खोया खोया चांद
खोया खोया चांद
चांद "अमावस" से मिलकर आ रहा था। बड़ा उदास। अनमना सा। खोया खोया सा। चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। बाल बिखरे हुए थे। आंखें निस्तेज। होंठ सूखे हुये। सारा बदन लकवे की तरह कंपकंपा रहा था। मरी मरी सी चाल थी बहका बहका सा हाल था। क्या हो गया इस चांद को ? किसकी नजर लग गई थी इसे, लाख टके का सवाल था।
चलते चलते हमसे टकरा गया वह। हमने कहा "अरे चांद महाराज ! ये क्या हाल बना रखा है ? तुम्हारी बीवी "चांदनी" ने बेलन वेलन छोड़ दिया था क्या तुम्हारे ऊपर ? तुम जो "करवा चौथ" पर इतने भाव दिखा रहे थे। बादलों के संग आंखमिचौली खेलकर सुहागिन स्त्रियों को भूखा मारकर आनंदित हो रहे थे। "पूर्णिमा" के संग "रास रचाते" हुये कहीं चांदनी भाभी ने पकड़ तो नहीं लिया तुम्हें " ?
हमारी बातें उसे बड़ी सुहानी सी लगीं। जैसे मुर्दे में जान आ जाती है वैसे ही चांद में भी जान आ गयी। अब यह जान पूर्णिमा का नाम लेने से आई या हमारी सुहानुभूति से , यह हमें आज तक पता नहीं चल पाया है। मगर इतना अवश्य जानते हैं कि पूर्णिमा का नाम लेते ही चांद का मुख दीप्ति से दमकने लगता है।
चांद कहने लगा " जब भी मैं पूर्णिमा के आगोश में होता हूँ तो ऐसा लगता है कि मैं जन्नत की सैर कर रहा हूँ। पूर्णिमा का साथ पाकर मेरा चेहरा निखर जाता है और मैं अपने आपको जवान महसूस करता हूँ। मेरे अंग अंग से श्रंगार रस टपकने लगता है। संगीत की मधुर स्वर लहरियां सी बहने लगती हैं। पांव अपने आप ही थिरकने लगते हैं। पूर्णिमा की आभा से मेरा मान और बढ़ जाता है। लेकिन जग को मेरा पूर्णिमा से मिलना अच्छा नहीं लगता है। इसलिए षडयंत्र करके मुझे पूर्णिमा से दूर करने के जतन किये जाते हैं। माना कि चांदनी मेरी पत्नी है। मुझे इससे कब इंकार है ? मैं उसे अपने साथ हमेशा रखता तो हूँ। पूर्णिमा से तो महीने में केवल एक दिन ही मिलता हूँ। मगर लोग हैं कि जबरन बखेड़ा खड़ा कर देते हैं और पूर्णिमा से मिलने के दंड स्वरूप मुझे एक दिन "अमावस" के घर में बंद कर देते हैं। मेरा दम घुटता है वहां पर। मुझे अमावस बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती है। उसके सानिध्य में मुझे ऐसा लगता है कि मेरा अस्तित्व उसमें सिमट गया है। मेरी सारी कांति गायब हो जाती है। तब मैं अपने आपको बहुत असहाय सा पाता हूँ। अब आप ही बताओ मैं खोया खोया नहीं रहूं तो और कैसे रहूं" ?
मुझे उम्मीद नहीं थी कि चांद इतना दुखी निकलेगा। हम तो उसे दुनिया का सबसे सुखी आदमी मान रहे थे। चूंकि सारी सुंदरियां उसकी चहेती हैं। उसके इंतजार में घंटों छत पर खड़ी रहती हैं। उसके दर्शन पाकर निहाल हो जाती हैं। तब हमें चांद से ईर्ष्या होने लगती है। काश हमारे लिये भी कोई छत पर घंटों ना सही दो चार मिनट तो इंतजार करती ? मगर हाय रे फूटी किस्मत ! कोई सपने में भी इंतजार नहीं करती है। आज जब चांद की व्यथा सुनी तब दिल को बड़ा सुकून मिला। हम जिन्हें आराम में समझते हैं लेकिन जब उन्हें गम में डूबा पाते हैं तो दिल को आराम सा आता है।फिर दोनों दुखी आदमी अपने गमों का मातम मनाते हैं।
हमने चांद की पीठ थपथपाई और कहा " चांद भाई, आप महीने में एक दिन पूर्णिमा से मिलते हो न , तो ये उसी का दंड है। आप पूर्णिमा से मिलना छोड़ दो तो फिर तुम्हें अमावस से भी मुक्ति मिल जायेगी "।
मगर चांद तो चांद है। पूर्णिमा के साथ के लिये वह कितनी ही रात अमावस के साथ गुजारने को तैयार बैठा है। बस, इसीलिए वह खोया खोया सा रहता है।

