Akanksha Visen

Drama


3.3  

Akanksha Visen

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मेरे गांव का सफर

मेरे गांव का सफर

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कल देर रात एक दोस्त का मैसेज आया बातों-बातों में ही उसने बताया कि छत पर चिड़िया बोलने लगी हैं बहुत सालों बाद मेरी छत पर ऐसा नजारा दुबारा देखने को मिल रहा। उसकी इन बातों से मुझे मेरा गांव याद आ गया या फिर यूं कह लो कि बचपन याद आ गया। पापा का ट्रांसफर हो गया तो हम सब अलीगढ़ से अपने गांव वापस आ गए। वैसे अक्सर हम छुट्टियों में गांव आ ही जाते थे लेकिन अब हमें यहीं रहना था। शहर के एक स्कूल में कक्षा छ: में हमारा एडमिशन करा दिया गया। पापा पांच भाई थे और पूरा परिवार एक साथ रहता था,

गांव में बिजली एक हफ्ते दिन और एक हफ्ते रात की आती थी। मुझे आज भी याद है कि हमारे घर में टी.वी देखने के लिए आधा गांव इक्ठ्ठा हो जाता था अगर बिजली चली जाती तो लोग थोड़ी देर इंतजार करके वापस घर चले जाते और जैसे ही बिजली आती फिर दौड़कर टी.वी देखने आ जाते। उस टाइम पर हमारा बड़ा भौकाल होता था क्यों टी.वी और सीडी दोनों हमारे यहां ही थी। क्या मजाल गांव का कोई बच्चा हमसे कुछ कह दे क्योंकि अगर कुछ कहेगा तो उसे हमारे आंगन में बैठकर टी.वी नहीं देखने को मिलेगा। किसी फिल्म की सीडी जब पापा लेकर आते तो पूरे गांव में हल्ला मचा दिया जाता कि आज ये फिल्म चलेगी। अब बात करूं खाने पीने की तो सुबहॊ सारे बच्चों को एक साथ ही स्कूल जाना होता था घर की औरत सुबह चार बजे से उठकर नाश्ता, टिफिन और तो और बाकी सभी के लिए दोपहर का खाना भी बनाना शुरू कर देती थी। सबके लिए एक सा ही नाश्ता बनता था हां अगर कोई कुछ अलग खाना चाहता है तो बगल में रामू की दुकान से ले आता वैसे मैं और मेरी बहन अक्सर पाव लेकर आते थे वो एक रुपए के चार पाव देता था वो पाव गोल-गोल और बड़े ही कुरकुरे होते थे और जैसे ही चाय में डुबाओ नरम हो जाते थे। टिफिन में हमेशा सब्जी पराठा ही मिलता था। गांव से स्कूल लगभग तीन किलो मीटर दूर था गांव की लड़कियां पैदल ही स्कूल जाती थी तो अब हमें भी पैदल ही जाना था, सारी लड़कियां ग्रुप में चलती थी और सच बोलू तो इतनी स्पीड में चलती थी कि जैसे लगता था कि दौड़ रही हो। हमें तो पैदल चलने की आदत भी नहीं थी तो अक्सर हम पीछे रह जाते फिर वो हमारे लिए रुकती और जब हम उनतक पहुंचते तो वो फिर उसी स्पीड में चल देती। हमारी हालत देखकर कभी-कभी हमें राहगीरों की साइकिल पर बैठा दिया जाता था। उस समय तो बहुत बुरा लगता था कि स्कूल इतना दूर क्यों था लेकिन अब लगता है कि काश वो दिन फिर से लौट आएं।

