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Seema Saxena

Drama

4  

Seema Saxena

Drama

गुलफ़िजा

गुलफ़िजा

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उपासना सुपर फास्ट ट्रेन अपनी पूरी रफ़तार से दौड़ी जा रही थी ! स्टेशन दर स्टेशन, नदी, नाले, पुल सब कुछ पार करती जा रही थी ! बिना कहीं रुके या थमे, हर मंजिल को अपने पहियों से नापते हुए । वह कहीं नहीं रूकी थी बस निर्धारित स्टेशन पर ही रूकेगी कुछ देर को, फिर कुछ सवारियां उसमें चढेंगी, उतरती तो न के बराबर हैं क्योंकि उसमें अधिकांश लम्बी दूरी का सफर तय करने वाले ही बैठे थे।

मैं मुरादाबाद से लखनऊ जा रही थी ! मेरी सीट रिजर्व थी, सो मुझे कोई परेशानी नहीं हुई, आराम से अपनी सीट पर आकर लेट गयी थी ! वैसे इतनी भीड़ होती है कि खड़े होने भर को भी जगह न मिले। अगला स्टापेज बरेली जंक्शन था ! सुबह के पाँच बजने वाले थे। जैसे ही ट्रेन रूकी एक खूबसूरत सी कमसिन लड़की उस कोच में चढ गयी। उसके लम्बे, घनें, काले, लहराते बाल उसके चेहरे की सुन्दरता को और बढा रहे थे। वह मेरी सीट के पास आई और बोली, “दी, क्या मैं यहाँ आपके पास बैठ सकती हॅू ?” उसकी गहरी काली और चमकती आँखों से झाँकती याचना। 

“दी, मैं रिजर्वेशन नहीं करा सकी ! आज मेरा पेपर है और जनरल बोगी में सफर करना बहुत मुश्किल है !” उसने फिर से कहा।

“ठीक है, बैठ जाओ कहाँ तक जाना है ?”

“लखनऊ तक !”

मुझे लगा कि उसने इस कोच में आकर ठीक ही किया है क्यूंकि उस अकेली के लिए जनरल बोगी में जाना निःसंदेह गलत रहता। एक तो खड़े होने तक की जगह बड़ी मुश्किल से मिलती, दूसरे हर तरह की नजरों का सामना करती हुई वह, भीड़ का फायदा उठाकर उन लोगों से अपने शरीर को कैसे बचा पाती, जहाँ हर कोई उसे किसी न किसी बहाने छूने का प्रयास करते और वह कुछ कह भी नहीं पाती ।

मैंने उसे अपनी सीट पर बिठा लिया ! वैसे भी अब दिन निकलने वाला था और लेटने का कोई औचित्य ही नहीं । अब आगे का सफर बैठ कर भी आसानी से पार किया जा सकता था। वह एक किनारे से बैठ गयी थी और पीठ पर टॅगें बैग को उसने अपनी गोद में रख लिया था। वह अपने मोबाइल के साथ बतियाने लगी ! हाँ वो व्हाटसप पर किसी से बात कर रही थी। उसके चेहरे पर आते जाते एक्सप्रेशन सब चुगली कर रहे थे। एक मनमोहक मुस्कान उसके चेहरे पर खिल रही थी।

आँखें बोलती हुई सी, उसने एक बार को नजरें उठाकर चारो तरफ देखा फिर मैसेज पढने में लग गयी। यह सिलसिला लगातार चल रहा था। उसकी पतली पतली लम्बी उॅगलियां खट खट कर मेसेज टाइप कर देती, साथ ही एक स्माइली या कोई और स्टिकर, मैसेज के साथ जोड़ देती ! लगभग आधे पौने घंटे तक वह इसी तरह से मैसेज पढने और भेजने में लगी रही। जब मोबाइल ने लो बैटरी का साइन दे दिया तो उसे मजबूरन फोन बंद करना पड़ा। मैं इतनी देर से बराबर उसके चेहरे के आते जाते भावों को ध्यान से देख रही थी। पल पल रंग बदलते वे भाव बिना कहे भी सब कुछ कहे जा रहे थे। कि उसी समय मेरे फोन की घंटी बज उठी थी, देखा तो घर से फोन था। वे मेरे आने के बारे में पूछ रहे थे, मैंने उन्हें बताया कि बस दो घंटे में पहुंचने ही वाली हॅूं। कुछ बातों के बाद फोन बंद किया और मैं अपनी आँखें बंद करके सीट से पीठ टिकाकर बैठ गयी।

