खेल बचपन के
खेल बचपन के
खेल पर कहानी लिखने बैठते ही बचपन के खेल याद आने लगते हैं जो हम खेला करते थे, उन खेलों से बड़ी कहानी क्या होगी, जिनका स्मरण आज भी आह्लाद देता है। कितना हम खेलते थे। सब मिलाकर हम दस भाई- बहिन थे, संयुक्त परिवार था। इतने भाई - बहिन थे कि घर में खेलने के लिये किसी और की ज़रूरत नहीं थी। स्कूल में भी पढ़ते थे। वहॉं भी खेल का घंटा होता था। तब छोटी क्लास हुआ करती थी। एक कक्षा में दस - पन्द्रह से ज़्यादा बच्चे नहीं होते थे।
स्कूल में हम खेल के घंटे में खो खो, कबड्डी खेलते। इक्कल- दुक्कल खेलते। रस्सी कूदते। कभी कभी टिग्गू भी खेलते। कभी गेंद से खेलते, कभी बैडमिंटन खेलते। लेज़िम भी होती थीं कभी उन्हें चलाते। और कुछ नहीं होता तो कोड़ा जमार साईं खेलते, कभी म्यूज़िकल चेयर खेलते। मतलब यह कि तरह तरह के खेलों में लगे रहते। खेल के घंटे के लिये हम उत्सुकता से प्रतीक्षा करते रहते।
कबड्डी में दूसरे के पाले में एक सॉंस में कबड्डी कबड्डी कहते हुए दौड़ते हुए जाना होता था, और यदि कोई वहॉं छू लेता था तो गल जाते थे। अर्थात् खेल से बाहर हो जाना पड़ता था। और यदि वापिस दौड़ आये अपने पाले में, तो जीत जाते थे। इस तरह से ख़ूब दौड़ना हो जाता था। यदि हार- जीत का फ़ैसला नहीं हो पाता था तो दोनों तरफ़ के कैप्टन हाथ से ज़ोर आज़माइश करते थे। एक दूसरे का हाथ पकड़कर बीच की लाइन से अपनी तरफ़ खींचते थे, जो खिंच जाता था, वह हार जाता था। मैं सबसे मजबूत थी और दौड़ने खींचने में भी तेज़, तो सहेलियां मुझे ही कैप्टन बनाती थी। मेरी पार्टी ही जीतती थी और नहीं फ़ैसला हो पाने पर हाथ से खींचकर जीत जाते थे।
कोड़ा जमार साई खेलते थे। लड़कियाँ बड़ा सा गोल घेरा बनाकर बैठ जाती थीं। एक लड़की दौड़कर किसी के पीछे रुमाल डालती थी, जिसने रुमाल देख लिया, वह उठा लेती थी। और यदि रुमाल नहीं देखा तो चक्कर पूरा करके वह लड़की उसे रुमाल से मारती थी और उस लड़की को उठकर रूमाल लेकर दौड़ना पड़ना था।
म्यूज़िकल चेयर के खेल में गोल घेरे में कुर्सी रखते थे। एक कुर्सी कम रखी जाती थी। म्यूज़िक बजाते थे या गाना गाते थे । कुर्सी के घेरे के चक्कर लगाते थे, और गाना रुकने पर कुर्सी पर बैठना होता था। जो बैठने से रह जाता था , वह बाहर हो जाता था। फिर एक कुर्सी कम कर देते थे। इस तरह जो आख़िर में बच जाता, वह जीत जाता था।
हम टिग्गू भी खेलते थे, जो पाँच होते थे, और किसी भी चीज़ के बना लिये जाते थे। ज़्यादातर ईंट के टुकड़े या छोटी पथरी के होते थे इन्हें उँगलियों पर रखकर खेला जाता था।
घर के बड़े सहन में हम भाई- बहिन मिलकर गिल्ली- डण्डा खेलते थे। सहन के बड़े दरवाज़े के पास ही ज़रा सा गड्ढा कर गुच्ची बना ली जाती थी, जिस पर गुल्ली रखकर डण्डा मारते थे। जिसकी गुल्ली दूर तक जाती थी, वही जीतता था।
फिर कभी काग़ज़ का सामान बनाकर खेलते थे। इसमें रात- दिन बनाते, रात वाली तरफ़ काला रंग कर देते। नाव बनाते थे, पाल वाली नाव बनाते थे, डबल नाव बनाते थे। नाव बनाकर पानी में तैराते थे। काग़ज़ का भिगोना बनाते थे फिर हल्के कोयलों पर रखकर उसमें पानी गर्म करते थे। फिरकी बनाते थे, फिरकी को सींक पर रखकर दौड़ लगाते थे। गेंद बनाते थे, मुँह से हवा भरकर उसे फुलाते थे।