जुलाई के महीने की चिलचिलाती धूप में जब हम दो

बजे स्कूल से वापस लोटते तो हमारे भी कदम बड़ी फुर्ती से बढ़ते थे क्योंकि धूप हमें पीछे से दौड़ाती रहती थी, हमारे कदम वहीं रुकते जहां थोड़ी सी छांव होती हमने तो कुछ स्टॉपेज भी बना लिए थे जैसे स्कूल से निकलने के बाद सबसे पहले खैरा मंदिर रुकते फिर वहां के बाद सब हेम की बगिया रुकते और आखिरी स्टॉप होता टिकई बगिया, अरे हां ये तो बताना भूल ही गई खैरा मंदिर के सरकारी नल से हम पानी पीते फिर हेम की बगिया से हम अमरूद चुराते और टिकई बगिया में हमारे भी कुछ आम के पेड़ थे जो बिल्कुल सड़क किनारे लगे थे लेकिन हम उसमें से आम ना तोड़कर तिलकराम भइया के पेड़ के आम चुराते थे। टिकई बगिया में रुकने के बाद हम सीथा अपने घर पर ही रुकते, घर पहुंचने पर सबके लिए चूल्हे पर दाल, चावल और सब्जी एक साथ मिलाकर गर्म किया जाता था हमे खाने से ज्यादा कड़ाही में पड़ी खुरचुनी खाने में मजा आता था, जिसके लिए कभी-कभी मार भी हो जाती थी। शाम को अक्सर हम छुपम-छिपाई खेलते और कभी-कभी बैठकर काला-डोगा की कहानी सुनते, अरहर की लकड़ी को तलवार बनाकर युद्ध भी खूब खेला है। गांव में सात बजे तक खाना खा लिया जाता था और उसके बाद सभी अपना-अपना बिछौना लेकर छत पर चल देते, छत पर सबकी जगह बुक थी कि किसका बिछौना कहां बिछाना है... हमे दादी के बगल वाली जगह मिली थी। छतपर वो ठंडी-ठंडी हवा में इतनी अच्छी नींद आती थी कि उतनी अच्छी नींद

आजकल की एयर कंडीशनर रूम में भी नहीं आती और सुबह सुरज निकलने के साथ जो शुद्ध हवा मिलती थी उसका मजा ही कुछ और था। रविवार को अक्सर हम गांव के बच्चों के साथ खाना-पुजनिया खेलते थे जिसमें सभी को अपने-अपने घर से खाना बनाने के लिए कुछ सामान लाना होता था और फिर ईंट का चूल्हा बनाकर खाना बनाते थे, वैसे इस खेल में अक्सर खीर-पूड़ी ही बनती थी। बात करूं त्यौहारों की तो होली और दीपावली जैसे बड़े त्यौहारों के साथ-साथ गुड़िया, रक्षाबंधन और नवा भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। वैसे तो होली मुझे ज्यादा पसंद नहीं लेकिन इंतजार बेसब्री से रहता था क्योंकि हमारे यहां अमीर से लेकर गरीब तक होली में नए कपड़े खरीदता था। दोपहर में होली खेलने के बाद नहा-धोकर नए कपड़े पहने जाते और फिर शाम को लोग ग्रुप बनाकर गांव में एक दूसरे के घर जाते थे, ऐसे में बच्चों का अलग ग्रुप लड़कियों का अलग और बड़ों का अलग ग्रुप होता था। हां होली की शाम लड़के क्रिकेट खेलने में बिजी रहते थे । होली के पकवानों की बात करूं तो आज के जैसे ब्रेड पकौड़े वगैरह तो नहीं बनते थे लेकिन चिप्स, पापड़, पुए, मठरी, दही बड़े और पना तो जरूर बनता था इसके अलावा सब्जी पूड़ी और चावल खाने में होता था । वो भी क्या दिन थे जब हम रसोई में जाकर पुए और पापड़ चुराकर खाते थे जो स्वाद उनमें आता था वो अब सामने भर-भरकर रखे पकवानों में भी नहीं आता।

मेरे गांव का सफर यूं ही जारी रहेगा, आप भी राहगीर बनकर साथ चलिएगा...