मैनें देखा कि वह लड़की अपनी गोल गोल चमकती आँखों से मुझे देख रही थी, मुझे भोलेपन से निहारती हुई, उस वक्त वह बड़ी अपनी सी लगी थी। शायद अब वो मुझसे बात करने को इच्छुक लग रही थी ! समय बिताने को, मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाने से या फिर मेरी आत्मीयता से भरी बातों के कारण ! फिलहाल जो भी हो, मेरा भी मन उससे बात करने को करने लगा था।

आप भी लखनऊ जा रही हैं ! उसने मुस्कुराते कहते हुए बातचीत शुरू करने की पहल कर दी थी ।

हाँ । मैंने भी उसकी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुराकर देते हुए कहा।

चलो फिर तो हम दोनों का साथ आखिरी स्टेशन तक रहेगा, हैं न दी ।

 “हाँ !” मैने फिर मुस्कुराकर संक्षिप्त सा उत्तर दिया। अभी हम लोगों की ये छोटी मोटी बात ही शुरू हुई थी कि टी टी ने हमारे कोच में पदार्पण कर लिया।

उस लड़की को देखकर बोला, कौन सी सीट है तुम्हारी ? क्योंकि वह मुझे मेरी सीट दिखाकर गया था और वह लड़की मेरी सीट पर बैठी हुई थी। उसके कुछ न बोलने पर वह फिर बोला, टिकट दिखाओ ?

उस लड़की ने खड़े होकर अपनी जींस की जेब से टिकट निकाला और उसे दे दिया। टी टी टिकट को देखकर बोला, ये क्या है ? ये तो जनरल टिकट है, क्या तुम्हें पता नहीं ये रिजर्वेशन कोच है।

 वो भोला सा मुँह बनाकर उसकी तरफ देखती रह गयी ! उसे इस तरह मासूमियत से निहारते देखा, तो मुझसे न रहा गया और मैंने उसका बचाव करते हुए कहा, बैठा रहने दीजिये ! मेरी सीट पर ही तो बैठी है, कहाँ जाएगी अकेली तो है बेचारी !

मेरी बात सुनकर उसने कृतज्ञता से मुझे देखा और अपनी बोलती हुई काली काली आँखों से न जाने कितनी ही बातें कर ड़ाली मानों हर बात पर मेरा शुक्रिया कर रही हो !

अच्छा चलो ठीक है, 50 रु. दे दो, मैं सीट दे देता हूँ , कहाँ तक जाना है !

लखनऊ तक ! उसने घबराई हुई आवाज में कहा और मेरी ओर याचना भरी नज़रों से देखा ! उसकी बोलती हुई आँखें एक बार फिर मुझसे बतियाने लगी, जैसे वह कहना चाह रही हो ! दी, अब आप ही मुझे बचाओ, मेरे पास देने के लिए रु. नहीं aहैं ! अब मैं कहाँ से इनको 50 रु दूँ !

उसकी आँखों की भाषा पढते हुए मैंने टी टी से फिर कहा, मेरी सीट पर बैठी है बैठा रहने दोA क्या करेगी सीट लेकर ? अब लखनऊ दूर ही कितना रह गया है !

 मेरी बात सुनकर वह आश्वस्त तो नहीं हुआ फिर भी बिना कुछ कहे, शायद गुस्से से भरकर चला गया, वैसे देखा जाये तो उसकी नाराज़गी स्वाभाविक थी !

  खैर अब वह लड़की निश्चित होकर आराम से सीट पर बैठ गयी थी ! उसके चेहरे को पढते हुए मैंने जाना कि अब वह चिंता मुक्त होकर बैठी थी ! उसके चेहरे पर आते जाते सकून भरे भावों को पढकर मैं भी तसल्ली से भर गयी !

