अपनी सीट पर पसर गई ताकि लंबे सफर को शांति से काटा जा सके।

अचानक उसे याद आया कि उसने दिलीप भाई को तो बताया ही नहीं कि वह वापस आ रही थी। करीब 8ः30 बजे उन्हें फोन लगाया तो उन्होंने विस्तार से पूछा कि मकान मालिक से बात हुई, वो घर कैसे पहुंचेगी और साथ ही यह भी जोड़ दिया कि कोई परेशानी हो तो वह उन्हें सबसे पहले फोन कर दे। वह जानती थी कि उम्र में छोटे लेकिन अनुभव में बड़े दिलीप भाई, जाति, धर्म, क्षेत्र हर चीज से परे जाकर सगे भाई का रिश्ता निभाते थे मानों अनजाने शहर में ईश्वर ने उसके लिए स्नेह और देखभाल के लिए एक दूत रख छोड़ा हो। दिलीप भाई से बात करके उसने चैन की सांस ली और बहुत अधिक मोबाइल से दोस्ती न होने के कारण उसने रास्ते में फिर से देखने की बजाय अपनी नन्हीं बेटी की मधुर यादों में समय बिताना अधिक अच्छा समझा। 

बस घर से बहुत दूर नहीं रूकती थी अतः उसे आने जाने या रात की वजह से साधन न मिल पाने जैसी कोई चिंता नहीं थी। पूरे रास्ते कोई फिल्म आंखों के सामने दिख रही थी तो वह थी उसकी नन्हीं सी मासूम परी जिसे छोड़कर उसे आना पड़ता था। हर बार न चाहते हुए भी आंसू गालों से लुढ़क कर आंचल तक पहुंच ही जाते थे। बस कंडक्टर की चीखती आवाज ने उसकी सोच पर विराम लगा दिया। मोबाइल घड़ी पर नज़र डाली तो पता चला कि ठीक 12 बजे बस के पहिये थम चुके थे और वह अपने कमरे से चंद कदमों की दूरी पर थी। उसने पुनश्च एक बार घरवालों के निर्देशानुसार सैनेटाइज़र और फिर कपूर का इस्तेमाल किया, बोतल से गरम पानी पिया और बढ़ चली।

गेट पर जाकर जैसे ही खोलने के लिए घंटी बजाई तो महसूस हुआ मानो उसे देखकर कोई अंदर चला गया हो। दोबारा घंटी बजाई तो मकानमालिक का बेटा बाहर आया और कड़कती आवाज में बोला ‘‘ दिखाई नहीं देता कहां से चली आ रही हो, देख लो आज से राजस्थान लॉकडाउन है और अंदर आना मना है।’’

अरे शैलू मैंने तो शाम को बता दिया था आंटी को कि मैं आ रही हूं। लॉकडाउन का मुझे पता नहीं था। फिर भी मेरी स्क्रीनिंग करवा लो, मैं पूरे प्रीकॉशन ले रही हूं मास्क, सैनेटाइज़र, हाथ और हां मुझे कोई बीमारी या परेशानी भी नहीं है। दूसरी बात अगर लॉक डाउन होगा तो होटल में जगह नहीं मिलेगी, मैं कहां जाऊंगी? उसने मकान मालिक को फोन लगाने की कोशिश की ताकि घर के मुखिया होने के नाते और स्थानीय होने के नाते भी उसे स्क्रीनिंग के लिए मदद कर सकें या सुझाव दे सकें साथ ही उनका डर भी दूर हो जायेगा। उसने शैलू से बड़ी मिन्नत की कि वह अपने पिताजी से उसकी बात करवा दे। लेकिन उसे खुली चेतावनी मिल चुकी थी कि वह कहीं भी रह सकती थी लेकिन अंदर किसी भी हाल में नहीं जाने दिया जायेगा।

 उसे सड़क से डर नहीं था लेकिन महिला होने का बहुत बड़ा डर सता रहा था कि वह रात खुले में कैसे गुजारेगी ? एक मन तो किया कि पुलिस को जाकर सूचित करे ताकि उसकी स्क्रीनिंग भी हो जाये और शायद मकान मालिक को नियम भी समझ में आ जाये कि वे ऐसे किसी किरायेदार को अचानक घर से नहीं निकाल सकते। फिर उसे कमिश्नर साहब की इज्जत का ध्यान आया जिन्होंने उसे ये कमरा दिलाया था और खूब तारीफें करी थीं मकान मालिक की इंसानियत की। उसे लगा इंसानियत का भ्रम अगर टूट गया तो उन्हे कितना अफसोस हो जायेगा? अजीब उलझन थी, एक तरफ अनजाने शहर में बेदर होने का दर्द तो दूसरी तरफ रात का असर, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे? कई बार फोन करने के बावजूद जब मकान मालिक का दिल नहीं पसीजा तो उसने हारकर दिलीप भाई को फोन लगाना चाहा, उससे पहले ही उनका फोन आ गया कि वह कैसी थी और घर सुरक्षित पहुंच गई थी?