परिवार बड़ा था तो बच्चे भी थे और बच्चों में झगड़ा भी खूब होता था, कभी खाने को लेकर तो कभी खेलने को लेकर अगर किसी ने अपने हिस्से की चोरी नहीं दी तो उसे ग्रुप में खिलाया नहीं जाता और कई दिनों तक उसपर कमेंट किए जाते थे लगभग तबतक जबतक की वो अपनी चोरी ना दे दे। कभी-कभी तो हमारे झगड़े इतने बढ़ जाते कि घरवालों को बीच में आना पड़ता फिर उनमें झगड़ा हो जाता,

हम तो एक हो जाते लेकिन उनकी बोलचाल कई दिनों तक बंद रहती। गर्मियों में जहां सबके बिछौने छतपर बिछते थे तो वहीं सर्दियों में घर में बिछौनों के नीचे धान का पैरा डाल दिया जाता था (धान की खेती के बाद धान को सुखाकर अलग कर लिया जाता है और उसके बाद बचे हुए पेड़ को पैरा कहते हैं) क्योंकि वो गर्म करता है। दिन भर लकडियां जलाकर हाथ सेके जाते थे उस समय चूल्हे के पास बैठना बड़ा अच्छा लगता था। सर्दियों की शुरुआत में सरसों की खेती होती है जिसमें पता नहीं ये बथुए कहां से आ जाते थे। हम सभी बच्चे खेते में जाकर बथुए खोटते (उखाड़ते) थे और साथ ही सरसों की पत्तिया भी तोड़ते रहते थे और ये सब हम अपने खेत से नहीं बल्कि दूसरे के खेत से चुराते थे क्योंकि कोई और भी हमारे खेत से चुराता रहा होगा। जब हमारे झोले भर जाते तो हम गन्ने के खेतों की तरफ चल देते और गन्ने तोड़ते वो भी दूसरे के खेतों से और अगर खेत का मालिक दूर से चिल्लाता कि कौन है खेतों में... तो अंदर ही अंदर सरपट दौड़ लगा जाते ऐसे में गन्ने की पत्तियां कभी-कभी हमारा खून निकाल लेती लेकिन डर के मारे हम अपने घर में उन चोटों को नहीं दिखाते थे। हमारी चोरियां तबतक किसी को पता नहीं चलती थी जबतक की कोई हमारी शिकायत करने घर नहीं आ जाता, क्योंकि घर में तो सबको यही लगता था कि हम अपने खेतों से गन्ना या साग लाते हैं। जिन मक्के की रोटी और सरसों का साग के लिए आज हम स्पेशल आर्डर करते हैं उस समय वो बहुत ही बेस्वाद लगता था जब भी मैं वो खाती तो मुझे लगता कि हम गरीब हैं शायद इसलिए ये हमारे घर में बनता है।

उस समय आज जैसे न जैकेट थे ना ही बूट एक-दो स्वेटर हाथ की बुनी टोपी और चप्पल में ही ठंडी कट जाती थी। अरे गांव की सर्दियां बिता दी और दिपावली का जिक्र तक नहीं किया। मैंने आपको बताया था ना कि होली मुझे पसंद नहीं थी लेकिन दीपावली मेरा पसंदीदा त्यौहार था, हां था ही कहेंगे क्योंकि बचपन में त्योंहारों में काम नहीं करना पड़ता था और अब त्यौहारों का मतलब बस साफ-सफाई और काम ही रह गया है। खैर हटाओ हम गांव में चलते हैं...तो हमारे यहां दीपावली भी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी, कई हप्ते पहले से जहां औरतें मिठाईयां बनाना शुरू करती तो वहीं बच्चे घर-घरौंदा, कई दिन पहले से ही हम तालाब से चिकनी मिट्टी लाना शुरू कर देते फिर ईंट और लकड़ी के पटरे से छोटा सा मतलब बहुत छोटा सा घर बनाते फिर उसपर माटी लपेटी जाती फिर घरौंदा सूखने के बाद उसमें भगवान जी रखे जाते। गांव की दीपावली में नए गणेश लक्ष्मी जी लाए जाते और तो और गांव के मंदिर में भी लक्ष्मी जी की स्थापना की जाती। घर में सुबह आंगन को गाय के गोबर से लीपा जाता फिर शाम को वहां गणेश लक्ष्मी जी की मूर्ती रखकर पूजा की जाती, उस समय मैंने अपने गांव में किसी के यहां रंगोली बनते नहीं देखी हां गेहूं के आटे का नौग्रह जरूर बनाया जाता था, जहां गणेश-लक्ष्मी जी रखे जाते वहां एक नई झाड़ू और बड़ा सा दिया ढककर रखा जाता, आरती पूजा होने के बाद हम कुछ दिए घर-घरौंदे में भी जलाते फिर वहां बैठकर थोड़ी देर पढ़कर अपनी विद्या जगाते थे।