उसने अपने बैग से एक बार मोबाइल निकाला और उसे खोलने का उपक्रम किया किन्तु वह पूरी तरह से ड़िस्चार्ज हो चुका था फिर उसकी बैट्री निकाल कर हाथ से रगड़ कर दुबारा से ड़ाली पर मोबाइल ऑन नहीं हुआ ! वह उसे अपने बैग की चैन खोलकर उसमें रखने ही जा रही थी कि मैंने कहा, इधर प्लग लगा है चार्ज कर लो !

मेरे यह कहने पर बोली , दी, जल्दी जल्दी निकलने के कारण चार्जर रखना ही भूल गयी थी !

मेरे पास है देखो, अगर यह लग जाये तो ! मैंने उसे अपना चार्जर निकाल कर दिया !

उसके मोबाइल में वह लग गया और उसने उसे चार्ज करने को लगा दिया था

उसने फिर मेरी तरफ देखा ! लगा जैसे वह अपनी आँखों से अनेकों धन्यवाद कह रही हो !

सच में उसकी बोलती हुई सी आँखें बिना कहे ही सब कुछ कह देती थी, एक बार झांककर देखो, दुनियां जहाँ की बातें समाई सी लगती थी, वह मुझसे कुछ बात करना चाह रही थी किन्तु कोई झिझक उसे रोक रही थी ! तो मैंने उसकी आखों की भाषा को पढते हुए खुद ही बात शुरू कर दी !

क्या कर रही हो आजकल , मेरा मतलब पढाई !

जी, एच आर से एम बी ए ! फोर्थ सेमेस्टर है , कॉलेज की तरफ से इन्टरव्यू के लिए भेजा जा रहा है और भी बच्चे हैं ! वे कल रात निकल गये ! आज 9 बजे से शुरू हो जायेगा एग्जाम !

तो तुम भी रात निकल जाती !

लेकिन मेरा कोई जानने वाला या रिश्तेदार वहां नहीं रहता है ! तो रात में रुकने की मुश्किल हो जाती और घर से भी परमिशन नहीं थी ! वैसे भी आज पहली बार अकेले जा रही हूँ ! हमेशा भाई साथ जाता है, लेकिन उसका भी कोई काम निकल आया और उसे आज दिल्ली जाना पड़ गया !

अच्छा क्या करता है तुम्हारा भाई ?

अभी पापा के काम में हाथ बंटा रहा है, पापा की रेड़ीमेड़ कपड़ो की दुकान है !

चलो कोई बात नहीं आजकल तो लड़कियां बहुत स्मार्ट हो गयी हैं और फिर आज के रिशेशन के दौर में जॉब मिलना बहुत ही कठिन है , कॉलेज की तरफ़ से भेजा जा रहा है, ये अच्छी बात है ! आज कितने ही पढ़े लिखे और होशियार बच्चे बिना जॉब भटक रहे हैं !

हाँ दी , इसी लिए पापा ने जाने की परमिशन दे दी क्योंकि मेरा भाई भी अपना मनपसन्द जॉब नहीं पा सका, आज भी सर्च मार रहा है !

चलो तुम खूब अच्छे से करके आना और इस जॉब को अपनी झोली में ड़ालकर ही लाना !

हाँ ! थैंक्स दी !

मैंने देखा उसकी आँखों में आत्मविश्वास झलक आया था ! वाकई उसकी आँखों में जरुर कुछ येसा था, जो मुझे उनमे झाँकने को बार बार आकर्षित कर ले रहा था ! वह बिना कुछ और बोले उठी, और उसने चार्जर से मोबाइल निकाल लिया !

उसके चहरे के आते जाते भावों के साथ ही मैं उसकी उन उंगलियों को देखने लगी जो हरे रंग की नेल पॉलिश में बेहद खुबसूरत लग रही थी ! उसने अपनी नाजुक पतली छरहरी उँगलियों को मोबाइल पर फिराना शुरू कर दिया था ! चेहरे पर हर बार आते जाते, उतार चढाव ! कोई गहरी सोच में ड़ूबी हुई या मुस्कुराहट जैसे भावों से घिरी, वह कभी कभी कितने सकून से भरी जा रही थी ! उसकी बोलती हुई आँखों में झांकना मुझे बहुत सुखद लग रहा था ! मैं उसे लगातार अपलक निहार रही थी , सच में नवीनता हरेक को अपनी ओर खींचती है फिर चाहें वह अंकुरण में हो या फिर संतति में !

