“खुद के लिए उड़ान (4)"
“खुद के लिए उड़ान (4)"
उसी दौरान, उसकी नज़र अचानक डॉक्टर के चेंबर की ओर चली गई। वहाँ से निकलते हुए उसने देखा—अजय! अजय किसी गर्भवती महिला के साथ बाहर आ रहा था। उसकी आँखें तुरंत वहीं ठहर गईं, जैसे समय एक पल के लिए रुक गया हो। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा, और वह भीतर से टूटने लगी। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।
वह बिना कुछ सोचे-समझे तेजी से रिसेप्शन की ओर बढ़ी। उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन उसने हिम्मत जुटाकर वहाँ खड़ी रिसेप्शनिस्ट से पूछा, "अभी जो व्यक्ति डॉक्टर के चेंबर से बाहर निकला है, उनके बारे में बता सकती हैं?"
रिसेप्शनिस्ट ने बड़े आराम से कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर डाली और कहा, "यह मिस्टर अजय हैं। ये अपनी पत्नी का चेकअप कराने आते रहते हैं। इनकी पत्नी छः महीने की गर्भवती हैं।"
वह जैसे एक पल में ही टूट गई। अजय, वही अजय, जिसने कभी उसके साथ सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई थीं, अब किसी और के साथ था। उसकी पत्नी गर्भवती थी। वह कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध खड़ी रही, उसकी आंखों के सामने धुंधलापन छा गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ। जिस अजय से उसने प्यार किया, जो कभी उसका सब कुछ था, वह अब किसी और के जीवन का हिस्सा था।
वह धीरे-धीरे पीछे हट गई, मानो उसकी टाँगे खुद से चलने से मना कर रही हों। मन में अनेकों सवाल उठ रहे थे, परंतु जवाब कहीं नहीं मिल रहे थे। उसे समझ आ गया था कि अजय अब पूरी तरह से आगे बढ़ चुका है, और वह केवल अतीत का एक अधूरा अध्याय बनकर रह गई है।
वह रिसेप्शन से पीछे हटकर धीरे-धीरे अस्पताल के गलियारे से बाहर निकल आई, लेकिन उसके दिमाग में अभी भी वही दृश्य गूंज रहा था—अजय, किसी और के साथ। उस गर्भवती महिला के चेहरे की शांति, अजय की आँखों में दिखता सुकून, ये सब उसके भीतर गहरे जख्म की तरह उतर गए थे। बाहर आकर वह अस्पताल के बगीचे के पास एक बेंच पर बैठ गई। उसकी आँखें आंसुओं से भरी हुई थीं, लेकिन वह रो नहीं रही थी। ऐसा लगा जैसे उसके भीतर का सब कुछ सूख चुका हो।
उसके मन में अतीत की परतें फिर से खुलने लगीं। वह याद करने लगी, कैसे उसने अजय के साथ अपने भविष्य की योजनाएँ बनाई थीं, कैसे उसने उसे अपने जीवन का केंद्र बना लिया था। अजय का प्यार कभी उसकी दुनिया था, और अब वह दुनिया एक झटके में बिखर गई थी।
अचानक उसे एहसास हुआ कि उसकी चचेरी बहन के लिए वह यहाँ आई थी, लेकिन अब उसका यहाँ रुकना मुमकिन नहीं था। वह बेंच से उठी और अपनी कार की ओर बढ़ी, मानो अस्पताल की दीवारें भी उसे घुटन देने लगी हों। वह कार में बैठी, लेकिन कार स्टार्ट करने से पहले उसने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखों से बहते आंसू अब रुक नहीं पा रहे थे। वह अपनी सीट पर झुकी और जोर-जोर से रोने लगी, जैसे उसके भीतर का सारा दर्द एक बार में बाहर आ जाना चाहता हो।
कई मिनटों तक वह वहीं बैठी रही, बस रोती रही। फिर धीरे-धीरे उसने खुद को संभाला। आँसू पोंछे, चेहरे पर हाथ फेरा, और खुद से कहा, "अब बस।" उसने अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश की, लेकिन दिल में उठते दर्द को रोकना आसान नहीं था।
अस्पताल से बाहर निकलते समय उसके दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था: "क्या यह वही अजय था जिसे उसने कभी बेइंतहा प्यार किया था?" जवाब शायद वह पहले से जानती थी, लेकिन उसे स्वीकारना उतना ही कठिन था।