छत पर जाकर भाई के साथ पतंग उड़ाते थे। हम लोग मॉंझा पकड़ते, फिर भाई पतंग को और ऊँचे ले जाते और तब डोर हमें भी बारी - बारी से पकड़ा देते। पतंग उड़ाने की ख़ुशी हम भी महसूस करते।
छुट्टियों में घर पर बैठकर कैरम खेलते। भाई ने कैरम खेलना सिखाया था। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते थे, वहॉं कैरम के चैम्पियन थे। छुट्टियों में घर आते तो हमारे साथ कैरम खेलते थे। हम अच्छा कैरम खेलना सीख गये थे। इसके अलावा ताश खेलते, लूडो खेलते, सॉंप- सीढ़ी खेलते।
स्लेट पर दोनों तरफ़ लाइन खींचकर एक से दस तक की गिनती लिखते, फिर स्लेट पर हाथ से छिपाकर इनमें से कोई एक संख्या लिखते। दूसरे के बताना पड़ता था कि कौन सी संख्या लिखी।
घर पर मिट्टी से सेब केला आदि बनाते। मिट्टी को बढ़िया से सानते। कभी कभी मिट्टी के चूहा, बिल्ली शेर बनाते। काग़ज़ को गलाकर उसमें मुल्तानी मिट्टी मिलाकर कूटते और फिर उससे सुन्दर सी टोकरी बनाते। कभी प्लास्टर ऑफ पेरिस लाते और उसके गीला कर उसमें तस्वीर जड़ते। ये सब छुट्टियों के खेल थे।
आजकल के बच्चे टी.वी. , मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। वे न घर के बाहर खेलते हैं ,न अन्दर। वे यह भी नहीं जानते तख्ती क्या होती है, स्लेट क्या होती है, क्योंकि आजकल इनका स्कूलों में या घर पर उपयोग ही नहीं होता।
हमें तख्ती पर लिखना सिखाया जाता था, अक्षर साफ़ बनाने होते थे। कलम दवात ठीक रखनी होती थी। कलम को पोरा बोलते थे। चाकू से छीलकर पोरे की नोक बनाते थे। स्याही में कपड़ा डुबोकर काली स्याही बनाते थे, जो कच्ची होती थी । तख्ती चिकनी लकड़ी की होती थी। उसे मुल्तानी मिट्टी से लीपकर सुखाते थे , तब उस पर कलम स्याही से लिखते थे। हिन्दी के सुन्दर लिखे अक्षरों को सुलेख कहते थे। इससे हर अक्षर की आकृति दिमाग़ में ठीक से बैठ जाती थी। यह सब भी हमारे लिये खेल का ही हिस्सा था। अपनी किताब की कवितायें कंठस्थ करनी होती थीं, जो हम खेल - खेल में कर लेते थे।
हम पढ़ाई भी करते थे, पर कोई ज़ोर नहीं था। हमारे मॉं - बाऊ जी ने कभी नहीं कहा कि क्यों नहीं पढ़ा। स्कूल में जो थोड़ा होमवर्क मिलता था, उसे पूरा कर लेते थे।
वहॉं घर से थोड़ी दूर पर हमारा बगीचा था बड़ा सा। उसमें तरह तरह के फल के पेड़ थे। वहां जाकर हम दौड़ लगाते, पेड़ पर चढ़ते, अपने से अमरूद, फ़ालसे तोड़ लेते। वहॉं हौज़ में नहाते और तैरते। बाद में ही साइकिल चलाने की प्रैक्टिस करते।
हमारा बचपन खेलों से भरा पड़ा था। कुछ न कुछ करने में लगे रहते थे। कभी यह नहीं लगा कि क्या करें। तब न टेलीफोन था , न कंप्यूटर था, न मोबाइल था , न टी. वी. था। एक रेडियो चाचा जी की बैठक के पास के कमरे में था, वह भी केवल समाचार सुनने के काम आता था। चैनल भी एक या दो थे, प्रसारण का भी समय निश्चित था, हर समय प्रसारण नहीं होता था।
आजकल के बच्चों को देखते हैं तो अधिकांश छोटे- छोटे फ़्लैटों में रहते हैं। बड़ा खुला घर, आँगन, सहन, खुली छत ये सब सपना हो गये। पास में पार्क नहीं होता। स्कूल घर से दूर होता। आने- जाने में समय निकल जाता। फिर हाथ में मोबाइल आ गया है। ऐसे ही दिन ख़त्म हो जाता है। ये सब पुराने खेल अब बच्चे जानते नहीं, जानते हैं तो खेल नहीं पाते।
खेल से मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। भागने दौड़ने से शरीर स्वस्थ रहता है। मिल- जुलकर खेलने से सहयोग की भावना बढ़ती है।