मुझे इस तरह अपनी ओर तकते देखा तो वह मेरी तरफ देखने लगी !

मोबाइल क्यों निकल लिया, अभी कुछ देर लगा रहने देती ! मैंने उससे कहा !

हाँ अभी लगा देती हूँ , उसने हलकी सी मुस्कुराहट से मुझे देखते हुए कहा !

मैं घर पर फोन कर रही थी और वह मुझे देख रही थी ! न जाने कैसा रिश्ता बन गया था हम दोनों के बीच, बिना एक दूसरे को जाने ही अपने से लगने लगे थे ! वाकई कोई जरुरी तो नहीं कि प्यार या अपनापन सिर्फ अपनों या जान पहचान वालों से ही हो, ये जुड़ाव तो किसी के साथ भी हो सकता है कहीं भी और कभी भी ! वह बच्ची सच में मुझे बिलकुल अपनी सी लग रही थी !

वह मुझसे बात करना चाह रही थी, और मैं फ़ोन पर बात करने में तल्लीन थी ! जब मैंने बाय कहकर फोन रख दिया तो देखा वह मुझे टकटकी लगाकर निहार रही है ! उसे अपनी ओर एकटक देखते हुए पाया, तो एक खूबसूरत सी स्माइल उसकी तरफ फेंकी ! उसने भी मेरी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुरा कर देने में तनिक भी देर नहीं लगायी थी ! शायद मोबाइल पास में न होने से वह बोर हो रही थी और मुझसे बात करना चाह रही थी या फिर वह सचमुच मुझे अपना समझ कर कुछ बातें करना चाह रही थी फिलहाल जो भी हो मुझे उससे बात करने का मन करने लगा था !

क्या नाम है तुम्हारा ! इतनी देर से साथ में बैठने के बाद भी मैं उसका नाम नहीं जान सकी थी !

गुलफिज़ा ! उसने मुस्कुराते हुए कहा

वाह ! वैरी प्रिटी नेम ! ! क्या यह मुसलमान है , लग तो नहीं रही ! मैंने मन ही मन में सोंचा !

और सुनों तुम्हारा नाम बिलकुल तुम्हारी तरह से ही प्यारा है !

यह सुनकर वह थोड़ा सा शरमा गयी थी !

दी, आप कहीं जॉब करती हैं ! उसने पूछा

हाँ !

कहाँ पर !

न्यूज़पेपर में !

वेरी एक्साटिंग जॉब ! आपको पता है दी, मेरा रुझान हमेशा से मीड़िया में ही जॉब करने का था ! मैं तो मॉस कॉम का कोर्स करने वाली थी, लेकिन घर वालों को यह जॉब पसंद नहीं थी, सो जबरदस्ती से मेरा एड़मिशन m b a में करा दिया ! यह घर वाले हमारी ख़ुशी क्यों नहीं चाहते ? कभी हमारी क्यों नहीं सुनते ? हमेशा अपनी ही चलाते हैं, क्यों नहीं जानना चाहते कि आखिर हम चाहते क्या हैं ?

उसकी बातें सुनकर मुझे लगा कि इस जरा सी लड़की के मन में अपनों के प्रति कितना गुबार भरा हुआ है !

चलो कोई बात नहीं जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है !

हाँ दी, यह बात तो आप ठीक कह रहे हो ! वैसे जो भी होता है उसमें हमारी कुछ न कुछ अच्छाई जरुर छुपी होती है !

हाँ गुल, और हमारे घर वाले कोई हमारे दुश्मन थोड़े ही होते हैं, वे तो हमारा भला ही सोचते हैं !  

जी हाँ, दी ! कहकर वह हौले से मुस्कुराई !