दिलीप भाई का फोन आते ही आशा की किरण जगमगा उठी लेकिन उसके संवेदनशील मन के सब्र का बांध टूट गया और वो इतना ही बोल पाई कि वह मकान मालिक का डर समझती थी लेकिन इतनी रात में कहां जाये।

दिलीप भाई ने उसे दस मिनट प्रतीक्षा करने को कहा और अगले सात मिनट में उसके सामने थे। आते ही बोले गाड़ी पर बैठो वह हिचकिचाई तो बोले मेरी इंसानियत जिंदा रहेगी तभी इंसान जिंदा रहेगा और इंसान होने का फायदा भी मिलेगा नही ंतो कोरोना अच्छा। वह कुछ कह नहीं पाई या शायद रात्रि गुजारने की कशमकश ने उसे कुछ कहने नहीं दिया और कृतज्ञता भरे दिल से उनके पीछे बैठ गई। रास्ते में दिलीप भाई ने स्वास्थ्य और वर्तमान हालात पर बात की और घर पहुंच गये। तब पता चला कि उसी समय वो किसी रिश्तेदार के घर से आ रहे थे जहां उनकी माता जी का देहांत हो चुका था और उसे छोड़कर पुनश्च वहीं चले जायेंगे।

पुनश्च उसका मन करवट भर तुलना करने लगा ‘‘ये कैसे इंसान हैं जिन्हें मेरी भी चिंता है, और पड़ोसी की भी। शायद इन्हें बेदर और बेघर होने का दर्द कभी नहीं भूलता। उसकी आंखों के सामने अनगढ़ दृश्य तैरने लगे कि किन परिस्थितियों में उन्हें पाकिस्तान से भारत आना पड़ा होगा। बेटियों को साथ लेकर उनके रहने की व्यवस्था और सुरक्षा की चिंता ने किंचित उन्हें हर बेटी हर महिला का रक्षक बना दिया है। इंसानियत का ऐसा सोता और कहां फूटेगा भला। घर पहुंच कर दोनों ने पुनः खुद को सैनेटाइज़ करने का प्रयास किया और वह कमरे में दाखिल होने से पूर्व स्नानघर में चली गई ताकि जहां तक हो सके सुरक्षित रहा जा सके।

उसके लिए अलग कमरे की व्यवस्था की जा चुकी थी और 6 लोग एक ही कमरे में व्यवस्थित हो चुके थे। रात करवटों में गुजर गई और भोर में जाने कब आंख लगी कि चिड़ियों की चहचहाहट भी उसे न जगा सकी। नींद खुली तो दिलीप जी की सबसे छोटी बेटी की हलचल से जो आंखों में प्रश्नों के जुगनू लिये बार-बार कमरे में आ रही थी। 

आंख खुलते ही रात का नज़ारा वापस उसके दिलो-दिमाग पर हावी होने लगा। उसका मन कोरोना से उपजे उस डर का विश्लेषण कर रहा था जिसने इंसानियत को बीमार कर दिया था जहां इंसानियत कैसे जीवन की लालसा में बह चली थी। उसे न तो एक औरत का दर्द समझ आया था न ही अनजाने नगर में बेघर होने का डर। तो दूसरी ओर वह भी था जहां इंसानियत जीवन की लालसा से जीत गई थी। वह मन ही मन मुस्कुरा उठी कि कोरोना को हारना ही पड़ेगा। कम से कम वह स्वयं ये मशाल थाम कर ही आगे बढ़ेगी और बेघरों के लिए घर न सही छाया और रोटी का प्रबंध करना तो हो ही सकता था। अपनी मुट्ठी में मुस्कुराहटें संजोये चल पड़ी दूसरों को मुस्कुराहट बांटने। कृतज्ञ सी इंसानियत की दिशा में चुपचाप, कोरोना को हराना तो है लेकिन इंसानियत को भी हारने नहीं देना। 


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