सुरीली

सुरीली

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सुरीली के पिता पंडित दीनानाथ राजनीति का जाना पहचाना नाम है परन्तु इन दिनों पता नहीं क्यों सुरीली रुद्रेश को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती है, ये बात जब पंडित दीनानाथ जी को पता चलती है तो वे सुरीली के राजनीति में जाने का ख़्वाब रुद्रेश के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं एक तो इस समय जनता की सहानुभूति भी उसके साथ है दूसरे वे सुरीली को राजनीति के गंदे माहौल में अकेले भेजना नहीं चाहते थे। 

इधर सुरीली को जब अपने पापा की मन्शा का पता चलता है तो वह ख़ुशी से झूम उठती है उसे इस बात का विश्वास ही नहीं होता है कि पापा को मनाये बिना ही वे उसके प्यार को स्वीकार कर लेंगे। आज उसे अहसास हो गया था कि सच्चा प्यार हर हाल में मिलकर रहता है भले ही राह में कितनी भी कठिनाई आयें लेकिन मंज़िल अवश्य मिलती है .... उसकी तपस्या का फल उसे ज़रुर मिलेगा रुद्रेश और वह एक दूसरे के लिए ही बने हैं। 

वह कमरे में आती है वहां पर रुद्रेश न जाने किन ख़यालों में खोया हुआ था वह उसे आवाज़ लगाती है , “ रुद्रेश !”

 लगभग चौंकते हुए वह कहता है, “ हाँ सुरीली तुमने कुछ कहा ?”

“ आज किन ख्यालों में खोये हुए हैं महाशय ?”

 “अरे यार, कुछ नहीं बस यूँ ही !”

 “अच्छा तो अब आप मुझसे भी छुपायेंगे !”

 “सुरीली तुम ऐसे नहीं मानोगी न !”

 “हाँ आप तो जानते ही हैं मैं कहाँ मानने वाली !”

 “ मैं उन ख्यालों में खोया था कि हमारे मिलने में और एक हो जाने में कितनी मुसीबतें पैदा होंगी, हैं न सुरीली ”

 “आप तो मुझे सच्चा प्यार करते हैं फिर क्यों फ़िक्र होती है आपको ?”

 “हाँ सुरीली, सच्चा प्यार ही करता हूँ तभी तो डरता हूँ क्योंकि आज तक कभी भी सच्चे प्यार की जीत नही हुई है, उनकी राह में अनेकों बाधायें आने के बाद भी, समाज उन्हें एक ही नही होने देता है। 

 “ तो जनाब अब आप इस बात की चिंता करना छोड़ दीजिए, हमारा प्यार मिलकर रहेगा। 

 “अच्छा वो कैसे ? क्या तुम्हारे पापा आसानी से मान जायेंगे ?”

 “अरे आप बिलकुल भी फ़िक्र छोड़ दें और मुझ पर व मेरे प्यार पर यकीन करें, क्योंकि पापा बिना मनाये ही, हमारे बारे में सोचने लगे हैं ” सुरीली ने मुस्कुराते हुए कहा। 

“क्या तुम सच कह रही हो सुरीली ?” रुद्रेश के उदास चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी थी !

 “हाँ जी यही सच है अब हमारे मिलन की मंज़िल दूर नहीं ”

 रुद्रेश ने आगे बढ़ कर सुरीली को गले से लगा लिया, आज उन दोनों की आँखों में ख़ुशी के आँसू छलक आये थे, उन्हें अहसास हो गया था वे मिलकर राजनीति में आने के सपने को भी साकार करेंगे और अपने सपने को नयी ऊंचाईयों तक पहुँचाते हुए देश के प्रति अपने कर्तव्यों को भी बखूबी निभाएंगे। 

सुरीली , रुद्रेश के गले लगकर उसे महसूस करते हुए उसमें खोती जा रही थी और रुद्रेश सुरीली को इस तरह अपने से चिपकाये हुए था मानो उसे खुद से अलग ही नहीं करना चाहता हो।  उसी समय बाहर से दीनानाथ जी की आवाज़ सुनायी दी , “सुरीली !”

वह झटके से रुद्रेश से अलग होती हुई बोली “ पापा बुला रहे हैं, अब हमें इस तरह छुप कर मिलने की जरूरत ही नहीं रहेगी।  हम जल्द ही एक हो जायेंगे सबकी सहमती से !”

यह कहती हुई वह दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गयी, और रुद्रेश अपनी आँखों में दुनिया भर का प्यार समेट कर उसे देखता रह गया !


 

 


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