उस रात पढ़ना बहुत जरूरी होता था...इसके बाद हम कुछ दिए मंदिर के लिए ले जाते जहां मां लक्ष्मी की स्थापना होती थी। मंदिर में दो दिन वीडियो चलाया जाता था और नई फिल्म दिखाई जाती थी, गांव में कभी-कभी पूरे गांववालों को वीडियो दिखाई जाती... राज, जोश जैसी और भी कई फिल्में मैंने गांववालों के साथ बैठकर वीडियों में देखी हैं। दीपावली में जब देर रात हम वीडियो देखकर घर लौटते तो मां हमारे आखों में उस बड़े वाले दिए से बना हुआ काजल आंखों में पोत देती जो पूजा के वक्त ढककर रखा था। सुबह तक वो काजल पूरे मुंह में पुत चुका होता था दीपावली के दूसरे दिन हमारी मौज रहती थी क्योंकि उस दिन पढ़ना नहीं होता था और हम बच्चे तो इतने महान थे कि उस दिन नहाते भी नहीं थे, पूरा काजल पोते हुए एक दूसरे को देखकर हंसते थे। ये सारी प्रथाएं आज भी मेरे गांव में हैं, शुद्ध सरसों के तेल में जब रुई भिगोकर जलाई जाती थी तो पूरा गांव जगमगा उठता था लेकिन अब दीपावली की झालरों में वो रोशनी नहीं रही जो मिट्टी के बने दियों से होती थी।

गांव में बच्चों के पास खिलौने बहुत कम होते थे लेकिन अगर किसी के पास कोई खिलौना होता तो वो उसे बहुत संभाल के रखता और खिलौनों में आज की तरह बार्बी डॉल और रिमोट से चलने वाला प्लेन नहीं होता था बल्कि मिट्टी से बने हुए खिलौने होते थे, कुछ खिलौने तो हम खुद ही मिट्टी लाकर बना लेते थे, वैसे मिट्टी के पहिए बनाकर उनमे लकड़ी फंसाकर और रस्सी बांधकर गाड़ी तो मैं अभी भी बना सकती हूं।

गांव की बात चल रही है और मैंने अभीतक आपको मेले में नहीं घुमाया...जून-जुलाई में हमारे गांव में बड़का मेला लगता था हां दशहरे और छट पूजा वाले दिन भी लगता था लेकिन बड़के मेले की बात ही अलग थी क्योंकि वो मेला एक महीने पहले लग जाता और गुरू पूर्णिमा के दिन खत्म होता। मेले में घूमने के लिए बप्पा सभी बच्चों को दस-दस रुपए देते थे (बड़े पापा को हम बप्पा कहते थे और बप्पा कहने पर वो हमे पैसे भी देते थे) उस समय दस रुपए बहुत होते थे और हां दस-दस रुपए हमें हमारे घर से भी मिल जाते थे तो बीस रुपए हमे मेला घूमने के लिए दिया जाता, लेकिन हम इसे ऐसे गिनते थे जैसे हम सात बच्चे हैं तो सातों के पैसे मिलाकर एक सौ चालीस रुपए,

