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Namrata Srivastava

Drama

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Namrata Srivastava

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जवानी में बुढ़ापा क्यों

जवानी में बुढ़ापा क्यों

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पिछले दो दिनों से किशोर कान्त जी को खेलते हुए बच्चों की झुण्ड से एक पंक्ति की कोई लयकारी सुनाई दे रही थी। उन्होंने पास जाकर ध्यान से सुना.. बच्चे खेलते-खेलते बीच में गा उठते- "जवानी में बुढ़ापा क्यों...जवानी में बुढ़ापा क्यों।" इन बच्चों की झुण्ड में उनका अपना बेटा और भतीजी भी शामिल थी।

वे बच्चों से पूछने लगे, "ए! लइका लोगन, हेन्ने(यहाँ) आवऽ, ई कवन कविताई पढ़त हवऽ लोगन 'जवानी में बुढ़ापा क्यों', ई के सिखवले बा(किसने सिखाया)?"

बच्चे थोड़े सहम गए, पर उनकी नटखट भतीजी बोल पड़ी, "कई जगह दीवारों पर पोस्टर चिपका है, उसी में लिखा था।"

"अच्छा, हम हूँ देखीं।" वे अपनी गली के बाहर ही निकले थे की एक पीले रंग का पोस्टर उन्हें एक दीवार पर दिख गया।

उसे पढ़ कर वे झल्लाते हुए भुनभुना उठे, "ये नीम-हकीमों के पाॅवर कैप्सूलों का विज्ञापन, नाश हो इनका।"

वे वापस बच्चों की झुण्ड के पास आए और उन्हें संबोधित करते हुए बोले, "देखऽ लोगन!

ई कविताई पुरान हो गईल, अब ई ना होई, काल्ह(कल) दूसर पोस्टर पढ़ि के अईहऽ, तब उहे गईहऽ लोगन, ठीक बा।" बच्चों ने हामी की मुद्रा में सर हिला दिया।

अगले दिन बच्चों के झुण्ड से नयी लयकारी सुनाई दे रही थी- "सस्ती और नालीदार चादरें, बिसाका की चादरें।" किशोर कान्त जी के चेहरे पर संतोष दिखने लगा।


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