मुझे उसकी मुस्कान बेहद भली लगी, जो उसकी आँखों से भी झाँक रही थी, कुछ रहस्य उसने अपने मन में छुपाये हुए लग रहे थे, जिन्हें वह मुझसे बाँट लेना चाह रही थी  !

हाँ गुल, जो होना होता है सब कुछ उसी के हिसाब से होता चला जाता है ! हमारी लाख कोशिशें भी उससे ड़िगा नहीं पाती !

वह मेरी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी !

दी, आप लिखती भी हैं रायटर हैं न ?

हाँ, न्यूज़ पेपर में जॉब करती हूँ तो लिखना पढना चलता ही रहता है !

दी, मैंने आपकी कहानी एक पत्रिका में पढ़ी थी !

मुझे याद आया, हाँ कुछ समय पहले मेरी एक कहानी छपी थी !

हाँ, कभी कभार कोई कहानी भी लिख लेती हूँ !

दी, आप तो सभी कुछ लिखती हैं तो यह बताइए कि आपको धर्म जाति में कितना विश्वास है !

मैं सिर्फ इंसानी रिश्तों और मानवता में विश्वास करती हूँ ! ये धर्म जाति मुझे नहीं लुभाते ! ये सब हम लोगों के द्वारा ही तो बनाये गये हैं ! एक ही शक्ति है और सब एक में ही निहित है !

मेरी इस बात को सुनकर उसके मन में सैकड़ों सवाल थे जो उसकी बोलती आँखों से झांक कर चुगली करने लगे थे ! वह मुझसे बहुत कुछ कहना चाह रही थी ! पर कोई झिझक सी उसे कहने से रोक दे रही थी !

उसकी झिझक तोड़ते हुए मैंने कहा, कुछ कहना चाहती हो ? मुझसे कुछ पूछना चाहती हो ? तो बेधड़क मुझसे कह सकती हो !

 हाँ दी, मुझे बहुत कुछ जानना है ? पूछना है ? और मुझे पता है कि एक आप ही हो, जो मेरे सारे सवालों के जवाब दे सकती हो ! उसकी आँखों में मेरे लिए विश्वास का सागर गोते लगा रहा था !

इतना भरोसा मुझ पर !अभी हमें मिले देर ही कितनी हुई है ! मैंने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, अच्छा चलो पूछो, क्या कहना चाहती हो ? दिल खोलकर सब कह ड़ालो ! लगा कुछ तो है उसके दिल में,, शायद बहुत कुछ है ! जिसकी झलक उसकी बोलती हुई आंखें दे रही थी !

आई एम इन लव , वह बेझिझक मुझसे बोल पड़ी !

सच में प्यार कितनी शक्ति दे देता है ! जब प्यार बहुत गहरा हो तो इन्सान को एकदम निड़र बना देता है ! मैंने उसकी आँखों में झाँका, निर्दोष मासूम कोई छल या झूठ का नामोंनिशान नहीं था ! हाँ वह सच कह रही थी !

जब वह हमारे कोच में दाखिल हुई थी तभी मुझे अहसास हुआ था, लेकिन आजकल के बच्चे प्रेम को गलत रूप में परिभाषित करते हैं ! जब तक काम है ठीक, फिर दूध से मक्खी की तरह निकल कर फेंक देते हैं ! वे उसकी अहमियत को नहीं समझ पाते हैं ! लेकिन उसे सच का ही प्यार हुआ था ! तभी देखो कैसे तप कर सोने सी निखर आई थी !

मैंने उसकी आखों की सच्चाई को जानकर कहा, तो क्या हुआ ? ये उम्र ही ऐसी होती है, जब प्यार होना स्वाभाविक है ! फिर ये उदासी कैसी और क्यों ?

क्योंकि मेरा प्यार पूरा नहींं हो सकता ! मैं उसे पा नहींं सकती ! अधूरा ही रह जायेगा, बस यही सोंच कर हर समय उदासी छाई रहती है !