तो इतने रुपए हमारे लिए बहुत थे, बड़े बच्चों की निगरानी में हमे मेला देखने भेजा जाता, जहां हमें एक अड्डा बता दिया जाता कि अगर गायब होना तो यहीं मिलना...मेले में सबसे पहले हमें टिक्की-समोसे खिलाए जाते आपको बता दूं उस समय दो रुपए की टिक्की मिलती थी और एक रुपए का समोसा उसके बाद हम झूला झूलने जाते झूले वाले को पैसा देकर दीदी लोग अपने लिए सामान खरीदने चली जाती और जबतक हम झूले से उतरते वो वापस भी आ जाती थी। हां झूला वाला भी दो रुपए में झूला झुलाता था अगर किसी ने दो बार झूला झूला तो उसके हिस्से से दो रुपए कट जाते थे। झूला झूलने के बाद बारी आती थी खिलौनों की लड़के खिलौने खरीदते तो लड़कियां चिमटी, रबड़बैंड जैसे सामान और फिर फिर हम जलेबी, बुढ़िया के बाल, इमली, चूरन, लच्क्षी जैसी चीज खाते और जो पैसे बचते उससे घरवालों के लिए जलेबी ली जाती। शाम होने से पहले हमें घर के लिए भी निकलना होता था, इस दिन गांव की सड़कों पर बड़ी भीड़ रहती थी तो कोई ना कोई साईकिल वाला मिल ही जाता था जो हमें बैठाकर घर छोड़ देता। आपको बता दूं मेरे गांव में आज भी वो मेला लगता है।

बचपन में ही हमें मेहनत से पैसा कमाना सिखाया जाता था जिसके लिए अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ती थी। मई-जून में गेंहू की कटाई होती है और थ्रेसर में गेंहू डालकर गेंहू और भूसे को अलग-अलग किया जाता है। ये सब हमारा काम नहीं था हमारा काम था कि इस पूरी प्रकिया के बीच में जो गेंहू की बालियां रह गई हैं उन्हें बीनकर इक्ठ्ठा करना, गेंहू के खेत बहुत बड़े और ज्यादा होते थे बालियां बीनते-बीनते दोपहर से शाम हो जाती, हमारे इक्ठ्ठा किए हुए गेंहू को सबसे आखिरी में थ्रेसर में डाला जाता और ये गेंहू हमारी कमाई होती थी जिन्हे बेचकर हम खाने-पीने की चीजे खरीद सकते थे। गर्मियों में जब बर्फ वाला आता और भोंपू बजाता तो उस बच्चे को आवाज के पीछे दौड़ाया जाता जो तेज दौड़ सके फिर वो उसे वहीं रोककर हमारे पास आता हम अपनी कमाई का गेंहू लेकर जाते और वो हिसाब लगाकर हमें बर्फ दे देता।

उस समय दो रंग के बर्फ मिलते थे एक नारंगी और दूसरा सफेद ये कच्चे बर्फ होते थे जिनमे नारंगी वाले में संतरे का स्वाद आता था और सफेद वाला बस मीठा होता था और ऊपर की साइड नारियल का बुरादा लगा रहता था। बर्फ गल के गिर ना जाए इसीलिए हम घर पहुंचते ही कटोरियों में बर्फ रखकर चूसते थे ये बर्फ इतनी जल्दी गलती थी कि जब तक हमे थोड़ा सा स्वाद आता तबतक वो कटोरी में पानी की तरह पिघल जाती। अफवाह तो ये भी थी कि ये वही बर्फ होती है जिसपर मुर्दों को लिटाया जाता है लेकिन हमें क्या हमें तो उस समय सिर्फ ठंडे-ठंडे बर्फ से मतलब होता था। गांव में अब आइसक्रीम वाला आता है और लोगों के पास फ्रिज भी है लेकिन वो जो बर्फ वाला जो भोंपू बजाकर बच्चों को बुलाता था उसकी बात ही कुछ और थी।

