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Bhawna Kukreti Pandey

Drama

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Bhawna Kukreti Pandey

Drama

कन्हैया और छुट्टी

कन्हैया और छुट्टी

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मैं एक सरकारी प्राथमिक स्कूल मे शिक्षिका हूँ।मेरे ग्रामीण परिवेश के इस स्कूल की खूबसूरती की सुबह-सुबह कुछ बच्चे आपके स्कूल पहुंचने से पहले ,काफी पहले स्कूल के गेट पर चढे-लटके दिखेंगे और आपको आता देख तुरंत ही आपकी तरफ दौड़ेंगे। आपके चरण स्पर्श करेंगे,भले आप उनके चरण स्पर्श की होड़ मे हर दिन उन पर गिरते-गिरते बचें। फिर आपके हाथ मे जो भी होगा पर्स या मिड डे मील का समान वे "गुड मॉर्निंग मैम " बोलते हुए ,लगभग छीनते हुए वापस स्कूल के गेट पर भागेंगे। इन्ही प्यारे नटखट बच्चों मे से है मेरी आज की कहानी का मुख्य किरदार ,पांच बहनों का सबसे छोटा लाडला भैया, "कन्हैया" वो सात साल का ,मेरी कक्षा मे पढता है। बातूनी और होशियार है, बहुत सवाल पूछता है।जल्दी-जल्दी मे अक्सर मुझको "मम्मी" कह कर झेंप जाता है। 

खैर, कन्हैया और उसकी उम्र के बच्चे रोज स्कूल आयें ,घर ऐसे ही न रुक जायें इसके लिये मैडम और हमने एक खेल किया है । कभी भी लम्बी छुट्टी जाने से पहले सबको अपनी मैम को पहले बताना होगा, या खुद या मम्मी पापा आ कर बताएं नही तो आने के बाद खेलने को खिलौने और पढ़ने को सुन्दर-सुन्दर, रंग बिरंगी फोटो वाली बड़ी-बड़ी किताबें नही मिलेंगी!!! और आज तो गावँ मे शादी है मगर कन्हैया कल रात ही नाना के घर से लौटा है। गाँव मे खूब बड़ी दावत होगी, जोर की आवाज वाला डीजे भी लगेगा। गाँव का हर बच्चा इंटरवल के बाद दावत खाने जायेगा भी, मगर कन्हैया?! वो कैसे जा पाएगा ?उसने तो मैडम को पहले से बताया भी नही है!! तो क्या वो स्कूल मे अकेला रहेगा ?! सब मजे करेंगे और वो !!! अब क्या करे कन्हैया ?! 


इंटरवल खतम हो गया ।लगभग सारे बच्चे जा चुके, कन्हैया का दोस्त वसुदेव भी अपना बसता समेट रहा था। कन्हैया, वसुदेव से बोला

"यार मैं कैसे दावत छेकुंगा ?"

"तू अपनी मैम जी से बोल।" वसुदेव ने अपनी किताब डेस्क पर से बैग मे डाल ली और बसता काँधे पर टांग लिया ।

"चुप चुप चुप मैम जी सामने बैठी हैं।",कन्हैया ने उसके मुह को अपनी दोनो हथेलियों से दबाते हुए कहा। 

मगर वसुदेव ने झट उसका हाथ हटाया और जोर से जल्दी-जल्दी बोला

" मैम जी, मैम जी कन्हैया को भी दावत मे जाना है।" 

कन्हैया सकपका गया। नीची आँखें कर कन्खियों से मुझको को चोरी-चोरी देखने लगा।

"कन्हैया क्या बात है बेटू ? इधर आओ।"

कन्हैया सीट छोड़ कर मेरे पास आ गया ।मैने उसे अपने करीब लेते हुए पूछा "दावत मे जाना है ?!" 

"जी" उसने शर्माते हुए कहा।"

फिर तो अब मैडम के पास चलना पड़ेगा,चलोगे?" उसने हामी मे सर हिलाया। 

कन्हैया को ऑफिस के बाहर रोक कर अन्दर जा कर मैने मैम को सब बता दिया था की कैसी उलझन मे मासूम कन्हैया पड़ा हुआ है। मैम ने उसे अन्दर बुलाय।

"हाँ कन्हैया। क्या बात है ?" 

बड़ी मैडम ने पूछा। कन्हैया मेरे पीछे छुपा खड़ा अपने जूतों को देखे जा रहा था।

"आगे आओ कन्हैयाऽऽऽऽ।" मैडम ने थोड़ा अधिकार से कहा।

कन्हैया सामने आ आया। अब मुझे और मैडम को थोड़ी शरारत सूझ गई। मैडम ने मुझे इशारा सा किया। 

"मैम जी मुझे छुट्टी चाहिये।"कन्हैया ने बड़े भाव से बोला। 

"हम्म, छुट्टीऽऽ" मैडम ने कन्हैया को उपर से नीचे तक देखा। 

कन्हैया को ऑफिस की खिडकी से वसुदेव स्कूल के गेट तक पहुंचता दिखा।उसके चेहरे पर तेजी से कई भाव आने-जाने लगे। मैडम फिर कुछ पल को झूठ मूठ अटेनडन्स देखने लगीं।

" कैसे जाओगे कन्हैयाऽऽ? मैम ? कन्हैया ने क्या आपको पहले सूचना दी थी ?" 

कन्हैया ने तुरंत ही मेरे चेहरे की ओर देखा। 

बाप रे ! कन्हैया की बड़ी-बड़ी गोल आँखों मे फ़ौरन आँसू भर आए।इस से पहले मैं कुछ कहती मैडम बोली

"नहीं बताया होगा, कल तो ये ऐब्सेंट था ! है न कन्हैया !"

कन्हैया अपने होंठों को गोल गोल कर कुछ बोलना चाह रहा था मगर शायद उसका गला रुंधे जा रहा था।

"कोई बात नही मैडम कन्हैया अच्छा बच्चा है। इसे जाने देते हैं।"

"ऐसे कैसे जाने दे भाई, नियम तो नियम है ?" 

अब कन्हैया ने दोनो हाथों से आँसू पोछे। उसके मासूम से चेहरे पर थोड़ी नाराजगी का भाव आने लगा।

"मैम अब तो कन्हैया को 100 रुपये देने पर ही छुट्टी मिलेगी !" मैडम ने थोड़ा भंवे उठाते बोला।

" नहीं ,100 रुपये तो नहीं है।" बड़ी दृढ़ता से कन्हैया बोला और बाहर निकल कर जाने लगा । मैडम जोर जोर से हसने लगीं,कन्हैया के लिये टॉफ़ी देते हुए बोली "भेज दो मैम।" 

मैंने भाग कर उसे अपनी गोदी मे उठा लिया और गोल घूमा दिया उसे एक पल को कुछ समझ नही आया लिया।थोड़ा दुलार कर टॉफ़ी दी और कहा-

"जाओ, जाओ, जल्दी जाओ नही तो खाना नही बचेगा।"

" सच में खाना नही बचेगा? !" 

मैने जल्दी जल्दी हाँ मे सर उपर नीचे हिलाया।

अगले ही पल बैग को कान्धे पर संभालता, दौड़ता कन्हैया आवाज दे रहा था

"वसुदेऽऽऽव रूक्क्क्क, मैं आयाऽऽऽऽऽ।"


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