क्यों अधूरा रहेगा भला, जब प्यार सच्चा होता है तो वह अपनी राह स्वयं खोज लेता है ! मिलन होकर ही रहता है ! हाँ ये सच है अगर तुम दिल से मिलन की चाह रखोगी, तो तुम्हें कोई रोक नहीं पायेगा !

दी आपको पता है कि उसका नाम सुमित है और मेरा गुलफिज़ा !वह हिन्दू, हम मुस्लिम ! हमारे धर्म अलग हैं, समाज हमें एक नहीं होने देगा ! जब हमारे पापा को पता चलेगा, तो वे मुझे जीते जी मार देंगे ! नहीं मानेंगे, वे कभी भी नहीं मानेगे ! यह कहते हुए उसकी आँखों से आंसू छलक आये थे !मासूमियत और भोलेपन से लबरेज उसके आंसू मुझे भीतर तक हिला गये थे ! वे बहते हुए आंसू उसके पवित्र प्रेम की निशानी लग रहे थे !

मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए ढाढस बंधाया !

गुल, इस तरह रोकर खुद को कामजोर मत करो ! अभी तुम्हें बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी है ! खुद को संभालो ! सब कुछ येसे ही चलने दो, बहने दो नदी सा जीवन को, देखना एक दिन सब कुछ बहुत आसान हो जायेगा ! मेरी बातों से कितनी हिम्मत भर आई थी उसके अंदर, ये उसकी आँखों से झलक रहा था !

हाँ दी, सुमित भी यही समझाता है ! बहुत प्यार करता है वह मुझे ! बहुत अच्छा है वह ! मैं उसके साथ बहुत खुश रहुंगी ! जितना मैं उसके लिए पज़ेसिव हूँ, वह भी मेरे लिए उतना ही पज़ेसिव है !

मैं उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी ! आँखे कैसे चमक उठी थी ! चेहरा कुछ और निखरा हुआ लगने लगा था !

और दी मैंने सुना है किसी के लिए पजेसिव होना सच्चे प्यार की निशानी है न ! उसने मेरी तन्द्रा तोड़ते हुए कहा !

ये कहते हुए उसकी आँखों में प्यार की चमक के साथ आत्मविश्वास भर आया था !

हाँ , मैंने संछिप्त सा उत्तर दिया था, क्योंकि मैं उसके चेहरे पर बढ़ आई रौनक को किसी भी कीमत पर कम नहीं करना चाहती थी !

अनेकों प्रश्न जो उसके दिमाग में कुलबुला रहे थे वे काफी हद तक शांत हो चुके थे ! अब लखनऊ आने वाला ही था !

उसने मुझे शुक्रिया करते हुए कहा, दी, मैं आपको कभी नहीं भूलूंगी, हमेशा याद रखूंगी, लेकिन हम फोन नं. का आदान प्रदान नहीं करेंगे ! हम पहले की तरह से अजनबी तो नहीं रहे, लेकिन हाँ मिलेगे नहीं, क्योंकि हमारा राज आपके पास तक ही सीमित रहे ! आपकी जो जगह मेरे दिल में बनी है, वह ताउम्र बनी रहे !” उसने मुझसे खूब गर्मजोशी से हाँथ मिलाया और कहा, “ हो सकता है दी, हम फिर कभी यूँ ही कहीं मिल जाएँ क्योंकि दुनिया तो गोल है न !”

हाँ क्यों नहीं ! मैंने उसकी आत्मविश्वास से चमकती आँखों में देखते हुए कहा !

  दी, क्या सच में हमारे प्यार के बीच धर्म आड़े नहीं आएगा ? क्या पापा मान जायेंगे ? उसके मन में एक बार फिर आशंका घिर आई थी ! किसी अपने को पाने के लिए या उसके करीब रहने के लिए हमारा मन हमेशा आशंकाओं से घिरा रहता है !  

 “तुम खुद पर विश्वास करना शुरू कर दो, बाकी सब उस ऊपर वाले पर छोड़ दो, बहने दो जीवन को अपनी तरह से !” मैंने उसे एक बार फिर से समझाया था, “देखना सब ठीक ही हो जायेगा ! ये आत्मविश्वास जो तुम्हारे मन में आया है न उसे किसी भी कीमत पर कम मत होने देना यही तुम्हें जीत की राह पर ले जायेगा !