गांव में बिजली का कोई भरोसा तो रहता नहीं था इसलिए ढ़िबरी और लालटेन हर घर में होता था। राता होते ही सारे बच्चे ढ़िबरी और लालटेन लेकर छतपर पढ़ने चल देते थे। पूरे गांव के छतपर आपको लालटेन और ढ़िबरी जलती दिख सकती थी और हां जिसके छतपर जितनी देर तक ढ़िबरी या लालटेन जल रही होती मतलब उस घर के बच्चे उतनी देर तक पढ़ते हैं तो इस तरह से गांव में छत पर पढ़ने की या फिर यूं कह लो की ढ़िबरी जलाने की प्रतियोगिता होती थी। आपने पांखी के बारे में सुना है? जब बारिश होती और उसके बाद सूरज निकल जाता तो रात में पता नहीं ये पांखी कहां से आ जाती थी इतनी ज्यादा होती थी लालटेन जलाना मुश्किल हो जाता क्योंकि जहां उजाला होता ये मधुमक्खी की तरह वहीं चिपक जाती, लेकिन हमारे पास सबका जुगाड़ था, हम थाली में पानी भरकर उसमें ढ़िबरी या लालटेन रखते थे जिसमें वो गिर-गिरकर मरती रहें। ठंडियों में तो हमने लेम्प से ना जाने कितनी मच्छरदानिया जला डाली हैं, हम लेंप लेकर मच्छरदानी के अंदर बैठ जाते और वो ऊपर से जलती रहती। अरे हां मैं ये तो बताना भूल ही गई कि कभी-कभी हम लालटेन छतपर पूरी रात जलाकर रख देते और वहीं सो जाते जिससे दूसरे के घरवालों को लगे कि हम पूरी रात पढ़े हैं।

गांव में जब दिन की बिजली आती थी तो खेतों में ट्यूबवेल चलता था, चलता तो रात में भी रहा होगा लेकिन हमें दिन में चलने से मतलब था, हम सभी अपने-अपने कपड़े लेकर चल देते और ट्यूबवेल में खूब नहाते, फिर वहां से हम सीधे घर नहीं आते बल्कि पास में लगे फरेंद (शायद उसे जामुन भी कहते हैं) के पेड़ से फरेंद तोड़ने जाते आपको बता दूं वो पेड़ भी हमारा नहीं था तो हम फरेंद चुराने जाते फिर कुछ खाते और कुछ अपनी फ्रॉक और जेबों में भरकर घर भी लाते, जिसके बाद फिर हमारी अच्छे से सुतइया होती क्योंकि उसके दाग हमारे कपड़ों में लग जाता था, वैसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि दाग जाए या लगा रहे हमें वो कपड़े तबतक पहनने होते जबतक वो छोटा या फट ना जाए। हम बड़े हो रहे थे लेकिन हमारी शैतानियां खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी, जैसा कि मैंने पहले भी आपको बताया कि हमारे पास खिलौने नहीं होते थे तो हम आउटडोर गेम ज्यादा खेलते थे,

आम के मौसम में जब आम की गुठलियां इक्ठ्ठा हो जाती तो उन्हें सुखाकर हम अपना हथियार बनाते और दो गैंग बनाकर गुठली मार गेम खेलते इसमें एक दूसरे के गैंग के लोगों को घायल करना होता था ये गेम सीरियस तब हो जाता जब गुठली किसी का खून निकाल लेती, मुझे याद है एक बार ये गुठली में छोटे भाई की आंख में लगी थी और उसे अस्पताल लेकर जाना पड़ा था, लेकिन हमारे हिसाब से गलती उसी की थी क्योंकि वो उस समय चाल साल का रहा होगा तो उसे ये गेम खेलना ही नहीं चाहिए था। हम घुच्चू छकाई भी खेलते थे वैसे ये गेम हम ज्यादातर ठंडियों में ही खेलते थे, इस गेम में सभी के पास एक-एक डंडा होता और उस डंडे से उसे जमीन में छेदकर गोला बनाना होता उसे हम घुच्चू कहते थे तो गेम बस इतना था कि चोर को हमपर गेंद फेंकनी होती और हमें गेंद पर डंडा मारने के साथ-साथ अपने आपको और घुच्चू को बचाना होता क्योंकि अगर गेंद आपसे छू गई या चोर ने अपका घुच्चू छका लिया तो फिर आपको चोरी देनी होती, कभी-कभी तो मेरे पापा भी हम बच्चों के साथ ये गेम खेलते थे और गेंद लेने के लिए खूब दौड़ाते थे। ये सारे गेम मैंने इंटर तक खेले हैं क्योंकि हमारा बचपन कभी गया ही नहीं और आजकल के बच्चे, बच्चे कम बड़े ज्यादा लगते हैं।