उसे अब यह बात समझ आ गई थी कि अजय का जीवन अब पूरी तरह बदल चुका है। वह अपने नए जीवन में खुश था, और वह अतीत का हिस्सा बन चुकी थी। शायद उसने कभी उसे खोने का दुख महसूस ही नहीं किया। परंतु वह जान गई थी कि उसे अब उस अतीत को छोड़कर अपने जीवन में आगे बढ़ना होगा।
दिल अभी भी दर्द से भरा हुआ था, लेकिन अब उसके पास एक नई स्पष्टता थी। उसे एहसास हुआ कि अजय के बिना भी, उसे अपनी ज़िंदगी की दिशा खुद तय करनी होगी। वह सिर्फ किसी की पत्नी या प्रेमिका नहीं थी, वह खुद भी एक इंसान थी, जिसकी अपनी इच्छाएँ और सपने थे।
उसने अपनी कार स्टार्ट की और रास्ते में खुद से एक वादा किया: "अब अतीत का बोझ और नहीं ढोऊंगी।" इस एहसास के साथ, उसकी आँखों में हल्की सी चमक आई, और उसने अपनी कार को एक नई दिशा की ओर मोड़ लिया।
वह यह सब सुनकर स्तब्ध रह गई, मानो उसके शरीर से सारी जान निकल गई हो। उसकी सांसें तेज हो गईं, जैसे दिल ने एक बार में ही कई धड़कनें लेना शुरू कर दिया हो। हर शब्द उसके मन में एक तीर की तरह चुभ रहा था।
उसकी आँखों के सामने अजय की तस्वीर तैरने लगी। वह उसे याद आया, जब उन्होंने अपने रिश्ते की बुनियाद रखी थी। अजय का वह आश्वासन, जिसमें उन्होंने कहा था, "हम दोनों हमेशा एक साथ रहेंगे, जब भी जरूरत पड़ेगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।" यह सभी वादे अब उसकी आँखों के सामने धूमिल हो चुके थे।
गुस्से की लहरें उठने लगीं, और उसके दिल में अजय के प्रति नफरत का एक नया एहसास जन्म लेने लगा। उसने अजय पर बेहद गुस्सा आया। वह याद करने लगी कि जब वह अजय से उनके भविष्य के बारे में, खासकर बच्चे के बारे में बात करती थी, तो वह हमेशा उसे टाल देता था।
"अभी हमें बेबी के बारे में नहीं सोचना चाहिए," अजय का वह ठंडा स्वर उसे अब और भी चुभने लगा। "हमारे पास अभी बहुत कुछ करने को है, अभी सही समय नहीं है," उसकी बातें अब मानो उसके खिलाफ एक दलील बन गई थीं।
उसे एहसास हुआ कि अजय ने उसे हमेशा इन बातों से दूर रखने की कोशिश की थी, और अब वही अजय, जो उसके सपनों को कुचलता रहा, किसी और का पति बनकर बाप बनने जा रहा था। यह सोचते ही उसके मन में एक गहरी निराशा घेरने लगी।
उसके मन में गुस्से के साथ-साथ एक कड़वा सच भी उभरने लगा। क्या वह सच में कभी उसके लिए मायने रखती थी? क्या अजय ने कभी उसके सपनों को गंभीरता से लिया था? उसकी आत्मा में एक ठेस लगी, और उसने सोचा, "क्या मेरा प्यार इतना सस्ता था कि उसे किसी और के लिए बेच दिया गया?"
वह अपने मन के इस द्वंद्व को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उसे महसूस हुआ कि अजय ने उसे कभी भी अपने साथ नहीं समझा। उसकी आँखों में अब आंसू थे, लेकिन उसने उन्हें रोकने का प्रयास किया। वह खुद को यह समझाने की कोशिश कर रही थी कि उसे अजय की परवाह नहीं करनी चाहिए, लेकिन उसकी भावनाएं उसके मन में लहरें उठाने लगीं।
इस सब के बीच, उसे अपने आत्म-सम्मान का एहसास हुआ। उसने ठान लिया कि वह अब अपने जीवन को एक नई दिशा देगी। अजय की हर बात, उसकी हर धोखाधड़ी अब उसे मजबूत बनाने वाली थी। उसे खुद पर विश्वास करना था, और अपनी पहचान को फिर से खड़ा करना था।
उसने अपने दिल को समझाया, "मैं अकेली नहीं हूँ। मुझे अपने लिए जीना है, और आगे बढ़ना है।" यह सोचते हुए उसने अपने गुस्से को नियंत्रित किया और खुद को यह यकीन दिलाया कि वह किसी और पर निर्भर नहीं रहेगी। अजय का एक नया जीवन शुरू हो रहा था, लेकिन उसका जीवन भी अब एक नई शुरुआत की ओर बढ़ रहा था।