ट्रेन सरकते हुए रुक गयी थी ! हम लोग अपनी मंजिल तक पहुँच कर बाय करके एक दुसरे से जुदा हो गए थे ! वह चली गयी थी और छोड़ पीछे थी अनगिनत सवाल ! मैंने उसे तो सांत्वना दे दी थी लेकिन वही सवाल मुझे तंग कर रहे थे ! क्या सब कुछ उतना ही आसान है जितना कि कह देना ! कितने भी बदलाव हो जाएँ फिर भी समाज वैसा ही रहता है, हर बार वही लड़ाई लड़ी जाती है ! हर बार हरेक को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होती है !

क्या पापा मान जायेंगे ? यह सवाल और उसका सशंकित चेहरा व आँखें मेरा पीछा करते रहे थे ! फिर जीवन की आपा धापी में सब भूलने लगी थी !

जीवन इसी का नाम है, जो कर्तव्यों के कारण यादों को धूमिल कर देता है !

जब उस दिन सुबह दरवाज़े के पास पड़़े अखबार को उठाया तो सबसे पहलेएक और समूहिक बलात्कार

एक मुस्लिम लड़़की के साथ हिन्दू लड़़के ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर बलात्कार किया ! उसको अपने फॉर्म हाउस में बहाने से बुलाया ! वह प्यार करती थी उससे लेकिन लड़़के ने दगा दे दिया और उसके विश्वास को तोड़़ दिया ! पहले तो ख्वाब दिखाये फिर उन्हीं ख्वाबों को अपने और दोस्तों के लिए येश की सेज सज़ा दी ! अब वही कट्टर मुस्लिम बाप जो बेटी की दूसरे धर्म में शादी के खिलाफ था, उसे मौका मिल गया था शायद, या सच में एक दुखी बाप की स्थिति में था जो पुलिस चौकी पर भूख हड़़ताल पर बैठ गया था कि जब तक मुजरिम न पकड़़े जाएँ वो यहाँ पर येसे ही बैठा रहेगा !

वे लड़़के कांड़ करके फरार हो गये थे, और पुलिस अपने हिसाब से काम कर रही थी ! हालाँकि अभी लड़़की होश में नहीं थी जो स्थिति स्पष्ट हो !

क्या आज जीवन की यही सच्चाई बन गया है ? क्या सामाजिक मूल्य अब ख़त्म हो गये हैं ? इंसानियत या प्रेम का मतलब नहीं बचा ? सब कुछ सेक्स या हवस तक ही सिमित हो गया है ? क्या सच्चाई और विश्वास की कोई कीमत ही नहीं बची ? उन लड़़कों के साथ क्या वो बाप गुनाहगार नहीं जो अपनी बेटी की खुशियों में उसके साथ खड़़ा नहीं हो सका था ?

 न जाने कितने ही अनगिनत सवाल मेरे मन में उथल पुथल मचाने लगे ! इस घटना को पढकर मैं सन्न रह गयी मुझे काटो तो खून नहीं ! इस तरह की न्यूज़ तो हमेशा ही अख़बारों में होती हैं रोज ही पढती हूँ फिर ये आज इतनी बैचैनी क्यों ? कहीं ये गुलफिज़ा तो नहीं ? पूरी न्यूज़ एक स्वांस में पढ गयी, कहीं किसी का नाम नहीं ! सुमित और गुलफिज़ा को कई कई बार पढकर ढूढ़ लिया लेकिन कहीं पर नहीं ! न जाने वह किस घर की गुलफिज़ा होगी ? या शायद ये वही तो नहीं, उसकी वे बोलती आँखें सच्चाई और प्रेम से भरी हुई जो मुझसे कह रही थी, वो बहुत प्यार करता है मुझसे ! पज़ेसिव है वो मेरे लिए ! उस दिन से अब हरेक चेहरे में उसी को ढूढ़ने लगती हूँ क्यूंकि मैं उन आंखों का विश्वास आज भी कायम देखना चाहती थी जो जिंदगी जीना चाहती थी।


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