आइए आपको बच्चों के झगड़ों के बारे में बताती हूं...वैसे तो हममें बहुत एकता थी लेकिन कभी-कभी लोग इसमें आग लगा देते और हमें आपस में भिड़ा देते ऐसा ही कुछ एक दिन हुआ हम मुराल बगिया में खेल रहे थे तभी मेरे चचेरे भाई और बहन में बहस हो गई और इस बहस में घी का काम किया वहां खड़े एक सत्रह साल के गांव के ही लड़के ने उसने दोनों को इतना भिड़ाया कि मेरे चचेरे भाई-बहन में हाथापाई शुरू हो गई छोटे बच्चों में जब मार होती थी तो बड़े बच्चे उसे एक शो के रूप में देखते थे और तबतक बचाव नहीं करते थे जबतक की खून ना निकल आए, मैं भी इस लड़ाई को छिपकर देख रही थी हां छिपकर ही देख रही थी क्योंकि अगर मैं वहां जाती तो ये लोग मुझे भी मैदान में उतार देते। मैंने देखा चचेरा भाई चचेरी बहन का दोनों पैर पकड़ कर बगीचे में घिर्राते हुए ले जा रहा है... जब लड़ाई का ये पड़ाव आ गया तो दोनों को अलग किया गया दोनों गुस्से में घर गये लेकिन किसी ने भी घर में लड़ाई का जिक्र नहीं किया मैनें भी नहीं थोड़ा ही समय बीता था कि वो दोनों फिर एक हो गए क्योंकि जब एक ही घर में रह रहे हो तो कबतक एक दूसरे से गुस्सा रहोगे...

घर की सारी लड़कियां एक ही स्कूल में पढ़ती थी हमारे स्कूल में कुछ लोग आए और उन्होंने हमें कलर कॉम्पटीशन के बारे में बताया जिसमें सिर्फ रंग भरने थे, ये प्रतियोगिता किसी दूसरे स्कूल में होनी थी, मैं और मेरे ताऊ की बेटी की आर्ट अच्छी तो हमने इस प्रतियोगता में भाग लेने का सोचा लेकिन मेरी बहन जिसकी आर्ट बिल्कुल भी नहीं अच्छी थी इसीलिए उसने हाई स्कूल में संगीत ले रखा था उसका भी मन हो गया प्रतियोगिता में भाग लेना का, तो इस तरह से हम तीनों ने प्रतियोगिता में भाग लिया जो कि दो दिन बाद होनी थी...

लेकिन इससे पहले ही मेरी बहन और मेरे ताऊ की बेटी में भयंकर मार हो गई, ये मार भी लोगों के भिड़ाने पर ही हुई थी, तो इस मार में पहले तो दोनों ने एक-दूसरे को जमीन पर पटका फिर बाल नोचने लगी गांव की भाषा में इसे झौंटा नोचउवल मार कहते हैं, मैं इन दोनों को देख रही थी और मुझे पता नहीं क्यों बड़ी हंसी आ रही थी तभी गांव के एक भइया आए और उन्होंने बड़ी मुश्किल से दोनों को अलग किया, उन्होंने मेरी बहन से कहा, गदर पहिन के गदर मचावत हू... दरअसल मेरे पापा उसके लिए एक टॉप लाए थे जिसपर लिखा था “गदर एक प्रेम कथा” उस लड़ाई के बाद की कहानी तो सुनिए...दूसरी सुबह हमें प्रतियोगिता में जाना था और जहां प्रतियोगिता होने वाली थी उसका पता हम तीनों में से सिर्फ मेरी ताऊ की लड़की को पता था। अब हमारी हालत थूककर चाटने वाली हो गई थी वो भी सिर्फ मेरी बहन की वजह से,

लेकिन करते भी क्या, तो हम डरते-डरते ताऊ के पास पहुंचे और उनसे बहन के बारे में पूछा तो उनका जवाब ये था ‘बे बच्चा तू सभे वोहका इतना मारुय है कि ऊ खटिया पा पड़ी ही’ हमें लगा कि अब हम प्रतियोगिता में नहीं शामिल हो पाएंगे हम खटिए के पास गए और जैसे ही उसे उठाया उसने कहा चलो जल्दी से तैयार हो जाओ वरना देर हो जाएगी... ऐसा लग रहा था कि जैसे वो इंतजार कर रही हो कि कब हम उसे मनाने आएंगे। हम प्रतियोगिता में शामिल हुए और जैसा कि मैंने बताया था कि मेरी बहन को कलर का सी भी नहीं पता था तो चोरी-छिपे हमने उसके पेज में भी कलर भर दिए...एक हप्ते बाद उसका रिजल्ट आया जो कि चौकाने वाला था मेरे पूरे स्कूल में या ये कह लो कि शहर के पूरे स्कूल में से मेरी बहन उस प्रतियोगिता में प्रथम आई... ये मेरे और मेरी चचेरी बहन के लिए बेहद दुखी के पल थे क्योंकि हम दोनों ने ही उसके पेज में रंग भरे थे।

अरे हां आजकल लोग रामायण देख रहे हैं...

मैं भी हर शनिवार और रविवार यूट्यूब पर देखती हूं...रामायण देखकर मुझे राम विवाह याद आ गया, अक्टूबर-नवंबर में हमारे गांव में राम विवाह का त्यौहार मनाया जाता था, उस दिन वैसे तो कुछ खास नहीं होता बस तुलसी जी की पूजा की जाती थी... ना जाने हम बच्चों के दिमाग में ये कहां से आया कि हम राम विवाह खेलेंगे बिल्कुल वैसे ही जैसे कि रामलीला होती है, तो इसके लिए सबसे पहले हमें पैसे की जरूरत थी तो हमने चंदा मांगना शुरू किया पूरे गांव में नहीं बस अपने पटिदारों में फिर हमने किसे क्या रोल प्ले करना है ये डिसाइड किया आपको यकीन नहीं होगा लेकिन मुझे राम का रोल मिला था वो भी इसलिए क्योंकि बाकी सभी बच्चों में मेरी लम्बाई कुछ ज्यादा ही थी...

राम विवाह वाले दिन घर के बाहर पानी से छिड़काव किया गया फिर वहां गाय के गोबर से लीपा गया जिससे जमीन की मिट्टी दब जाए, जितने बच्चे शामिल थे वो घर से साड़िया लेकर आए जिससे सजावट करके मंच बनाया गया फिर पूरे गांव में राम विवाह देखने का बुलावा दिया गया और शाम को हमने कई सारी लालटेन से रोशनी करके पूरा माहौल बना दिया, धीरे-धीरे लोग आना शुरू हो गए और हमने रामयण में से वो पार्ट खेला जिसमें श्री राम धनुष तोड़ते हैं... पूरे प्ले में मुझे बस इतना बोलना था कि “शांत भ्राते शांत” राम विवाह समाप्त हुआ और लोगों ने खूब तालियां बजाई साथ ही कुछ घरवालों ने हमें पैसो भी दिए... सच बताऊं तो हमें विश्वास नहीं था कि सब कुछ अच्छे से निपट जाएगा और इस तरह से ये हमारा पहला और आखिरी राम विवाह था।

हम बड़े हो रहे थे और गांव भी बदल रहा था लोग शहर के चाल-चलन गांवों में ला रहे थे, अब हमारे घर भी अलग-अलग बन गए क्योंकि पुराना घर छोटा था। मेरे घर के ज्यादातर बच्चे अब बाहर दूसरे शहरों में रहकर पढ़ रहे हैं। सबके पास लगभग सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं, मेरा गांव पूरी तरह से बदल चुका है बस एक गांववालों का प्यार ही है जो बिल्कुल नहीं बदला अभी भी जरूरत पड़ने पर पूरा गांव इक्ठ्ठा हो जाता है।

मेरे गांव का सफर यहीं समाप्त होता है धन्यवाद सफर में साथ बने रहने के लिए।


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